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47 लाख के इनामी नक्सली पहाड़ सिंह ने किया दुर्ग आईजी के समक्ष समर्पण

दुर्ग रेंज में पुलिस को आज बड़ी कामयाबी तब मिली जब एक बड़े ईनामी नक्सली ने समर्पण कर दिया । प्रदेश में 47 लाख के इनामी नक्सली व लाल आतंक का पर्याय बन चुके एमएमसी जोन के एसजेडसी सदस्य एवं जीआरबी डिवीजनल कमेटी के सचिव पहाड़ सिंह उर्फ कुमारसाय उर्फ राममोहम्मद सिंह टोप्पो ने दुर्ग रेज के आईजी जीपी सिंह के समक्ष सरेंडर किया और फिर से समाज की मुख्यधारा में शामिल होने की बात कही।

47 लाख के इनामी नक्सली पहाड़ सिंह ने किया दुर्ग आईजी के समक्ष समर्पण

दुर्ग रेंज में पुलिस को आज बड़ी कामयाबी तब मिली जब एक बड़े ईनामी नक्सली ने समर्पण कर दिया । प्रदेश में 47 लाख के इनामी नक्सली व लाल आतंक का पर्याय बन चुके एमएमसी जोन के एसजेडसी सदस्य एवं जीआरबी डिवीजनल कमेटी के सचिव पहाड़ सिंह उर्फ कुमारसाय उर्फ राममोहम्मद सिंह टोप्पो ने दुर्ग रेज के आईजी जीपी सिंह के समक्ष सरेंडर किया और फिर से समाज की मुख्यधारा में शामिल होने की बात कही।

इस बीच उसने बड़े नक्सली नेताओं पर छत्तीसगढ़ के लोगो से भेदभाव का आरोप भी लगाया और परेशान करने की बात भी कही। इस अवसर पर आईजी जीपी सिंह ने राजनांदगांव एसपी कम्लोचन कश्यप और उनकी पूरी टीम को भी बधाई दिया।

पहाड़ सिंह ने कहा कि बड़े कैडर के सीसीएम नेताओं द्वारा क्षेत्रीय कैडरों के साथ भेदभाव पूर्ण व्यवहार व नौकरशाही, व्यक्तिवादी एवं अवसरवादी व्यवहार करते है। समय समय पर मानसिक रूप से प्रताडित करना तथा डिवीजन के सचिव होने के नाते डिवीजन में नक्सलियों के विरूद्ध कोई भी घटना होने पर मुझे ही उसका सम्पूर्ण रूप से जवाबदार ठहराया जाता रहा।

जिससे मै मानसिक रूप से परेशान रहता था। माओवादी पार्टी के अन्दर मूल निवासी आदिवासी कैडरों के साथ पूर्व में भी इसी तरह का गैर जिम्मेदारा पूर्वक व्यवहार किया गया। जिसके कारण कई क्षेत्रीय आदिवासी कैडरों ने अपनी जान गवादी या पार्टी छोड कर चले गये। नक्सल संगठन मे आन्ध्रप्रदेश व महाराष्ट्र के ही नक्सलियों की बात सुनी जाती है तथा उनका ही आदेश चलता है।

छत्तीसगढ़ के आदिवासी नक्सली सदस्यों को खाने, पीने तथा जानवरों की तरह समान ढोने व नेताओं की सुरक्षा के लिये इस्तेमाल किया जाता है तथा उन्हे परिवारों से भी मिलने नही दिया जाता। यहाँ के नक्सली महीनों अपने परिवार से मिल नहीं पाते है।

बड़े लीडर बस्तर में अपने आप को आदिवासी का हितैषी कहते है लेकिन सच्चाई यह है कि संगठन के नेताओं के द्वारा आदिवासी जनता का आर्थिक, मानसिक एवं शारीरिक शोषण करते हैै। इससे पता चलता है कि नक्सलियों की कथनी और करनी में बहुत फर्क है।

नक्सलियों द्वारा आदिवासी कैडर के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करते है तथा एक झुठी अलोकतांत्रिक रूप से लोकतंत्र की बाते करते है और नव जनवादी क्रांति के नाम पर ढ़िढोरा पिटा जाता है लेकिन नक्सली के बडे लीडरों द्वारा जनवादी केन्द्रीयता का पालन नही किया जाता है। वे सिर्फ सारे नियम हम पर लादते है।

आदिवासी जनता के विकास को अवरूद्ध करने के लिये सम्पुर्ण आदिवासी जनता को एक गलत राह दिखाते हुए हो रही जनविकास कार्य (स्कूल, सड़क, पुल-पुलिया एवं स्वास्थ्य केन्द्र एवं मानवीय संसाधनों) को नुकसान पहुचाकर जंगल क्षेत्रों में निवास करने वाले आदिवासी भाईयों को जानवर का जीवन जीने के लिये मजबूर करते है।

बडे लीडरों द्वारा मीटिंग में पार्टी निर्णय लेते समय आदिवासी कैडरों को निर्णय से दूर रख कर आदेशों का पालन करने के लिये मजबूर किया जाता है। इसके कारण हम उनके निर्णय को मानने के लिए विवश रहते है।

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