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संस्कृत की ऐसी दुर्गति 510 छात्रों में केवल 32 ही हुए उत्तीर्ण!

haribhoomi.com | UPDATED Jul 24 2016 3:12AM IST

रायपुर. पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय का तुगलकी फरमान संस्कृत पर भारी पड़ रहा है। रविवि के इतिहास में एक बार फिर संस्कृत के परिणाम ने संस्कृत के पंडितों को सोचने पर मजूबर कर दिया है कि कहीं संस्कृत में लिखने की अनिवार्यता संस्कृत को ही न निगल जाए। 

रविवि ने शनिवार को परीक्षा परिणाम जारी किया, तो इसमें एमए पूर्व में 510 में महज 32 पास हुए हैं और 475 फेल हो गए। यही हाल अंतिम वर्ष में भी रहा। इसमें 574 में 512 फेल हुए हैं। बीते साल से ही एमए पूर्व में संस्कृत में लिखना अनिवार्य किया गया था। तब इसका नतीजा पहले साल महज दो प्रतिशत आया था। इस बार अंतिम में भी संस्कृत में लिखने की अनिवार्यता के कारण इसका परिणाम महज 8 फीसदी आया है, जबकि पूर्व का परिणाम 6 फीसदी है। 
 
संस्कृत में लिखना आसान नहीं
 
रविवि में दो साल पहले तक संस्कृत के पर्चे हिंदी में लिखे जाते थे, तब इसका नतीजा कभी खराब नहीं आता था, लेकिन अब इसके पर्चे संस्कृत में ही लिखने पड़ रहे हैं। ऐसे में अब इसमें पास होना कठिन हो गया है। संस्कृत कॉलेज रायपुर के प्रोफेसर डॉ. राम किशोर मिर्श बताते हैं कि संस्कृत में लिखना सबसे कठिन काम है। इससे ज्यादा कठिन है संस्कृत में किसी भी विषय को याद रखना। ऐसा करने की क्षमता बहुत कम विद्यार्थियों में होती है। 
 
संस्कृत को आज वही पास कर सकते हैं, जो लगातार इसे स्कूल स्तर से पढ़ रहे हैं। अचानक कोई यह सोचे कि वह अन्य विषयों की तरह संस्कृत में एमए कर लेगा, तो यह अब संभव नहीं है। पहले जब संस्कृत के पेपर संस्कृत में लिखना अनिवार्य नहीं था, तब आसानी से लोग पास हो जाते थे। र्शी मिर्श के मुताबिक आज संस्कृत में उत्तर लिखने की अनिवार्यता के कारण ही इसके विद्यार्थी भी कम होते जा रहे हैं। संस्कृत को प्राइवेट में पास करना और ज्यादा कठिन हो गया है। 
 
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