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टेंशन-डिप्रेशन ट्रीटमेंट में ऐसे बना सकते हैं करियर

आधुनिक जीवनशैली में अधिकांश लोग तनाव या अवसाद का सामना कर रहे हैं। ऐसे लोगों की संख्या लगातार बढ़ भी रही है। ऐसे में अगर आप चाहें तो बतौर मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक अवसाद-तनाव के ट्रीटमेंट की फील्ड में करियर बना सकते हैं।

टेंशन-डिप्रेशन ट्रीटमेंट में ऐसे बना सकते हैं करियरडिप्रेशन (प्रतीकात्मक फोटो)

आधुनिक जीवनशैली में अधिकांश लोग तनाव या अवसाद का सामना कर रहे हैं। ऐसे लोगों की संख्या लगातार बढ़ भी रही है। ऐसे में अगर आप चाहें तो बतौर मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक अवसाद-तनाव के ट्रीटमेंट की फील्ड में करियर बना सकते हैं। कैसे ले सकते हैं इस क्षेत्र में प्रवेश और क्या हैं इसमें संभावनाएं, इस बारे में विस्तार से जानिए।

यह बात सदियों से कही जा रही है कि स्वस्थ तन में स्वस्थ मन का वास होता है। लेकिन बदले हालात में तन के साथ-साथ मन के स्वस्थ होने पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है। अगर मन मजबूत नहीं हो तो तंदुरुस्त युवा भी जीवन की चुनौतियों के सामने पस्त हो जाता है। मन को कमजोर या अस्वस्थ बनाने वाली बीमारियों में सबसे ज्यादा होने वाली एक मानसिक बीमारी अवसाद भी है। प्रतिकूल परिस्थितियां आते ही कुछ लोगों को पहले तनाव फिर अवसाद घेर लेता है। यह अवसाद घनीभूत होकर कई बार रोगी को अपने जीवन को खत्म करने जैसे कदम उठाने पर भी मजबूर कर सकता है। मुंबई में एक फिल्म सेलिब्रिटी या दिल्ली में एक उच्च अधिकारी की हाल ही में हुई मौत इसका ज्वलंत उदाहरण हैं।

बढ़ रही है डिप्रेशन प्रॉब्लम

हालांकि टेंशन और डिप्रेशन की समस्या विश्वव्यापी है लेकिन सामाजिक संरचना, काम-काजी माहौल, जीवनशैली आदि में बदलाव ने हाल के वर्षों में भारत जैसे देश में अवसाद रोगियों की संख्या में खासा इजाफा किया है। एक अनुमान के मुताबिक भारत के लोगों में अवसाद यानी डिप्रेशन की समस्या तेजी से बढ़ रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो भारत की लगभग एक तिहाई जनसंख्या किसी न किसी रूप में अवसाद की गिरफ्त में है। बीते कुछ समय से जब पूरी दुनिया में चारों तरफ आर्थिक संकट और समाज में नकारात्मकता का माहौल बढ़ा है, अवसाद रोगियों की संख्या और बढ़ने के आसार हैं। ऐसे में इनके इलाज के लिए अवसाद विशेषज्ञों यानी मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों की संख्या में भी अच्छी खासी मांग आने वाले दिनों में होगी।

नेचर ऑफ वर्क

दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में मनोविज्ञान की सहायक प्रोफेसर डॉ. शालिनी शर्मा कहती हैं, 'अवसाद के कई कारण होते हैं, जिनमें एक प्रमुख कारण आनुवांशिक भी है। इसके तहत माता-पिता के गुण या स्वभाव का असर बच्चे या दूसरी पीढ़ी पर पड़ता है। बच्चों में भी आत्मघाती प्रवृत्ति विकसित हो जाती है। इसके अलावा इच्छा शक्ति की कमी, सपोर्ट सिस्टम का अभाव, खान-पान और काम-काज का अनुकूल माहौल नहीं होना जैसे कई कारण हैं, जो व्यक्ति को पहले तनाव में ले जाता है और आगे चलकर अवसादग्रस्त बनाता है। ऐसे लोगों का कोई दोस्त या परिवार का सदस्य ऐसा नहीं होता जो भावनात्मक आघात पर सहारा दे। ऐसे में एक मनोवैज्ञानिक रोगी की काउंसिलिंग करता है। इसके जरिए उसके तनाव और अवसाद के कारण को जानने का प्रयास करता है। इस दौरान उसे धैर्य और पूरी सहानुभूति के साथ रोगी की बात को सुनना होता है। रोगी के मन की बात को सुनकर उसे मोटिवेट भी करता है, जिससे रोगी में आत्मविश्वास बढ़ता है।'

इस बारे में मनोवेद माइंड अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. विनय कुमार कहते हैं, 'जिंदगी में तनाव का सामना तो 75 फीसदी से अधिक लोग करते हैं लेकिन हर तनाव अवसाद में नहीं बदल जाता। करीब दस प्रतिशत तनाव ही अवसाद में बदलता है। लंबे समय तक तनाव में बने रहने के कारण अवसाद की स्थिति आती है। ऐसे में रोगी की दशा के अनुसार मनोचिकित्सक मेडिकेशन का सहारा भी लेता है। मनोचिकित्सक को रोगी का ट्रीटमेंट करने से पहले उसका भरोसा हासिल करना सबसे जरूरी होता है। इसलिए उसे एक अच्छा श्रोता जरूर होना चाहिए।'

कोर्स के रंग

आमतौर पर देश के लगभग सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में मनोविज्ञान विभाग में इसकी पढ़ाई होती है। स्नातकोत्तर स्तर पर इसे एक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है। इसमें पीजी के बाद क्लिनिकल साइकोलॉजी में डिप्लोमा कोर्स भी किया जा सकता है। कई संस्थानों में यह कोर्स संचालित किया जा रहा है। मनोवैज्ञानिक बनने के लिए इस कोर्स के साथ ही आप साइकोलॉजी में पीएचडी भी कर सकते हैं।

मनोचिकित्सक बनने के लिए आपको पहले एमबीबीएस करना होगा। एमबीबीएस के बाद एमडी या डिप्लोमा इन साइकिएट्रिक मेडिसिन का कोर्स भी किया जा सकता है। ये अवसाद रोगी के न सिर्फ रोग का कारण पता लगाते हैं बल्कि उसके इलाज के लिए काउंसिलिंग के साथ दवाएं भी देते हैं।

एंट्री प्रोसेस

आर्ट्स स्ट्रीम के छात्र इंटर के बाद बीए, फिर एमए साइकोलॉजी में करके इस दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। इसके बाद आप अपनी रुचि के अनुसार पीएचडी कर रिसर्च की दिशा में या टीचिंग की दिशा में बढ़ सकते हैं। या फिर क्लिनिकल साइकोलॉजी में डिप्लोमा कर सकते हैं। इसके जरिए आप बतौर काउंसलर या साइकोलॉजिकल कंसल्टेंट डिप्रेशन और टेंशन के पेशेंट्स का इलाज कर सकते हैं। साइकिएट्रिस्ट के तौर पर डिप्रेशन पेशेंट्स का ट्रीटमेंट करने के लिए आपको पहले बायो स्ट्रीम से 12वीं पास करने के बाद किसी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस में एडमिशन लेना होगा। इसके बाद साइकिएट्री में पीजी कोर्स करना होता है।

करियर ऑप्शंस

मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक के रूप में आप अवसाद के रोगियों का ट्रीटमेंट कर सकते हैं। इस समस्या से निपटने के लिए महानगरों और शहरों में काफी क्लिनिक खुल गए हैं। ऐसे में प्रैक्टिस के अवसर ज्यादा हैं। आप भी निजी तौर पर अपना क्लिनिक खोलकर जनसेवा के साथ अच्छी इनकम कर सकते हैं। मानसिक चिकित्सा संस्थानों और अस्पतालों में मानसिक चिकित्सा विभाग होते हैं। जहां मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों की मांग होती है। इसके अलावा निजी कंपनियां, स्वयंसेवी संगठन अपने यहां मानसिक तनाव और अवसाद से निपटने या उपचार के लिए ऐसे विशेषज्ञों को रखती हैं। पहले स्कूल, कॉलेजों में काउंसलर नहीं होते थे। लेकिन छात्रों में तनाव आदि की समस्या से निपटने के लिए काउंसलर भी अप्वाइंट किए जाने लगे हैं। यहां पर भी आप बतौर सलाहकार अपनी सेवाएं दे सकते हैं। मानव संसाधन प्रबंधन विभाग में भी ऐसे विशेषज्ञों को काम करने के अवसर मुहैया कराए जाते हैं। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में भी अध्यापन और रिसर्च के लिए मनोविज्ञान और मनोचिकित्सा के विशेषज्ञ रखे जाते हैं।

प्रमुख संस्थान

-निमहंस, बेंगलुरु

वेबसाइट-www.nimhans.ac.in

-पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़

वेबसाइट-www.pgimer.edu.in

-आईएचबीएएस, नई दिल्ली

वेबसाइट- www.ihbas.delhigovt.nic.in

-पीआरएसयू, रायपुर

वेबसाइट-www.prsu.ac.in

-बरकतउल्ला विवि, भोपाल

वेबसाइट-www.bubhopal.ac.in

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