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Bhagwant Anmol Interview: भगवंत अनमोल की 'बाली उमर' से शुरू हुआ कामियाबी का सफर

भगवंत अनमोल बहतु ही जुझारू लेखक है, उनकी लेखनी भी उनके नाम की जैसी ही अनमोल है, काफी संघर्षों के बाद इस मुकाम पर पहुँचने पर क्या कहते हैं भगवंत अनमोल जानिए उन्हीं की जुबानी...

Bhagwant Anmol Interview: भगवंत अनमोल की बाली उमर से शुरू हुआ कामियाबी का सफर
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भगवंत अनमोल

करीब तीन वर्ष बतौर इंजीनियर एमएनसी में जॉब करने के बाद भगवंत अनमोल लेखन की ओर मुड़ गए। फिलहाल, कानपुर (उत्तर प्रदेश) में स्पीच थेरेपी सेंटर के संचालन के साथ साहित्य सृजन में सक्रिय हैं। दो मोटिवेशनल किताबों और दो उपन्यासों के बाद हाल में उनका नया उपन्यास 'बाली उमर' प्रकाशित होकर आया है। प्रस्तुत है, इस उपन्यास पर केंद्रित सरस्वती रमेश से हुई उनकी बातचीत के प्रमुख अंश।

आपने इंजीनियरिंग की है फिर लेखन की ओर कैसे मुड़ गए?

जब मैं छोटा था तभी से तुकबंदी किया करता था, जिसे मैं कविताएं समझता था पर वे होती नहीं थीं। फिर मैंने दसवीं के बाद डायरी लिखना शुरू किया। यहां तक कि बीटेक की पढ़ाई के दौरान ही मैंने पहली किताब लिख दी थी और वो प्रकाशित भी हो गई थी। फिर मेरी जॉब लगी तो भी यह क्रम टूटा नहीं। अब जॉब छोड़कर अपना बिजनेस कर रहा हूं तो भी यह क्रम निरंतर जारी है। आगे कोई भी काम करूं पर लेखन जारी रहेगा। हो सकता है आगे मेरे प्रोफेशन बदलते रहें पर एक चीज जो नहीं बदलेगी, वह है लेखन। यह मेरा पैशन है, जो शायद मेरे जीवन का हमराही बन गया है।

इस उपन्यास 'बाली उमर' को लिखने की प्रेरणा कब-कैसे मिली?

मेरी नानी के गांव में एक ऐसा ही व्यक्ति था, जो हूबहू इस उपन्यास के एक पात्र 'पागल है' की तरह था। लोग उसे पागल कहते थे। उसकी बोली भाषा किसी को समझ नहीं आती थी। शायद इस कारण उसे लोग पागल समझते थे। वह गांव के एक ठाकुर के पास बंधुआ मजदूरी करता था। लगभग बीस वर्षों बाद पता चला कि वह पागल नहीं बल्कि दक्षिण भारत का था। उसने यह बीस वर्ष कैसे गुजारे होंगे? इसको सोचकर मैं सहम जाता था। इसी कारण मैंने सोचा कि इस विषय पर जरूर लिखूंगा। लेकिन इसको आकार किस तरह से दूं, इस पर जब सोचने लगा तो मुझे याद आया मैंने कई महत्त्वपूर्ण लेखकों की किताबें पढ़ी हैं, जिनमें बचपन की कहानियों में नैतिक शिक्षा की बातें थीं। इसके साथ ही हिंदी साहित्य में एक स्पेस मुझे खाली लगा, जिसमें बच्चों के मन में चल रहे वयस्क सवालों को दर्शाया गया हो। बस यहीं से मैंने उस 'पागल है' की कहानी को बच्चों के माध्यम से दिखाने के लिए 'बाली उमर' को लिखने का निर्णय किया। 'बाली उमर' कतई ऐसा उपन्यास नहीं है, जिसमें यह बताया जाए कि 'ऑनेस्टी इज द बेस्ट पॉलिसी' या चोरी करना बुरी बात है। बच्चों से हमें बहुत सीख मिलती है, जैसे वे दूसरों के नामकरण उनके कर्म के आधार पर करते हैं न कि जाति के आधार पर, इसे इस किताब में भी दर्शाया गया है।

'बाली उमर' को पाठकों तक अपना संदेश पहुंचाने में आप कितना कामयाब मानते हैं?

किसी किताब की कामयाबी इस बात पर निर्भर करती है कि पाठक उसमें उठाए मुद्दे को पढ़ने के बाद वैसी गलती न करें। मुझे ऐसा पता चला कि मेरी पिछली किताब के बाद किन्नरों के प्रति कई लोगों की सोच का तरीका बदल गया। ऐसा इस किताब के साथ भी हो, यानी अगर पाठक को कभी अपने परिवेश, भाषा से अलग व्यक्ति मिले और उसके साथ वह बुरा बर्ताव न करे, जैसा कि 'पागल है' के साथ गांव वालों ने किया, तो किताब कामयाब मानूंगा। सिर्फ किताब की वाह-वाही से उसे कामयाब नहीं कहा जा सकता, जब तक कि वह कम से कम कुछ लोगों के अंदर बदलाव न ला सके।

आपके किरदारों में अल्हड़पन कम प्रौढ़ता अधिक दिखती है। यह कितना स्वाभाविक है?

अगर इस उपन्यास के अंत में ड्रामे वाले हिस्से को छोड़ दिया जाए तो मैंने एक भी ऐसा शब्द लिखने की कोशिश नहीं की, जिससे बनावटीपन लगे। गांव और शहर के परिवेश में अंतर होता है। गांव के बच्चे समाज में ज्यादा घुले हुए होते हैं। इस कारण उनमें जल्दी मैच्योरिटी आ जाती है। उनके पास पढ़ाई-लिखाई की बातें कम और दूसरी बातें ज्यादा होती हैं। सही-गलत जो भी उनके सामने आता है, वे सब सीखने लगते हैं, तो प्रौढ़ता नहीं है इसमें। वह सामाजिक परिवेश है और मैंने वही लिखने की कोशिश की है। मैंने ग्रामीण बच्चों के मन में भरे कौतुहल को दिखाना चाहा है।

कहीं-कहीं लगता है कि आपने अपनी बात बच्चों के मुंह से कहलवाई है, क्या इससे आप सहमत हैं?

ऐसा सिर्फ कुछ जगहों पर है। सिर्फ दो-तीन जगह। असल में किताब में संवाद कम हैं। उसकी वजह एक तो यह है कि 'पागल है' कन्नड़ में बोलता था तो ज्यादा कन्नड़ में बात नहीं करवाना चाह रहा था। दूसरा इस वजह से कि बच्चों के संवाद जितना जरूरी हों, उतने ही होने चाहिए। वैसे यह उपन्यास बच्चों की वयस्क जिज्ञासाओं पर है।

'बाली उमर' को लिखते वक्त क्या मन पर बाजार का दबाव भी था?

मैं युवा लेखक हूं। बाजार तक तो मैं ज्यादा से ज्यादा पहुंचना चाहता ही हूं। लेकिन किसी एक ढर्रे में नहीं बंधना चाहता। दरअसल, हिंदी साहित्य का कबाड़ा उन्हीं लोगों ने किया है, जो एक ढर्रे का साहित्य लिखते रहे हैं। दूसरी ओर मनोहर श्याम जोशी जैसे लेखक भी हुए हैं। उनकी सारी किताबें पढ़िए और फिर उनकी 'हमजाद' पढ़िए। आपको उसमें जमीन-आसमान का अंतर नजर आएगा। काशीनाथ सिंह को देख लीजिए, 'काशी का अस्सी' और 'रेहन का रग्घू' दोनों जुदा किताबें हैं। मैं भी हर तरह का साहित्य लिखना चाहता हूं।

'बाली उमर' को लिखकर आप कितना संतुष्ट हुए? क्या बेहतरी की कोई गुंजाइश थी, जो छूट गई?

मेरा मानना है कि पिछली किताब (जिंदगी 50-50) में अगर कथानक बढ़िया था तो इस उपन्यास की शैली बढ़िया है। इस किताब पर अब तक मिले रिव्यू काफी अच्छे रहे हैं। मुझे लगता है बच्चों पर ऐसी किताब अब तक किसी ने नहीं लिखी। इसकी शैली से मैं काफी संतुष्ट हूं और जो मैं देना चाहता था, वह मैंने दिया। अकसर लोगों के दिमाग में यह बात रहती है कि लेखक की पिछली किताब कैसी थी? इस उपन्यास की तुलना भी लोग मेरी पिछली किताब से करने लगे हैं, जबकि दोनों अलग-अलग तरह की किताबें हैं।

इस उपन्यास में कहीं-कहीं किरदारों की भाषा ठेठ देहाती है तो कहीं खड़ी बोली, ऐसा जानबूझ कर किया गया है या अनजाने में?

कोई भी गांव का आदमी हो वह पूरे गांव की भाषा नहीं बोलता है और न ही पूरी हिंदी बोलता है। मैंने नब्बे प्रतिशत कोशिश की है कि कोई भी बनावटीपन न हो। जो भी भाषा लिखी गई है, वो वाकई में वैसी ही है। 'जिंदगी 50-50' महिलाओं के ज्यादा करीब रही और 'बाली उमर' पुरुषों के।

आज के दौर में जो अन्य युवा लेखन कर रहे हैं, उन पर आपकी क्या राय है?

पिछले एक-दो दशक से पाठक एक ही तरह की चीज को बार-बार पढ़कर बोर हो रहे थे। इसी वजह से पाठकों ने हिंदी किताबों की तरफ रुख कम कर दिया था। अब हर तरफ से नए लेखक आ रहे हैं। भले ही वे आईटी से हों, डॉक्टर हों, एमबीए हों, वे अपनी तरह का साहित्य लेकर आ रहे हैं। इससे एक चीज तो हो रही है कि विषयों में नवीनता आ रही है। कमी यह है कि कुछ युवाओं की किताबों में उथलापन होता है लेकिन नए विषयों को लाने के लिए वे बधाई के पात्र हैं।

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