Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

करियर के बहुत सारे ऑप्शन खोलती है ट्रायबल स्टडीज, जानें इस कोर्स के बारे में पूरी जानकारी

सोशियोलॉजी का एरिया बहुत विस्तृत है। अगर आपकी रुचि भी इसी सब्जेक्ट में है और इसमें कुछ अलग हटकर करियर बनाना चाहते हैं तो ट्राइबल स्टडीज से रिलेटेड कोर्स कर सकते हैं। इस फील्ड में काम करने के बहुत से अवसर देश-विदेश में उपलब्ध हैं।

करियर के बहुत सारे ऑप्शन खोलती है ट्रायबल स्टडीज, जानें इस कोर्स के बारे में पूरी जानकारी

सोशियोलॉजी का एरिया बहुत विस्तृत है। अगर आपकी रुचि भी इसी सब्जेक्ट में है और इसमें कुछ अलग हटकर करियर बनाना चाहते हैं तो ट्राइबल स्टडीज से रिलेटेड कोर्स कर सकते हैं। इस फील्ड में काम करने के बहुत से अवसर देश-विदेश में उपलब्ध हैं। अब तो कई विवि में इससे रिलेटेड कई तरह कोर्स संचालित किए जा रहे हैं। इस बारे में विस्तार से जानिए।

आज देश-दुनिया में आदिवासी समाज यानी ट्राइबल सोसाइटी की पहचान विशेष तौर पर की जा रही है। उनकी भाषा, संस्कृति, परिवेश और जीवन की रोजमर्रा की जरूरतों को चिह्नित किया जा रहा है। देखा जाए तो यह पहचान उनकी अस्मिता के लिए आवश्यक है। आमतौर पर आदिवासी को मुख्यधारा के लोग असभ्य और बर्बर समझ लेते हैं।

इसकी वजह है, उनके प्रति संवेदनहीन रवैया। उनकी सभ्यता और संस्कृति को न तो समझने की कोशिश की जाती है और न ही उनके साथ सहृदयता के साथ व्यवहार किया जाता है। ऐसी मानसिकता को दूर करने के लिए आज आदिवासी अध्ययन की विशेष जरूरत पड़ रही है।

उन्हें मुख्यधारा में लाने की कोशिश की जा रही है। इसके लिए तरह-तरह की योजनाएं बनाई जा रही हैं और आए दिन उस दिशा में काम भी हो रहा है। इस तरह के कामों और चुनौतियों ने आज युवाओं को ऐसे मौके उपलब्ध कराए हैं, जिनको लेकर वे जीवन में आगे बढ़ सकते हैं। समाज सेवा भी कर सकते हैं और उनके मार्फत अपना करियर भी संवार सकते हैं।

यह भी पढ़ेंः Career Advice: मैथ्स में टीचिंग के मौजूद हैं अच्छे ऑप्शन, इन क्षेत्रों में बनाएं आपना करियर

स्कोप ऑफ कोर्स

दुनिया के एक बड़े हिस्से को जानना, उसके संरक्षण और विकास के लिए काम करना खासा दिलचस्प है। भारत में इस दिशा में तेजी से काम हो रहे हैं। यहां अनुसूचित आदिवासी समूहों की संख्या 700 से अधिक है। सन् 1951 की जनगणना के अनुसार आदिवासियों की संख्या 1,91,11,498 थी जो 2001 की जनगणना के अनुसार 8,43,26,240 हो गई।

यह देश की जनसंख्या का 8.2 प्रतिशत है। इतनी बड़ी आबादी को मुख्यधारा का हिस्सा बनाने के लिए सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर नए-नए विभाग खोले जा रहे हैं। उनकी भाषा और संस्कृति की विशिष्टता को रेखांकित करने के लिए रिसर्च भी हो रहे हैं।

विश्वविद्यालयों, सरकारी और गैर सरकारी निकायों में स्थापित हो रहे नए विभागों ने ऐसे विशेषज्ञों के लिए अवसर भी मुहैया कराए हैं, जो इस क्षेत्र में रुचि रखते हैं। आम समाज से उनकी भिन्नता को समझने और उन्हें बारीकी से जानने के काम ने ही एक अलग तरह से कोर्स तैयार करने को भी प्रेरित किया है। इसके चलते स्नातकोत्तर स्तर पर ट्राइबल स्टडीज में कई कोर्स शुरू हो गए हैं।

कोर्स की जरूरत

आदिवासी इलाके आर्थिक रूप से पिछड़े ही नहीं बल्कि गरीबी, भुखमरी, बीमारी सहित कई तरह की समस्या उन्हें परेशान करती है। भारत के पूर्वोत्तर इलाके से लेकर बिहार, झारखंड ओड़िशा, छतीसगढ़, आंध्र प्रदेश में आदिवासियों की संख्या अधिक है। विकास से कोसों दूर इन आदिवासियों की जीवनशैली को उत्कृष्ट बनाने के लिए एक ओर जहां स्थानीय सरकार कार्य कर रही है, वहीं कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फंडिंग एजेंसियां भी कार्य कर रही हैं।

ऐसे में सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं को किसी भी योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए रिसर्च की आवश्यकता पड़ती है और अध्ययन करना पड़ता है। इसके लिए वे ट्राइबल यानी आदिवासी स्टडीज से जुड़े लोगों पर निर्भर होते हैं और यही कारण है कि भारत के कई संस्थाओं और विश्वविद्यालयों में ट्राइबल स्टडीज से संबंधित कोर्स संचालित किए जा रहे हैं जो युवाओं को आकर्षित कर रहे हैं।

यह भी पढ़ेंः Career Advice: अगर आपको भी बनना है 'एनएसजी कमांडो', इस तरह से करें तैयारी

मेन कोर्सेस

आदिवासियों को लेकर भारत सहित तमाम देशों में कई संस्थान और विश्वविद्यालयों में कई तरह के कोर्स उपलब्ध हैं। हाल ही में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय ने इससे संबंधित अलग से कोर्स शुरू किए हैं। इग्नू के अलावा आदिवासी अध्ययन में कुछ संस्थानों में सर्टिफिकेट, पीजी डिप्लोमा या फिर मास्टर डिग्री कोर्स उपलब्ध हैं।

इसके अलावा एमफिल और पीएचडी के कोर्स भी संचालित किए जा रहे हैं। इन कोर्सेस का मकसद छात्रों में जहां समाज की समझ को बढ़ावा देना है, वहीं आदिवासियों के बीच उनकी भागीदारी, नेतृत्व, संस्कृति आदान-प्रदान और सेवा से जुड़े मौकों से अवगत कराना भी है। आदिवासी समुदाय और उनकी भाषाओं को लेकर भी छात्र इन कोर्सों के तहत पढ़ाई करते हैं।

कोर्स कंटेंट

कोर्स के दौरान छात्र, आदिवासियों को लेकर हुए रिसर्च, सरकारी योजनाओं की जानकारी हासिल करते हैं। उनकी जिंदगी कैसे बेहतर हो, इन बातों से भी वाकिफ होते हैं। कोर्स के दौरान छात्रों को फील्ड रिसर्च करने का मौका भी मिलता है। वे उनके सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विकास से रूबरू होते हैं। आदिवासियों के पास मौजूद प्राकृतिक संसाधनों, कृषि से जुड़े मामले आदि की भी जानकारी हासिल करते हैं।

इसके साथ ही आदिवासी लोगों के सामाजिक और आर्थिक जिंदगी कैसे बेहतर हो, इसे लेकर वे तमाम संस्थाओं से रूबरू होते हैं। संविधान में मिले उनके अधिकारों और कर्त्तव्यों को समझते हैं। आदिवासी संस्कृति को बेहतर ढंग से समझने के लिए उनके साहित्य का भी अध्ययन करते हैं।

जॉब के अवसर

आदिवासी अध्ययन से संबंधित कोर्स करने के बाद युवाओं के लिए कई तरह के मौके देश ही नहीं दुनिया भर में उपलब्ध हैं। वे चाहें तो सरकारी योजनाओं से जुड़कर आदिवासियों के लिए काम कर सकते हैं। समाज कल्याण मंत्रालय में ऐसे विशेषज्ञों की मांग होती है। इससे जुड़ी गैर सरकारी संस्थाएं, उनके लिए अवसर मुहैया कराती हैं।

ट्राइबल्स के लिए काम कर रही एनजीओ में प्रोजेक्ट अधिकारी के रूप में काम कर सकते हैं। आदिवासियों और दलित से जुड़े नेशनल और इंटरनेशनल प्रोजेक्ट्स में हिस्सा लेकर समाज में बदलाव की दिशा में काम कर सकते हैं और अपना करियर बना सकते हैं।

इसके अलावा वे इन इलाकों में कार्य कर रहे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय एनजीओ में अपना योगदान दे सकते हैं। कुछ समय जमीनी स्तर पर काम करने के बाद वे शैक्षणिक गतिविधियों यानी अध्ययन-अध्यापन में आ सकते हैं। वे आदिवासियों के बीच कार्य कर रही एजेंसी में बतौर सलाहकार नियुक्त हो सकते हैं। उन्हें नीतियां बनाने में मदद कर सकते हैं।

यह भी पढ़ेंः Career Advice: प्रोफेसर बनने के लिए नेट ही काफी नहीं, पास करना होगा ये भी एग्जाम

महत्वपूर्ण संस्थान

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विवि, दिल्ली

वेबसाइट - www.ignou.ac.in

सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड, रांची

वेबसाइट - www.cuj.ac.in/

सिदो कान्हू मुरमू विश्वविद्यालय, दुमका

वेबसाइट - www.skmu.ac.in

-टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस, मुंबई

वेबसाइट - www.tiss.edu

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला

वेबसाइट - www.hpuniv.nic.in

-राजीव गांधी यूनिवर्सिटी, इटानगर

वेबसाइट - www.rgu.ac.in

एक्सपर्ट व्यू

डॉ. शशिभूषण सिंह

समाजशास्त्र विभाग

दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स

दिल्ली

मौजूद हैं भरपूर अवसर

अपने देश में बड़ी तादाद में आदिवासी समुदाय रहता है। कुल आबादी में करीब 8 फीसदी संख्या उनकी है। आजादी के पिछले सत्तर साल में सरकार द्वारा संचालित विकास योजनाओं के बावजूद उनकी समस्या जस की तस है। वे अब भी विकास योजनाओं से महरूम हैं। उनकी मुख्य समस्या है, उन तक विकास की रोशनी कैसे पहुंचाई जाए?

उनकी संस्कृति, सभ्यता और रीति-रिवाज को समझने की जरूरत बनी हुई है। बिना इसे जाने-परखे उनका विकास नहीं किया जा सकता है। अन्य नागरिकों की तरह उनका विकास नहीं किया जा सकता। इन जरूरतों और इस चुनौती को ध्यान में रखते हुए ही आज समाजशास्त्र के अंदर आदिवासी अध्ययन जैसे विषय अलग से तैयार हो रहे हैं। विश्वविद्यालयों में इसके लिए अलग से विभाग खोले जा रहे हैं।

इन विभागों में आदिवासी सभ्यता, संस्कृति और उनकी भाषा आदि का अध्ययन करवाया जा रहा है। जो युवा इस क्षेत्र में आना चाहते हैं, उनके लिए यह खासा चुनौतीपूर्ण और रोचक कार्य है, साथ ही समाजसेवा की संतुष्टि भी है। उनके लिए कार्य करने के भरपूर अवसर तौजूद हैं।

Next Story
Top