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नए आयोग की जरूरत

केंद्र सरकार ने इसके लिए एक नए आयोग के गठन को मंजूरी दे दी है। मोदी कैबिनेट के इस फैसले को जाट आरक्षण आंदोलन से जोड़कर देखा जा रहा है।

नए आयोग की जरूरत

केंद्र सरकार ने पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण की बढ़ती मांग को देखते हुए नया आयोग बनाने का फैसला किया है। यूं कहा जाए कि देश के सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों की आवाज सुनने के लिए अब पहली बार संवैधानिक व्यवस्था होने जा रही है।

केंद्र सरकार ने इसके लिए एक नए आयोग के गठन को मंजूरी दे दी है। मोदी कैबिनेट के इस फैसले को जाट आरक्षण आंदोलन से जोड़कर देखा जा रहा है। नया आयोग वर्तमान में अभी तक चल रहे राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग की जगह लेगा। इसे संवैधानिक दर्जा दिया जाएगा, जैसा कि अनुसूचित जाति आयोग और अनुसूचित जनजाति आयोग को हासिल है।

वर्तमान में मौजूद ओबीसी आयोग का संवैधानिक दर्जा नहीं है। यह केंद्र सरकार के सामाजिक कल्याण और अधिकारिता मंत्रालय के तहत चलने वाला वैधानिक आयोग है। मौजूदा आयोग को 1993 में संसद में पारित कानून के तहत गठित किया गया था। नए आयोग का नाम राष्ट्रीय सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ा वर्ग आयोग रखा जाएगा।

सरकार के फैसले के अनुसार नया आयोग ही सामाजिक, शैक्षिक तौर पर पिछड़ों की नई परिभाषा तय करेगा। साथ ही भविष्य में ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) की सूची में बदलाव भी संसद की मंजूरी के बाद ही हो सकेगा। अब तक यह फैसला सरकार के स्तर पर होता रहा है, लेकिन पहले भी आरक्षण का आधार सामाजिक व शैक्षिक पिछड़ापन ही था।

केंद्र सरकार के ताजा फैसले में अगर कुछ नया है, तो एक यह कि इसके जरिए उसने आरक्षण की गेंद संसद के पाले में *डाल दी है। बता दें कि इसके लिए संसद में जल्दी ही संविधान संशोधन बिल लाया जाएगा। इसके साथ ही पहले से चल रहे राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को समाप्त कर दिया जाएगा। वर्तमान में ओबीसी सूची में जातियों के नाम जोड़ने या हटाने का काम सरकार के स्तर पर होता है।

हालांकि अब राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की जगह संविधान संशोधन कर अनुच्छेद 338बी को जोड़ा जाएगा। नए आयोग में एक चेयरपर्सन, एक वाइस चेयरपर्सन और तीन सदस्यों को नियुक्त किया जाएगा। नए आयोग के गठन हो जाने के बाद विभिन्न वर्गों की ओर से पिछड़े वर्ग में शामिल किए जाने की मांग पर भी विचार यही करेगा। साथ ही पिछड़ा वर्ग की सूची में किसी खास वर्ग के ज्यादा प्रतिनिधित्व या कम प्रतिनिधित्व पर भी यही सुनवाई करेगा।

यह भी तय किया गया है कि आयोग की सिफारिश सामान्य तौर पर सरकार को माननी ही होगी। लंबे समय से आम लोगों की ओर से और साथ ही संसद में जन प्रतिनिधियों की ओर से यह मांग की जा रही थी कि पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए एक संवैधानिक आयोग का गठन हो। जाहिर है अब न सिर्फ यह आयोग गठित किया जाएगा, बल्कि पिछड़ों की पहचान भी नए सिरे से की जाएगी।

हालांकि नए सिरे से पहचान करने या ज्यादा प्रतिनिधित्व वाले वर्गो का हिस्सा कम करने को लेकर कोई भी फैसला आसान नहीं होगा। राजनीतिक पहलू को भी नजरअंदाज करना मुश्किल है। दरअसल पिछले दिनों मे जाट आरक्षण को लेकर भी मांग तेज रही है। कोर्ट से हालांकि इसे खारिज किया जा चुका है, लेकिन चाहे अनचाहे यह आयोग उनके मन में नई आशाएं जगा सकता है। हालांकि, सरकार के इस फैसले को लेकर संसद में हंगामा भी सुनाई दिया।

राज्यसभा के कुछ सदस्यों ने यह आरोप लगाया कि यह आयोग इसलिए बनाया जा रहा है कि पिछड़ों और अनुसूचितों को मिलने वाले आरक्षण में कटौती की जा सके। इस घोषणा को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत के उस बयान से भी जोड़ा जा रहा है, जो उन्होंने बिहार के चुनाव के दौरान दे दिया था। खैर, सांसद शरद यादव और रामगोपाल यादव ने पिछले पिछड़ा आयोग को भंग करने पर जो चिंता व्यक्त की है।

वह जायज है, क्योंकि यदि आरक्षण पर पुनर्विचार हुआ और नई जातियां जुड़ गईं तो पुरानी जातियों की सीटें कटेंगी। आरक्षण का प्रतिशत तो बढ़ नहीं सकता। गौरतलब है कि देश में आरक्षण को लेकर कई जातियां भड़की हुई हैं। गुजरात के पटेल, हरियाणा के जाट, राजस्थान के गुर्जर, आंध्र के कापू और उप्र की दर्जनों पिछड़ी जातियों के लोग आरक्षण पाने के लिए जबर्दस्त आंदोलन छेड़े हुए हैं।

इसके अलावा कई ईसाई और मुस्लिम संगठन भी अपने पिछड़े लोगों के लिए आरक्षण की मांग कर रहे हैं। मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद पिछले ढाई दशक में देश के सामाजिक समीकरणों में बड़ा बदलाव आया है। एक तरफ अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी में शामिल अनेक जातियां ताकतवर हुई हैं, वहीं पारंपरिक रूप से दबंग रही अनेक जातियां आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलित हुई हैं। ताजा कदम का उद्देश्य उन बदलावों के मद्देनजर नई संवैधानिक व कानूनी व्यवस्था करना है।

यह ठीक है कि संवैधानिक दर्जा दिए जाने से नए आयोग की ताकत बढ़ जाएगी। नया आयोग अस्तित्व में आने के बाद वह पिछड़े वर्ग में जातियों को लाने और निकालने पर सिफारिश दे सकेगा। ओबीसी में नई जातियों को शामिल करने का अधिकार भी संसद के पास ही होगा। नया आयोग मूल रूप से सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़े लोगों के लिए काम करेगा, लेकिन अहम सवाल है कि सरकार के इस फैसले से आरक्षण को लेकर क्या फर्क पड़ेगा।

सबसे खास बात यह होगी कि राष्ट्रीय स्तर पर किस जाति को पिछड़े वर्ग में रखा जाए और किसे बाहर किया जाए, इसका फैसला केंद्र सरकार की बजाय संसद करेगी। अलबत्ता यह जरूर कहा जा सकता है कि निर्णय संसद में होने का व्यावहारिक अर्थ यह होगा कि सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन की भूमिका उसमें अहम होगी, लेकिन जब ओबीसी आरक्षण के लिए जाट आंदोलन जैसी उलझन में डाल देने वाली स्थिति होगी, तो सरकार पल्ला झाड़ते हुए कह सकेगी कि हमारे हाथ बंधे हुए हैं, फैसला हमें नहीं संसद को करना है।

दूसरे, क्या इस बात की भी आशंका नहीं है कि कोई ऐसा समुदाय, जो संख्याबल में कमजोर हो और राजनीतिक नफा-नुकसान के लिहाज से ज्यादा मायने न रखता हो, उसके आवेदन या उसकी शिकायत को नजरअंदाज कर दिया जाएघ। उल्लेखनीय है कि कोई भी पार्टी वोट के नुकसान के डर से आरक्षण की मांग के खिलाफ मुंह नहीं खोलती। ऐसे में संसद में सियासी समीकरणों से ऊपर उठ कर विचार होगा, इसकी ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती।

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