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झारखंड : आजादी के 70 साल बाद भी पानी के लिए तरस रहे इस गांव के लोग, एक कुंए के भरोसे है पूरा गांव

झारखंड के लातेहार जिला के बोक्काखांड गांव में आजादी के 70 साल बाद भी पानी के लिए गांव वाले तरस रहे हैं। गांव जिला मुख्यालय से मात्र 25 किमी की दूरी पर है जो एक पहाड़ी पर बसा हुआ है।

झारखंड : आजादी के 70 साल बाद भी पानी के लिए तरस रहे इस गांव के लोग, एक कुंए के भरोसे है पूरा गांव

कहा जाता है कि जेठ की दुपहरी में राह चलते किसी प्यासे व्यक्ति को पानी पिला दें तो उससे ज्यादा पुण्य कहीं भी नहीं मिलता लेकिन हर जगह के लोग आपको पानी पिला दें अब ऐसा नहीं रह गया है। क्योंकि जब अपने ही पानी के लाले पड़े हों तो दूसरों को पानी पिलाना कितना महंगा लगता होगा। कुछ ऐसा ही हाल इस समय झारखंड के लातेहार जिला के बोक्काखांड गांव में देखा गया है। गांव जिला मुख्यालय से मात्र 25 किमी की दूरी पर है जो एक पहाड़ी पर बसा हुआ है।

गांव पहुंचने के लिए कायदे की सड़क भी नहीं बनी है। लोग पथरीले रास्ते से होकर आते-जाते हैं। ऐसा इसलिेए यहां है कि आजादी के 70 साल बाद भी इस गांव में विकास कार्यों की योजना नहीं पहुंच पाई है। पानी के लिए इस गांव में सिर्फ एक कुंआ है जिस पर सभी ग्रामीण आश्रित हैं।

गांव वाले हर रोज इसी आस में रहतें हैं कि कोई नेता या अधिकारी आएगा और गांव में सभी के लिए पानी की व्यवस्था होगी लेकिन यह आस केवल एक सपना बनकर रह गया है। क्योंकि अधिकारी व नेता तो दूर गांव का प्रधान भी इस समस्या से मुंह मोड़ लिया है। गांव को नक्सलियों का गढ़ कहकर झूठी अफवाह फैलाया जा रहा है ताकि यहां कोई झांकने भी न आए।

17 परिवारों के लिए एक कुंआ

झारखंड के इस गांव में 17 परिवार हैं जिसमें कुल 50 से 55 लोग रहते हैं। एक कुंआ होने की वजह से गांव में पानी के लिए घंटों लाइन लगाकर पानी भरना पड़ता है। पानी भी बड़ी मशक्कत से मिलती है क्योंकि कुंए की हालत दयनीय है। पानी मानों पाताल में ही चला गया हो। ग्रामीण कहते हैं कि कुंए में पानी की इतनी किल्लत है कि पानी खत्म हो जाता है तो घंटों इंतजार करके कुंए में पानी जुटने का इंतजार करते हैं। बताया जाता है कि पानी पीने लायक भी नहीं होता लेकिन मजबूरी में ग्रामीण इसी को पीकर गुजारा करते हैं।

विकास कार्यों का एकमात्र प्रतीक वो भी विफल

कुंए के बारे में ग्रामीण जुनास भेंगरा ने बताया की कुआं बहुत पुराना है और इसे पूर्वजों ने खुद से बनावाया था। साल 2010 में यह कुआं धंस गया था तो उसे 2011 में मनरेगा के तहत फिर से बनवाया गया। जो इस गांव के विकास कार्यों का एकमात्र प्रतीक है। हालांकि कुआं का जीर्णोधार करने के बाद भी फिर से वही स्थिती हो गयी। साथ ही गांव में पानी की किल्लत तो पहले जैसी है ही। गांव वाले आज भी आस लगाए बैठे हैं कि नई सरकार बनेगी तो गांव में पानी की समस्या दूर होगी।

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