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रिलायंस फाउंडेशन ने बदला किसानों का जीवन स्तर, सबूत हैं ये तस्वीरें

रिलायंस ने ''भारत इंडिया जोडो'' नारे से रिलायंस फाउंडेशन की शुरुआत की। रिलायंस फाउंडेशन ने किसानों की मुश्किलें जैसे पानी की कमी, फसलों का सही दाम न मिलना, उचित फसल न होना आदि।

रिलायंस फाउंडेशन ने बदला किसानों का जीवन स्तर, सबूत हैं ये तस्वीरें
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रिलायंस ने 'भारत इंडिया जोडो' नारे से रिलायंस फाउंडेशन की शुरुआत की। इसका मकसद ग्रामीणों को पूरे भारत से जोड़ना है। रिलायंस फाउंडेशन ने किसानों की मुश्किलें जैसे पानी की कमी, फसलों का सही दाम न मिलना, उचित फसल न होना आदि। इसको लेकर ग्रामीण लोगों के लिए कुछ करने की सोची। लेकिन आज नज़र घुमाए तो फिर भी हमें कई राज्यों के किसानों और गावों की हालत बदहाल दिखाई देती है।

हाल ही में रिलायंस फाउंडेशन की प्रेस मीटिंग हुई जिसमें कई राज्यों से आए किसानों ने उन्हें मुश्किलों से उबारने के लिए फाउंडेशन के योगदान के बारे में बात की। उसी दौरान रिलायंस फाउंडेशन के अधिकारी सुनील श्रीवास्तव से इसी मुद्दे पर हुई बातचीत से जुड़े अंश-

इस फाउंडेशन के शुरुआत करने की क्या वजह रही?

रिलायंस फाउंडेशन 2010 में बना जिसमें सबसे पहले नारा दिया गया था भारत इंडिया जोड़ो। भारत यानी ग्रामीण और इंडिया यानी शहर। इस स्लोगन को इस्तेमाल करने का अर्थ यही था कि ग्रामीणों को इंडिया से जोड़े।

साथ ही इसको शुरु करने की वजह यह रही कि अक्सर सुनने में आ रहा था कि लोग गावों से काम की तलाश में शहरों की ओर रूख कर रहे हैं। मानना यह था कि शहरों में जिंदगी अच्छी है। क्यों ना गांव को विकसित किया जाए, इसी कॉन्सेप्ट को लेकर ही हमने इस प्रोग्राम की शुरुआत की।

गांव में रोजगार का सही मतलब है कृषि। इसिलिए हमने कृषि पर काम करना शुरु किया। वहां के लोगों की परेशानी को सुना और हमने हर एक गांव के लिए मॉडल को तैयार किया। मॉडल इसलिए जरूरी था ताकि इसी के आधार पर हम लोगों को समझा सकें और गावों को आगे ले जा सकें और कृषि बेहतर हो सकें।

रिलायंस फाउंडेशन को जिस मकसद से शुरु किया गया, क्या वह लोगों तक सही से पहुंच पाया है? क्या आपने लोगों की उन सारी समस्याओं को सुना, उनकी जरूरतें क्या है?

फाउंडेशन की शुरुआत करने के बाद हम वहां के लोगों से मिले। हमने जाना कि गावों के लोगों को खेती के लिए कई परेशानियों से गुजरना पड़ता है। जैसे पानी की कमी, मिट्टी की परेशानी, बीज की प्रॉब्लम, खेतों और फसलों में दवाईयों का छिड़काव।

इन परेशानियों को दूर करने के लिए आपने क्या-क्या नई चीजें बनाई, कैसे किसानों की मुश्किलों को कम किया?

हमनें हर एक गांव का विकास का मॉडल बनाया है। जिसको भी हमनें चुना है। हमनें कई गावों को मिलाकर फार्मर्स प्रोड्यूसर ग्रुप की शुरुआत की। इसने किसानों को कई ज्यादा फायदा पहुंचाया है। बता दें कि यह ग्रुप सीधा किसानों को बाजार में उनकी फसल बेचने में मदद करता है। हमने इसके लिए कई कंपनियों की मदद ली है। इससे किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिलता है।

रिलायंस फाउंडेशन ने अभी तक कितने राज्यों और गावों को गोद लिया है और किस हद तक सफल हो पाया है?

फाउंडेशन ने 16 राज्यों और 1400 से ज्यादा गावों को गोद लिया है। हमने गावों को कई पैमाने पर बांटा है जैसे होलिस्टिक, ट्रांसफॉर्मेशनल आदि। हमें लगता है कि यह अभी शुरुआत है और गांवों के लोगों से हमें अच्छा रिस्पॉन्स भी मिला है। आगे हम देखेंगे कि इसमें क्या-क्या बदलाव किए जा सकते हैं।

फार्मर्स प्रोड्यूसर ग्रुप अभी कितने राज्यों में है और इसका फायदा क्या है?

अभी फार्मर्स प्रोड्यूसर ग्रुप 16 राज्यों में हर एक-एक है। लेकिन अभी इसको और बनाने की जरूरत है। फार्मर्स प्रोड्यूसर ग्रुप 20 से 40 गावों का एक साथ बनता है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसानों को पहले बिचौलियों को बेचना पड़ता था लेकिन अब उन्हें उनसे मुक्ति मिलेगी। फार्मर्स प्रोड्यूसर ग्रुप के बल पर किसान वहीं पर अपनी सारी फसल बेच सकते हैं और वहीं से ही पूरा माल मंडियों में बेचा जाएगा।

ऐसे कई जिले और गांव हैं जहां पर किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिलता। नतीजा आत्महत्या और फसलों को सड़कों पर फेंक देना। कहां कमी मानते हैं आप?

देखिए जहां पर फार्मर्स प्रोड्यूसर ग्रुप बनाया गया है वहां पर इस बात की कोई शिकायत नहीं आई है। किसानों को वहां पर उचित मूल्य मिल रहा है। मुझे लगता है कि इसकी पूरे देश को जरूरत है। वहां पर फार्मर्स प्रोड्यूसर ग्रुप की स्थापना होनी चाहिए।

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