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हैप्पी होली 2019: तकनीकी रंग डिजिटल होली के संग

अड़ोसी-पड़ोसी का तो छोड़िए, खुद मेरे घर में कोई मुझसे होली नहीं खेलना चाहता। सब अपना-अपना मोबाइल हाथ में थामे, कोने में बैठे रहते हैं। वहीं से अपने दोस्तों, रिश्तेदारों को होली विश कर देते हैं। सेल्फी लेते हैं तो उसमें ‘ब्यूटी एप’ से रंग भर देते हैं। सामने वाले को लगता है, ये चेहरे ‘गीले रंगों’ से पुते हुए हैं।

हैप्पी होली 2019: तकनीकी रंग डिजिटल होली के संग
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Happy Holi 2019

अड़ोसी-पड़ोसी का तो छोड़िए, खुद मेरे घर में कोई मुझसे होली नहीं खेलना चाहता। सब अपना-अपना मोबाइल हाथ में थामे, कोने में बैठे रहते हैं। वहीं से अपने दोस्तों, रिश्तेदारों को होली विश कर देते हैं। सेल्फी लेते हैं तो उसमें ‘ब्यूटी एप’ से रंग भर देते हैं। सामने वाले को लगता है, ये चेहरे ‘गीले रंगों’ से पुते हुए हैं।

मोबाइल पिचकारी बने हुए हैं। रंग चेहरों पर नहीं, एक-दूसरे के स्टेटस पर लगाए और डाले जा रहे हैं। ‘होली की शुभकामनाएं’ गले मिलकर नहीं, ‘व्हाट्सएप’ कर दी जा रही हैं। कमाल यह है कि ‘बुरा’ कोई नहीं मान रहा। सब अपनी-अपनी ‘डिजिटल होली’ में व्यस्त हैं।

इससे इतर, होली का एक दौर ऐसा भी गुजरा है, जब फिजा अबीर-गुलाल की रंगत से सराबोर रहती थी। चेहरे नीले, पीले, लाल, गुलाबी रंगों से पुते नजर आते थे।

बच्चों की टोलियां ‘होली का टैंपू हाई है’ का शोर मचाती गली-मोहल्लों से निकला करती थीं। राह चलता शायद ही ऐसा कोई शख्स होता हो, जो सूखा घर जा पाता हो।

‘बुरा मानने’ का चलन तब कुछ ऐसा था, लगता नहीं था कि अगला बुरा माना भी है। तब गले एक-दूसरे से ‘गले मिलने’ को बेताब रहते थे। उस समय के रंग बेहद गाढ़े होते थे।

अरे, मैं भी आपको किस दौर में ले गया। कहते हैं, जैसा समय और देश हो उसी के भेष में ढल जाना चाहिए। इसी को हमने अपनाया और देखिए हम अब पूरी तरह बदल चुके हैं।

खुद को हमने इस हद तक बदल लिया कि अब हम घर बैठे ही अपने-अपने मोबाइल पर एक-दूसरे के साथ ‘डिजिटल होली’ खेल रहे हैं। यह पूर्णतः ‘सूखी होली’ है। न रंग लगाने का झंझट, न रंग छुड़ाने में मेहनत। न जिद न जोर-जबर्दस्ती। न तन गीला, न मन गीला, न कपड़े गीले।

आलम यह है कि अगर किसी से होली खेलने को कह भी दो तो अगला घूरकर यों देखता है, मानो उसे उसकी जमीन-जायदाद अपने नाम लिखवाने की धमकी दे दी हो। अड़ोसी-पड़ोसी का तो छोड़िए, खुद मेरे घर में कोई मुझसे होली नहीं खेलना चाहता।

सब अपना-अपना मोबाइल हाथ में थामे कोने में बैठे रहते हैं। वहीं से अपने दोस्तों, रिश्तेदारों को होली विश कर देते हैं। सेल्फी लेते हैं तो उसमें ‘ब्यूटी एप’ से रंग भर देते हैं। सामने वाले को लगता है, ये चेहरे ‘गीले रंगों’ से पुते हुए हैं, ‘डिजिटल रंगों’ से नहीं।

बच्चे तो बच्चे अब तो बीवी भी उन्हीं के डिजिटल रंग में रंग गई है। एक जमाना वो भी था, जब बीवी होली के रंगों की दीवानी थी। रंग खेलते थकती न थी।

उसकी ‘रंगबाजी’ का सबसे ज्यादा शिकार मैं ही हुआ करता था। मगर अब तो पूरा सीन ही बदल गया है। अब वो होली खेलने के इकरार से ही भड़क जाती है।

बच्चों की देखा-देखी मुझे भी रंग-बिरंगी ‘इमोजी’ भेजकर अपनी होली सेलिब्रेट कर लेती है। ज्यादा कुछ कह भी नहीं सकता। आखिर बीवी है। साथ रहना है। पानी में रहकर मगर से वैर तो ले नहीं सकता।

रंग लगाने के बहाने ही सही कुछ नए कोमल चेहरे ही छूने को मिल जाया करते थे। थोड़ी-बहुत हंसी-ठिठोली भी हो जाती थी। जाम और भांग का असर अपना ही मजा देता था।

क्या सीन होता था जब ‘रंग बरसे भीगे चुनर वाली रंग बरसे…’ पर सब झूमते थे। मदहोश। बेहोश। अब तो सारे कांड मोबाइल, व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर पर ही हो जाते हैं।

नाच भी सब उसी पर लेते हैं। जाम भी उसी पर खनखना लेते हैं। बाकी जो कुछ कहना-सुनना होता है, उसके लिए तरह-तरह की प्रचलित ‘इमोजियां’ हैं ही।

और तो और पिचकारी भी अब डिजिटल हो गई है। बीवी ने वही ‘डिजिटल पिचकारी’ तो मुझे ‘हैप्पी होली’ लिखकर व्हाट्सएप की थी। अब ऐसी ‘डिजिटल पिचकारी’ से होली खेलकर क्या फायदा, जिसकी धार तन को ही न भिगो सके। खैर...।

मैंने भी अब दिमाग पर ज्यादा लोड लेना बंद कर दिया है। मैं भी घर बैठकर ‘डिजिटल होली’ ही खेल रहा हूं। होली के एक मैसेज को पचास-सौ लोगों के बीच व्हाट्सएप कर देता हूं।

कोई गुझिया खिलाने को कहता है तो उसकी फोटो भेज देता हूं। रंग खेलने को बोलता है तो रंगीन इमोजी आगे बढ़ा देता हूं और पाता हूं कि लोग ऐसे में ही खुश हैं।

डिजिटल होली उन्हें ज्यादा भाती है बनिस्पत एक-दूसरे से गले मिलने के। जैसा समाज वैसे हम। अभी तो यह ‘डिजिटल होली’ का समय है, आगे हो सकता है, रोबोट हमारी जगह होली खेलने लगें और हम उन्हें खेलते हुए देखें।

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