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शरद पूर्णिमा 2019 : छत्तीसगढ का एक ऐसा गांव जहां शरद पूर्णिमा में होता है रावण दहन

Sharad Purnima 2019 आपने देखा और सुना होगा कि दशहरा पर्व के दिन ही पूरे देश में रावण का दहन किया जाता हैं। लेकिन छग के एक ऐसा गांव जहां अंग्रेजों के शासनकाल से शरण पूर्णिमा के दिन इस गांव में रावण का दहन किया जा रहा है। कांकेर जिले के राजा कोमलदेव स्वयं गांव में आयोजित पर्व के साक्षी बन चुके है। जिले के ग्राम चिल्हाटी में आज भी 70 साल पुराने इस पर्व को पं. देबीलाल शर्मा की स्मृति में शरण-पूर्णिमा के दिन मनाया जा रहा हैं।

शरद पूर्णिमा 2019 : छत्तीसगढ का एक ऐसा गांव जहां शरद पूर्णिमा में होता है रावण दहन
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छत्तीसगढ़ / राहुल शर्मा : कांकेर जिले के भानुप्रतापपुर ब्लाक के ग्राम चिल्हाटी का नाम लेकर लोग आज भी गौरवान्वित महसूस करते है। दरअसल इस परंपरा की शुरूआत तब से चली आ रही है, जब उस जमाने में कांकेर के राजा कोमलदेव हुआ करते थे। चिल्हाटी गांव के प्रतिष्ठित नागरिक भूमिशंकर साहू से हरिभूमि ने चर्चा की। उन्हे विरासत की परंपरा की जानकारी उनकी माता अग्निबाई ने दी थी। श्री साहू ने बताया कि राजा का विवाह चिल्हाटी में एक रानी के साथ हुआ था। चिल्हाटी गांव रानी का मायका हुआ करता था। उन्होने बताया कि उस दौरान कांकेर राज्य हुआ करता था। इस पर्व को भव्य तरीके से मनाने का प्रस्ताव राजा के सामने रखा गया था। उस समय गांव के आचार्य पं. देबीलाल शर्मा के नेतृत्व में ग्रामीणों ने राजा के समक्ष प्रस्ताव रखा था। उन्होने रानी का मायका चिल्हाटी होने के कारण दशहरा के इस पर्व को भव्य तरीके से मनाने का प्रस्ताव राजा के सामने रखा था। अमूमन उस दौरान ऐसे किसी पर्व का आयाेजन राजा की अनुमति पर नही हुआ करता था। लेकिन आचार्य पं. देबीलाल शर्मा के इस प्रस्ताव को राजा ने स्वीकार कर लिया। उन्होने रानी का मायका चिल्हाटी गांव होने के कारण दशहरा पर्व मनाने की अनुमति दे दी। आज भी उस पुरानी परंपरा के साक्षी ग्रामीण शरण-पूर्णिमा के दिन बनते है। इस परंपरा का कायम रखने में स्व. ललतू राम और्सा, स्व. भागवतराम यदु, दयाराम ठाकुर, भूमिशंकर साहु, स्व. गोविंदराम सेन, रामजी भूआर्य, बलराम आंधिया, नारायण चुरेन्द्र, यमुना प्रसाद यदु योगदान आज भी कर रहे हैं।

आज गांव में रावण दहन का कार्यक्रम

ग्रामीणो के अनुसार दशहरा पर्व एक ही दिन होने के कारण चिल्हाटी में होने वाले पर्व में लोग शामिल नही हो पाते थे। ऐसी स्थिति में गांव के ही आचार्य पं. देबीलाल ने इसे शरण-पूर्णिमा के दिन पर्व मनाने का फैसला लिया। जिसके बाद आज तक गांव में रावण-दहन के साथ रामलीला कार्यक्रम, कबड्डी प्रतियोगिता और विशेष रूप से शेर डांस का आयोजन किया जाता हैं।

तीन किमी तक चलता है रावण, नाचता भी है

चिल्हाटी गांव में बनाए जाने वाला रावण ऐसा पहला ही होगा कि यह बकायदा तीन किलाेमीटर तक चलता है। यही नही राम-लक्ख्ण के जुलूस के दाैरान यह रावण नाचता भी है। ग्रामीणों ने बताया कि अंग्रेज काल से यह परंपरा आज भी चल रही है। जहां बीस से तीस फूट पुट्टे से बने रावण में एक कलाकार अंदर प्रवेश होता हैं। जिसकी सहारा रावण चलता भी हैं और नाचता भी हैं।

घुड़सवार होकर आते थे राजा

ग्रामीणों ने बताया कि राजा कोमलदेव के प्रस्ताव पर चिल्हाटी में दशहरा पर्व का आयोजन पं. देबीलाल शर्मा के नेतृत्व किया जाता है। ग्रामीणों ने बताया गया कि पर्व में शामिल होने राजा घोड़े में सवार होकर कांकेर से चिल्हाटी तीस किलोमीटर का सफर कर यहां पहुंचते थे। चिल्हाटी में राजा-रानी के मौजूदगी में दशहरा पर्व मनाया जाता था। जिसे आज भी गांव में उसी तरह मनाया जा रहा हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की गुहार

अंग्रेजो के शासन काल से चली आ रही इस परंपरा को राजा के शासनकाल के बाद आचार्य पं. देबीलाल शर्मा ने थमने नही दिया। बल्कि उन्होने ने अपने दम पर इस पर्व को आगे चलाने का बीडा उठाया। जिसके बाद उनके छोटे भाई दीपचंद शर्मा के नेतृत्य में पर्व चलता रहा। वही अब ग्रामीण मिल-जुलकर परंपरा को आगे बढा रहे है। बस गांव वालो को सरकार से कार्यक्रम के लिए अनुदान की उम्मीद हैं। ताकि पर्व को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने के साथ ही इसे भव्य तरीके से मनाया जा सके।

परंपरा शुरू कर अमर हो गए देबीलाल

भूमि शंकर साहू ने बताया कि पं. देबीलाल शर्मा के द्वारा शुरू किया गया यह कार्यक्रम आज भी चलता आ रहा हैं। उन्होने बताया कि पं. देबीलाल बाल ब्रम्हचारी थे। ग्रामीणों के अनुसार उनके देव पुरूष का भी दर्जा दिया गया हैं। आज भी गांव में उनके आलौकिक किस्से की चर्चा होती है। यही कारण हैं कि ग्रामीणा उन्हें गांव का महात्मा भी कहते है।

रियासतकाल की परंपरा कायम

पं. देबीलाल महराज की अगुवाई में राजा से अनुमति मिलने के बाद पर्व को भव्य तरीके से मनाया जाता है। आज भी गांव में हजारों की संख्या में लोग प्रदेशभर से आते हैं।

भूमि शंकर साहू

वरिष्ठ नागरिक

चलती रहेगी परंपरा

आचार्य पं. देबीलाल शर्मा द्वारा शुरू किया गया पर्व आज भी चलती आ रही हैं। यह परंपरा आज भी कायम है और आगे भी चलती रहेगी।

आचार्य पं. दिनेश शर्मा

पं. देबीलाल के भतीजे

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