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Sawan 2019 : सावन का महत्व, पूजा विधि, कथा और शिवरात्रि पर जल चढ़ाने का शुभ समय

श्रवण मास को सावन का महिना कहा जाता है। हिंदू शास्त्रों में सावन की शिवरात्रि का महत्व, पूजा विधि कथा को विस्तार से बताया गया है। सावन का महिना 2019 में 17 जुलाई 2019 से प्रारंभ हो रहा है। सावन का पहला सोमवार का व्रत 22 जुलाई को रखा जाएगा जबकि सावन की शिवरात्रि पर जल चढ़ाने का शुभ समय 2019 में 30 जुलाई सुबह 9 बजे से दोपहर 2 बजे तक है।

Sawan 2019 : सावन का महत्व, पूजा विधि, कथा और शिवरात्रि पर जल चढ़ाने का शुभ समयSawan 2019 Shravan Month 2019 Sawan Importance Puja Vidhi Katha sawan shivratri jal time 2019

Sawan 2019 सावन के महिने का महत्व , पूजा विधि और कथा के बारे में जानना अत्यंत आवश्यक है। सावन के महिने में भगवान शिव की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। शास्त्रों के अनुसार सावन के महिने में भगवान शिव पृथ्वीं लोक पर भ्रमण करते हैं। सावन के महिने में भगवान शिव का रुद्रभिषेक (Bhagwan shiv rudrabhishek on Sawan month) करने से जीवन के सभी कष्टों से छुटकारा मिलता है। सावन के महिने में पड़ने वाले सोमवार को भी विशेष माना जाता है। सावन के सोमवार पर भगवान शिव की पूजा (Bhagwan Shiv Ki Puja) करने से सभी सुखों की प्राप्ति होती है। अगर कोई कुंवारी कन्या सावन के सोमवार का व्रत (Sawan Somwar Vrat) रखती है तो उसे मनचाहा वर प्राप्त होता है। तो आइए जानते हैं सावन का महत्व, पूजा विधि, कथा और सावन शिवरात्रि पर जल चढ़ाने का शुभ समय के बारे में...


सावन 2019 तिथि (Sawan 2019 Tithi)

17 जुलाई 2019

Sawan Shivratri 2019 Puja Muhurat

रात्रि प्रथम प्रहर पूजा समय - रात 07:10 से 09:49 तक

रात्रि द्वितीय प्रहर पूजा समय - रात 09:49 से सुबह 12:28 (31 जुलाई 2019)

रात्रि तृतीय प्रहर पूजा समय - सुबह 12:28 से सुबह 03:07 (31 जुलाई 2019)

रात्रि चतुर्थ प्रहर पूजा समय - सुबह 03:07 से 05:46 तक (31 जुलाई 2019)

चतुर्दशी तिथि (Chatrudarshi Tithi)

चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ - जुलाई 30, 2019 को रात 02 बजकर 49 मिनट से

चतुर्दशी तिथि समाप्त - जुलाई 31, 2019 को सुबह 11 बजकर 57 तक बजे


(Sawan Shivratri Jal Time 2019)

सावन की शिवरात्रि पर जल चढ़ाने का शुभ समय सुबह 9 बजे से दोपहर 2 बजे तक है।


सावन का महत्व (Sawan Ka Mahatva)

शास्त्रों में सावन के महीने का बहुत ही ज्याद महत्व बताया गया है। माना जाता है भगवान विष्णु के निद्रा अवस्था में जाने के बाद भगवान शिव पृथ्वीं का कार्यभार संभालते हैं। इस महिने में जो व्यक्ति भगवान शिव का विधिवत पूजन करता है। उसे जीवन के सभी कष्टों से छुटकारा मिलता है।

भगवान शिव का सावन के महिने रुद्रभिषेक करने से जीवन के सभी सुखों की प्राप्ति होती है। इसिलिए लोग सावन के महिने में कावड़ लेने जाते हैं और पवित्र नदी का जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करते हैं।

सावन की शिवरात्रि पर भगवान शिव की विशेष पूजा अर्चना की जाती है और अगर शिवरात्रि के दिन अगर सोमवार पड़ जाए तो इस दिन भगवान शिव का विशेष आर्शीवाद प्राप्त होता है। सावन माह के सोमवार को भी विशेष महत्व दिया जाता है। पुराणों के अनुसार जो भी कन्या सावन के सोमवार का व्रत रखती है।

उसे मनचाहा वर प्राप्त होता है। यदि कोई सुहागन स्त्री भी सावन के सभी सोमवार का व्रत रखती है तो उस स्त्री के पति की उम्र तो लंबी होती ही है साथ ही उस स्त्री के घर में धन लाभ और सुख और शांति का वास भी होता है।


सावन व्रत पूजा विधि (Sawan Vrat Puja Vidhi)

1.सावन के महिने में पूजा करने वाले व्यक्ति को सबसे पहले जल्दी उठना चाहिए। इसके बाद नहाकर साफ वस्त्र धारण करें।

2. इसके बाद शिव मंदिर में जाएं वहां जाकर भगवान शिव को सफेद फूल, अक्षत्, भांग, धतूरा, सफेद चंदन चढ़ाएं।

3. इसके बाद तांबे का लौटा लेकर भगवान शिव को जल अर्पित करें ।

4.जल चढ़ाने के बाद भगवान शिव को धूपबती आदि दिखाकर आरती उतारें।

5.इसके बाद वहीं बैठकर भगवान शिव के मंत्रों और शिव चालीसा का पाठ करें।


सावन व्रत कथा ( Sawan Vrat Katha)

शिव पुराण के अनुसार नारद मुनि ने भगवान शिव से पूछा कि उन्हें सावन मास ही इतना प्रिय क्यों है। यह सुन भगवान शंकर बताते हैं कि हैं कि देवी सती ने हर जन्म में उन्हें पति रूप में पाने का प्रण लिया था और इसके लिए उन्होंने अपने पिता की नाराजगी को भी सहा। एक बार पिता द्वारा शिव को अपमानित करने पर देवी सती ने शरीर त्याग दिया।

इसके पश्चात देवी ने हिमालय और नैना पुत्री पार्वती के रूप में जन्म लिया। इस जन्म में भी शिव से विवाह के लिए देवी ने सावन माह में निराहार रहते हुए कठोर व्रत से भगवान शिवशंकर को प्रसन्न कर उनसे विवाह किया। इसलिये सावन मास से ही भगवान शिव की कृपा के लिये सोलह सोमवार के उपवास आरंभ किये जाते हैं।

पौराणिक ग्रंथों में एक कथा और मिलती है। बहुत समय पहले की बात है कि क्षिप्रा किनारे बसे एक नगर में भगवान शिव की अर्चना के लिए बहुत साधु और सन्यासी एकत्र हुए। समस्त ऋषिगण क्षिप्रा में स्नान कर सामुहिक रूप से तपस्या आरंभ करने लगे। उसी नगरी में एक गणिका भी रहती थी जिसे अपनी सुंदरता पर बहुत अधिक गुमान था। वह किसी को भी अपने रूप सौंदर्य से वश में कर लेती थी।

उसने जब साधुओं के पूजा और तप किये जाने की खबर सुनी तो उसने उनकी तपस्या को भंग करने की सोची। इन्हीं उम्मीदों को लेकर वह साधुओं के पास जा पंहुची। लेकिन यह क्या ऋषियों के तपोबल के आगे उसका रूप सौंदर्य फिका पड़ गया।


भगवान शिव के मंत्र ( Bhagwan Shiv Ke Mantra)

1.नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय

नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे न काराय नम: शिवाय:॥

मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय

मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मे म काराय नम: शिवाय:॥

शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय

श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै शि काराय नम: शिवाय:॥

अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम्।

अकालमृत्यो: परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम्।।

2.सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम्।

भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये ।।

कावेरिकानर्मदयो: पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय।

सदैव मान्धातृपुरे वसन्तमोंकारमीशं शिवमेकमीडे।।

3.ॐ ब्रह्म ज्ज्ञानप्रथमं पुरस्ताद्विसीमतः सुरुचो वेन आवः |

स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च विवः ||

4.ॐ नमः श्वभ्यः श्वपतिभ्यश्च वो नमो नमो भवाय च रुद्राय च नमः |

शर्वाय च पशुपतये च नमो नीलग्रीवाय च शितिकण्ठाय च ||

5.ॐ नमः कपर्दिने च व्युप्त केशाय च नमः सहस्त्राक्षाय च शतधन्वने च |

नमो गिरिशयाय च शिपिविष्टाय च नमो मेढुष्टमाय चेषुमते च ||


भगवान शिव की आरती (Bhagwan Shiv Ki Aarti)

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।

हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।

त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।

त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।

सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूलधारी।

सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।

मधु-कैटभ दो‌उ मारे, सुर भयहीन करे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा।

पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।

भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।

शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।

नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।

कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥


सावन के उपाय (Sawan Ke Upay)

1.भगवान शिव को सावन के महिनें में बेलपत्र अर्पित करने से मनोंवांछित इच्छाएं पूर्ण होती है। इसलिए सावन के महिने में भगवान शिव को बेलपत्र अवश्य अर्पित करें।

2. भगवान शिव को सावन के महिने में जल के अंदर दूध मिलाकर अर्पित करने से शिक्षा में आ रही सभी बाधा समाप्त होती है।

3.भगवान शिव को शिवरात्रि के दिन गंगा जल मिलाकर जल चढ़ाने से रोजगार में आ रही सभी समस्याएं समाप्त होती है।

4.भगवान शिव को सावन के महिने में इत्र अर्पित करने से उत्तम स्वास्थय की प्राप्ति होती है। इसलिए सावन के महिने में भगवान शिव को इत्र अवश्य अर्पित करें।

5.सावन के महिने में भगवान शिव को शुद्ध देशी घी अर्पित करने से संतान संबंधी सभी बाधाएं समाप्त होती है।

शिवरात्रि का महत्व

शास्त्रों में सावन की शिवरात्रि के दिन विधि विधान से पूजा करके भगवान शिव के करीब पहुचंने का सबसे सरल मार्ग बताया गया है। सावन भगवान शिव का सबसे प्रिय माह होता है। इसमें शिव पर मात्र जल चढ़ाने से सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। लेकिन सावन मास की त्रयोदशी को शिवरात्रि भी कहा जाता है। इस दिन लोग शिव पर जल चढ़ाने के लिए कई किलोमीटर का सफर नंगे पैर चलकर तय करते हैं। जिसे आम बोलचाल की भाषा में कांवड लाना कहा जाता है।

शिवरात्रि को शिव की रात कहा जाता है। इसलिए शिवपुराण और शास्त्रों में सावन की शिवरात्रि का विशेष महत्व बताया गया है। रात का यहां अर्थ अंधकार से होता है। जो हर और विद्यमान है यानि अंधकार का कोई स्त्रोत नहीं है। यह अपने-आप में एक स्त्रोत है। इसके हर जगह मौजूद होने को ही हम शिव कहते हैं। क्योंकि शिव का भी कोई आरंभ और अंत के बारे में नहीं जानता है। वो अनंत हैं। लेकिन जब इस अंधकार में ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न होता है, तो मानव उस परात्मा से मिल जाता है।

इसलिए साधक हमेशा अपनी प्रार्थना में कहता है, हे ईश्वर, मुझे नष्ट कर दो ताकि मैं आपके समान हो जाऊँ। ऐसा ही शिवरात्रि के दिन साधकों के अलावा अन्य व्यक्ति भी अपने अंदर के अंधकार को दूर करके सृजन के उस असीम स्त्रोत का अनुभव करने का प्रयास करता है जो प्रत्येक मनुष्य में बीज रूप में उपस्थित है।

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