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Ratha Saptami 2020 Date : रथ सप्तमी 2020 में कब है, जानिए शुभ मुहूर्त, महत्व, पूजा विधि और रथ सप्तमी की कथा

Ratha Saptami 2020 Date : रथ सप्तमी को अचला सप्तमी,सूर्य सप्तमी, सूर्य व्रत सप्तमी और आर्य व्रत सप्तमी के नाम से भी जाना जाता है, इस व्रत को करने से अरोग्यता का वरदान प्राप्त होता है तो चलिए जानते हैं रथ सप्तमी 2020 में कब है (Ratha Saptami 2020 Mai Kab Hai),रथ सप्तमी का शुभ मुहूर्त (Ratha Saptami Ka Subh Muhurat), रथ सप्तमी का महत्व (Ratha Saptami Importance), रथ सप्तमी की पूजा विधि (Ratha Saptami Puja Vidhi)और रथ सप्तमी की कथा (Ratha Saptami Ki Katha)

Ratha Saptami 2020 Date And Time in India : रथ सप्तमी 2020 में कब है, जानिए शुभ मुहूर्त, महत्व, पूजा विधि और रथ सप्तमी की कथाRatha Saptami 2020 Date And Time in India : रथ सप्तमी 2020 में कब है, जानिए शुभ मुहूर्त, महत्व, पूजा विधि और रथ सप्तमी की कथा

Ratha Saptami 2020 Date : रथ सप्तमी को भगवान सूर्य की पूजा (Lord Surya Puja) की जाती है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को रथ सप्तमी का व्रत (Ratha Saptami Vrat) किया जाता है तो चलिए जानते हैं शास्त्रों के अनुसार इस दिन से भगवान सूर्य ने सारे जगत को अपना प्रकाश प्रदान किया था रथ सप्तमी 2020 में कब है, रथ सप्तमी का शुभ मुहूर्त, रथ सप्तमी का महत्व, रथ सप्तमी की पूजा विधि और रथ सप्तमी की कथा


रथ सप्तमी 2020 तिथि (Ratha Saptami 2020 Tithi)

1 फरवरी 2020

रथ सप्तमी 2020 शुभ मुहूर्त (Ratha Saptami 2020 Subh Muhurat)

रथ सप्तमी के दिन स्नान मूहूर्त - सुबह 5 बजकर 09 मिनट से सुबह 6 बजकर 48 मिनट तक

रथ सप्तमी के दिन अरुणोदय - सुबह 6 बजकर 26 मिनट (1 फरवरी 2020)

रथ सप्तमी के दिन अवलोकनीय सूर्योदय - सुबह 6 बजकर 48 मिनट (1 फरवरी 2020)

सप्तमी तिथि प्रारम्भ - दोपहर 3 बजकर 51 मिनट से (31 जनवरी 2020 )

सप्तमी तिथि समाप्त - सुबह 6 बजकर 10 मिनट तक (1 फरवरी 2020)


रथ सप्तमी का महत्व (Ratha Saptami Ka Mahtva)

सूर्य देव को जाग्रत देवता की संज्ञा दी गई और रथ सप्तमी के दिन भगवान सूर्य की पूजा की जाती है। इस दिन जो व्यक्ति सूर्य देव की पूजा करता है। उसे धन, संतान और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है। सूर्य देव को पूरे ब्राह्मांड की ऊर्जा का कारक माना जाता है। प्राचीन ज्योतिष शास्त्र और आधुनिक विज्ञान में भी सूर्य को अत्याधिक महत्व दिया गया है। माना जाता है सूर्य की रोशनी जीवों और वनस्पतियों के लिए पोषक और वृद्धिकारक होती है।

इस व्रत को करने से शरीर को आरोग्यता प्राप्त होती है। इसलिए इस व्रत को आरोग्यता कारक माना जाता है। इतना ही नहीं जो भी व्यक्ति इस दिन किसी गरीब व्यक्ति या ब्राह्मण को दान देता है उसे जीवन के सभी सुखों की प्राप्ति होती है। इस व्रत के नियमों का पालन षष्ठी तिथि से ही किया जाता है। इसलिए इस षष्ठी तिथि को केवल एक समय ही भोजन किया जाता है। रथ सप्तमी का व्रत महिलाएं मुख्य रूप से करती हैं इसलिए इस व्रत को ओर सप्तमी के नाम से भी जाना जाता है।


रथ सप्तमी पूजा विधि (Ratha Saptami Puja Vidhi)

1. रथ सप्तमी के दिन सूर्यदेव की पूजा करने वाले साधक को षष्ठी तिथि से ही नमक का त्याग कर देना चाहिए और एक समय ही भोजन करना चाहिए।

2. इस दिन सबसे पहले सूर्योदय से पूर्व उठकर किसी पवित्र नदी, तालाब या सरोवर में स्नान करें और लाल रंग के वस्त्र धारण करें।

3. इसके बाद एक ताबें के पात्र में जल, गंगाजल, रोली और लाल पुष्प डालें और सूर्य को जल देने से पहले सिर पर आक के सात पत्ते रखें।

4. आक के पत्ते रखने के बाद नमस्कार मुद्रा में खड़े हो जाएं।

5. इसके बाद किसी गमले को अपने सामने रखें। जिससे सूर्य को जल देते समय वह जल आपके पैरों में न आए।

6. इसके बाद नमस्ते रुद्ररूपाय रसानां पतये नम:। वरुणाय नमस्तेअस्तु मंत्र का जाप करें आप चाहें तो ऊं घृणि सूर्याय नम:। मंत्र का जाप भी कर सकते हैं।

7. इन मंत्रों का जाप करते हुए सूर्य को जल अर्पित करें।

8. इसके बाद वहीं बैठकर आदित्य हृदय स्रोत का पाठ भी करें।

9. इसके बाद भगवान सूर्य से पूजा में किसी भी प्रकार की हुई भूल के क्षमा याचना करें।

10. रथ सप्तमी के दिन दान को भी विशेष महत्व दिया जाता है। इसलिए इस दिन गेहूं, लाल वस्त्र, तांबा और स्वर्ण आदि वस्तुएं किसी गरीब व्यक्ति या ब्राह्मण को अवश्य दान में दें।


रथ सप्तमी की कथा (Ratha Saptami ki Katha)

रथ सप्तमी की कथा के अनुसार द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण के पुत्र शाम्ब को अपने शारीरीक बल पर अत्याधिक अभिमान हो गया था। एक बार जब दुर्वासा ऋषि भगवान श्री कृष्ण से मिलने के लिए गए तब शाम्ब ने दुर्वासा ऋषि के कमजोर शरीर को देखा और हंसने लगे। इस बात पर ऋषि को अत्याधिक क्रोध आया और क्रोध की ज्वाला में जल रहे ऋषि ने शाम्ब को श्राप दे दिया। जिससे शाम्ब कुष्ठ रोग से ग्रसित हो गया। जिससे उसका बलिष्ठ पन कुरूप हो गया।

दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण शाम्ब को कुष्ठ रोग हो गया। शाम्ब का जड़ी बूटियों के द्वारा उपचार किया गया। लेकिन ऋषि दुर्वासा के श्राप के प्रभाव के कारण कुछ भी शाम्ब पर असर न कर सका। तब भगवान श्री कृष्ण ने अपने पुत्र को भगवान सूर्यदेव की उपासना करने के लिए कहा। पिता की आज्ञा का पालन करते हुए शाम्ब ने भगवान सूर्यदेव की उपासना की जिसके परिणाम स्वरूप कुछ समय के बाद शाम्ब कुष्ठ रोग से मुक्त हो गया।


भगवान सूर्य के मंत्र (Bhagwan Surya Ke Mantra)

1.नमस्ते रुद्ररूपाय रसानां पतये नम:। वरुणाय नमस्तेअस्तु

2.ऊं घृ‍णिं सूर्य्य: आदित्य:

3.ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजो राशे जगत्पते, अनुकंपयेमां भक्त्या, गृहाणार्घय दिवाकर:।

4. ॐ ह्रीं घृणिः सूर्य आदित्यः क्लीं ॐ ।

5. ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमः ।


सूर्य देव की आरती (Surya Dev Ki Aarti)

ऊँ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान।

जगत् के नेत्र स्वरूपा, तुम हो त्रिगुण स्वरूपा।

धरत सब ही तव ध्यान, ऊँ जय सूर्य भगवान॥

॥ ऊँ जय सूर्य भगवान...॥

सारथी अरूण हैं प्रभु तुम, श्वेत कमलधारी। तुम चार भुजाधारी॥

अश्व हैं सात तुम्हारे, कोटी किरण पसारे। तुम हो देव महान॥

॥ ऊँ जय सूर्य भगवान...॥

ऊषाकाल में जब तुम, उदयाचल आते। सब तब दर्शन पाते॥

फैलाते उजियारा, जागता तब जग सारा। करे सब तब गुणगान॥

॥ ऊँ जय सूर्य भगवान...॥

संध्या में भुवनेश्वर अस्ताचल जाते। गोधन तब घर आते॥

गोधुली बेला में, हर घर हर आंगन में। हो तव महिमा गान॥

॥ ऊँ जय सूर्य भगवान...॥

देव दनुज नर नारी, ऋषि मुनिवर भजते। आदित्य हृदय जपते॥

स्त्रोत ये मंगलकारी, इसकी है रचना न्यारी। दे नव जीवनदान॥

॥ ऊँ जय सूर्य भगवान...॥

तुम हो त्रिकाल रचियता, तुम जग के आधार। महिमा तब अपरम्पार॥

प्राणों का सिंचन करके भक्तों को अपने देते। बल बृद्धि और ज्ञान॥

॥ ऊँ जय सूर्य भगवान...॥

भूचर जल चर खेचर, सब के हो प्राण तुम्हीं। सब जीवों के प्राण तुम्हीं॥

वेद पुराण बखाने, धर्म सभी तुम्हें माने। तुम ही सर्व शक्तिमान॥

॥ ऊँ जय सूर्य भगवान...॥

पूजन करती दिशाएं, पूजे दश दिक्पाल। तुम भुवनों के प्रतिपाल॥

ऋतुएं तुम्हारी दासी, तुम शाश्वत अविनाशी। शुभकारी अंशुमान॥

॥ ऊँ जय सूर्य भगवान...॥

ऊँ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान।

जगत के नेत्र रूवरूपा, तुम हो त्रिगुण स्वरूपा॥

धरत सब ही तव ध्यान, ऊँ जय सूर्य भगवान॥

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