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रमज़ान 2018: इंसान को गुनाह से बचने की कुव्वत का एहसास कराता है ''माह-ए-रमज़ान''

रमज़ान का मकसद खुद को गलत काम करने से रोकने की ताकत पैदा करना या उसे पुनर्जीवित करना है।

रमज़ान 2018: इंसान को गुनाह से बचने की कुव्वत का एहसास कराता है माह-ए-रमज़ान
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रूह को पाक करके अल्लाह के करीब जाने का मौका देने वाला रमज़ान का मुक़द्दस (पवित्र) महीना हर इंसान को अपनी जिंदगी सही राह पर लाने का पैगाम देता है।

चांद के दीदार के साथ शुरू होता है माह-ए-रमज़ान

भूख-प्यास की तड़प के बीच जबान से रूह तक पहुंचने वाली खुदा की इबादत हर मोमिन को उसका खास बना देती है। हर साल चांद के दीदार के साथ शुरू होने वाले माह-ए-रमज़ान की शुरुआत इस साल 18 मई से होगी।

खुद को हर बुराई से बचाकर अल्लाह के नजदीक ले जाने की यह सख्त कवायद हर मुसलमान के लिये खुद को पाक-साफ करने का सुनहरा मौका होता है।

ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता मौलाना खलील-उर-रहमान सज्जाद नोमानी ने रमज़ान की फ़ज़ीलत पर रोशनी डालते हुए ‘भाषा' को बताया कि रमज़ान का मकसद खुद को गलत काम करने से रोकने की ताकत पैदा करना या उसे पुनर्जीवित करना है।

शरीयत की जबान में इस ताकत को ‘तक़वा' कहा जाता है। उन्होंने कहा कि रोजे में इंसान खुद को रोक लेता है। उसके सामने पानी होता है, लेकिन सख्त प्यास लगी होने के बावजूद रोजेदार उसे नहीं पीता।

गलत बात होने के बावजूद खुद को गुस्सा होने से रोकता है। झूठ बोलने और बदनिगाही से परहेज करता है। जिंदगी में सारे गुनाह इसीलिये होते हैं, क्योंकि इंसान खुद को गलत काम करने से रोक नहीं पाता।

सिर्फ जानकारी की कमी की वजह से अपराध नहीं होते, बल्कि जानकारी होने के बावजूद खुद पर काबू नहीं रख पाने की वजह से उससे गुनाह हो जाते हैं। मौलाना नोमानी ने कहा कि रमजान में 30 दिन तक इस बात की मश्क़ (अभ्यास) करायी जाती है कि जो काम तुम्हारे लिये जायज है, उसके लिये भी तुम खुद को रोक लो।

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तब इंसान यह महसूस करने लगता है कि जब मैं हलाल कमाई से हासिल किया गया खाना और पानी इस्तेमाल करने से खुद को रोक सकता हूं तो गलत काम करने से क्यों नहीं रोक सकता हूं।

इंसान अक्सर यह सोचता है कि वह चाहकर भी खुद को गुनाह करने से रोक नहीं पाता, मगर यह उसकी गलतफहमी है। रमज़ान उसे इसका एहसास कराता है।

इंसान को पाक-साफ कर देती है रमज़ान में अल्लाह की रहमत

इस्लामिक सेंटर ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और दारुल उलूम फरंग महल के प्रबन्धक मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने बताया कि जिस तरह बारिश के मौसम में आसमान से गिरने वाली बूंदें एकजुट होकर तमाम गंदगी और कूड़े-करकट को किनारे लगा देती हैं, वैसे ही रमज़ान के महीने में अल्लाह की रहमत रूपी बारिश इंसान को पाक-साफ कर देती है।

उन्होंने कहा कि रमज़ान के पाक महीने में अल्लाह अपने बंदों पर दिल खोलकर रहमतों की बारिश करता है। भूखे-प्यासे रहकर इबादत में खो जाने वाले रोजेदार लोग खुद को अल्लाह के नजदीक पाते हैं और आम दिनों के मुकाबले रमज़ान में इस क़ुरबत (करीबी) के एहसास की शिद्दत बिल्कुल अलग होती है, जो आमतौर पर बाकी के महीनों में नहीं होती है।

मौलाना महली ने कहा कि रमज़ान की फज़ीलतों की फेहरिस्त बहुत लम्बी है, मगर उसका बुनियादी सबक यह है कि हम सभी उस दर्द को समझें जिससे दुनिया की आबादी का एक बड़ा हिस्सा रोजाना दो-चार होता है।

इस दिन दुनिया में उतारा था कुरान शरीफ

जब हमें खुद भूख लगती है तभी हमें गरीबों की भूख का एहसास हो सकता है। उन्होंने कहा कि रमज़ान के महीने में ही कुरान शरीफ दुनिया में उतरा था, लिहाजा इस महीने में तरावीह के रूप में कुरान शरीफ सुनना बेहद सवाब (पुण्य) का काम है।

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