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मोक्षदायिनी एकादशी 2018: मोक्षदा एकादशी पर इस बार बन रहा है ''सिद्धि योग'', ऐसे उठाएं लाभ

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Dec 7 2018 11:45AM IST
मोक्षदायिनी एकादशी 2018: मोक्षदा एकादशी पर इस बार बन रहा है ''सिद्धि योग'', ऐसे उठाएं लाभ

मोक्षदायिनी एकादशी (मोक्षदा एकादशी) का व्रत इस महीने 19 दिसंबर 2018 (बुधवार) को पड़ रही है। विष्णु पुराण के अनुसार जब मोक्षदायिनी एकादशी बुधवार को पड़ती है तो इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य को सभी कामों में सफलता प्राप्त होती है।

साथ ही व्यक्ति को सभी आर्थिक संकटों से जल्द ही छुटकारा मिल जाती है। इतना ही नहीं कहते हैं कि इस एकादशी-व्रत के प्रभाव से सभी प्रकार की मानसिक परेशानियों से भी शीघ्र ही मुक्ति मिल जाती है।

मोक्षदायिनी (मोक्षदा) एकादशी व्रत का धार्मिक महत्व (Religious Significance of Mokshadani Ekadashi Fast)

शास्त्रों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि सभी धर्मानुष्ठानों का आखिरी लक्ष्य मन की चंचलता को दूर करना है। नियमित व्रत-उपवास करना एक वैज्ञानिक उपचार भी है। मन इंद्रियों का अधिपति है। शास्त्रों के अनुसार शरीर को रथ, इंद्रियों को घोड़े तथा मन को घोड़ों की लगाम माना गया है।

अत: 10 इंद्रियों के उपरांत मन को 11वीं इंद्रिय माना गया है। इसलिए एकादशी को मन का कारक माना गया है। दस इंद्रियों और मन- इस एकादशी को वश में करने का स्मरण एकादशी कराती है। इसलिए इस व्रत का भारतीय संस्कृति में बेहद खास महत्व है।

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अन्न न लेने से मन और इंद्रियों में दुर्बलता आती है और उन्हें वश में करना आसान होता है। मन के निर्माण के विषय में छान्दोग्योपनिषद् में कहा गया है कि खाया हुआ अन्न तीन भागों में विभक्त होता है। इसका स्थूल भाग पुरिष  बनता है, मध्य भाग रक्त और मांस बनता है तथा सूक्ष्म भाग से मन का निर्माण होता है।

इसलिए भोजन का सबसे अधिक असर हमारे मन पर पड़ता है। सात्विक भोजन करने से मन सात्विक गुणों से युक्त होता है। अन्न में पापों का निवास होता है। जमीन को जोते बिना जो स्वत: पैदा होता है, वास्तव में वही अन्न व्रत-उपवास में ग्राह्य होता है।

हम भलीभांति जानते हैं कि चावल के पौधे में सबसे अधिक जल की आवश्यकता होती है, इसी कारण से एकादशी व्रत में इसका प्रयोग नहीं करते। 12 महीनों की 24 एकादशियां और मलमास की दो एकादशियां हैं।

एकादशी व्रत शुक्ल और कृष्ण पक्ष दोनों में किया जाता है। फल दोनों का समान है, जिस तरह शिव और विष्णु दोनों आराध्य हैं। इस व्रत को शैव और वैष्णव और सब करते हैं।

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एकादशी के दो भेद हैं- नित्य और काम्य। जो निष्काम भाव से की जाए, वह नित्य और जो धन-पुत्रादि की प्राप्ति या रोग-दोषादि की निवृत्ति के निमित्त की जाए, वह काम्य एकादशी व्रत है। एकादशी व्रत से मनुष्यों की आत्मा शुद्ध होती है, संकल्प शक्ति में वृद्धि होती है तथा विचार, चतुराई या ज्ञान तंत्र विकसित होते हैं।

वार (दिन) के अनुसार एकादशी का महत्व (Importance of Ekadashi According Day Wise)

अगर एकादशी को सोमवार, शुक्रवार, बृहस्पतिवार तथा बुधवार हो तो व्रत करने से सब कामों में सफलता मिलती है और इनके साथ अश्विनी, मृगशिरा, पुष्य, हस्त, तीनों उत्तरा, अनुराधा व रेवती नक्षत्र तथा प्रीति, सिद्धि, साध्य, शुभ, शोभन व योग हों तो सब प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं।

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व्रती को पंचदेव का पंचोपचार, दशोपचार या षोडशोपचार से पूजन करना चाहिए। इस दिन रात्रि जागरण कर कथा-वार्ता, स्तोत्र पाठ तथा भजन करें। अगले दिन पारण करें। व्रत के अंत में उद्यापन करें।

इसके बिना व्रत निष्फल होता है। इससे व्रती के सब पाप नष्ट हो जाते हैं। एकादशी को शरीर त्यागने वाले मोक्ष को प्राप्त होते हैं। एकादशी मोक्षदायिनी है।


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