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Mahashivratri 2020 February : महाशिवरात्रि व्रत कथा

Mahashivratri 2020 February: महाशिवरात्रि व्रत की कथा (Mahashivratri Vrat Story ) जानना आपके लिए बेहद ही आवश्यक है, क्योंकि महाशिवरात्रि की कथा सुनने मात्र से ही सभी प्रकार के पाप समाप्त हो जाते हैं और भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है, शिवारात्रि (Shivratri ) भगवान शिव की अत्याधिक प्रिय है और फाल्गुन मास की शिवारत्रि महाशिवरात्रि के नाम से जानी जाती है तो चलिए जानते हैं महाशिवरात्रि व्रत कथा

Mahashivratri 2020 February : महाशिवरात्रि व्रत कथाMahashivratri 2020 February : महाशिवरात्रि व्रत कथा

Mahashivratri 2020 February: महाशिवरात्रि की व्रत कथा को सुने या पढ़े बिना यह व्रत पूर्ण नहीं होता। महाशिवरात्रि का व्रत अत्यंत ही शुभ होता है। यह व्रत भगवान शिव (Lord Shiva) की असीम कृपा प्राप्त करता है। महाशिवरात्रि का त्योहार (Mahashivratri Festival) 21 फरवरी 2020 को मनाया जाएगा तो चलिए जानते हैं महाशिवरात्रि व्रत की कथा


महाशिवरात्रि व्रत कथा (Mahashivratri Vrat Katha)

प्राचीन समय में एक निषाद नाम का शिकारी हुआ करता था।वह सभी जीवों को दुख दिया करता था। वह अत्यंत ही हिंसक हुआ करता था और जीवों की हत्या करके उनका भक्षण किया करता था।उसका परिवार बहुत बड़ा था। वह अपने विशाल परिवार का मुखिया हुआ करता था। वह प्रतिदिन वन में जाकर जंगली जीव जंतुओं का संहार किया करता था और उन्हीं से अपना और अपने परिवार का भरण पोषण किया करता था। उस शिकारी ने अपनी बाल्य अवस्था से ही कोई शुभ कार्य नहीं किया था।

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वह जिस वन में रहता था वहां पर किसी को भी चैन से नहीं रहने देता था। निषाद इस प्रकार के कुकर्म किया करता था कि लोग उससे भयभीत रहा करते थे। लेकिन एक दिन ऐसा संयोग आया कि उसके घर में भोजन समाप्त हो गया। उसके माता पिता स्त्री और बच्चे सभी भूख से व्याकुल होने लगे। जब उसने देखा कि अब मेरे परिवार के लोग भूख के कारण बहुत ही ज्यादा व्याकुल हो रहे हैं तो वह अपना धनुष और पीने का पानी लेकर जंगल की और चल दिया। लेकिन उस दिन उसे कोई भी जीव शिकार के लिए नहीं मिला और वह पूरे दिन भूखा प्यासा ही रहा।

उस दिन एक सबसे बड़ा संयोग महाशिवरात्रि (Mahashivratri) का भी था। सारा दिन भूखा रहने के कारण निषाद का महाशिवरात्रि का व्रत (Mahashivratri Vrat) हो गया था पूरे दिन वन में भटकने के बाद जब उसे कुछ भी शिकार के लिए नहीं मिला तो वह एक तालाब के किनारे बेल के वृक्ष के ऊपर छिप कर बैठ गया लेकिन उस यह नहीं पता था कि उस बेल के वृक्ष के निचे एक शिवलिंग भी है जो बेल के पत्तों से ढका हुआ है। निषाद को पेड़ पर बैठे हुए रात हो गई थी और महाशिवारात्रि का पहला पहर प्रारंभ हो गया था तभी उस तालाब पर एक हिरणी पानी पीने के लिए आई।

उस हिरणी को देखकर वह शिकारी अत्यंत ही प्रसन्न हुआ जैसे ही उसने हिरणी को मारने के तीर धनुष पर चढ़ाया उसके पास रखे पानी से कुछ पानी की बूंदे छलक गईं और शिवलिंग पर जा गिरीं और कुछ पत्तियां टूटकर शिवलिंग पर जा गिरीं।इस तरह से उस शिकारी के पहले पहर का पूजन हो गया था। जब हिरणी ने उस शिकारी को देखा तो वह अत्यंत ही भयभीत हो गई। जब हिरणी ने उसे पूछा कि तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो तब शिकारी ने बोला की मेरा पूरा परिवार भूखा है और मैं तुम्हारे मांस से अपने परिवार की भूख शांत करूंगा।

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इस पर हिरणी ने कहा कि ठीक है तुम मुझे मार लेना पर मेरी एक विनती सुन लो मेरे घर में मेरे छोटे बच्चे हैं उन्हें मैं अपनी बहन को सौंप आऊं फिर तुम मुझे मार लेना। इसके बाद शिकारी ने उसे जाने दिया और अपना काम पूरा करने के बाद वापस आने को कहा। जब रात्रि का दूसरा पहर शुरू हुआ तो उसी तालाब पर दूसरी हिरणी भी पानी पीने के लिए आई। उस हिरणी को देखकर जैसे ही शिकारी ने अपना तीर धनुष पर चढ़ाया तब ही उसके पास रखें पानी में से कुछ बूंदे और बेल के पत्ते फिर से शिवलिंग पर गिर गए।

इस तरह से उसके दूसरे पहर का पूजन भी संपन्न हो गया। जब हिरणी ने उस शिकारी को देखा तो उससे पूछा की तुम यह क्या कर रहे हो तब शिकारी ने उससे कहा कि मैं तुम्हें मारकर अपने परिवार का पेट भरूंगा तब हिरणी ने कहा कि ठीक है लेकिन मेरी एक छोटी बच्ची है। मैं उसे अपने पति के पास छोड़ आऊं फिर तुम मुझे मार लेना। शिकारी ने उस पर विश्वास करके उसे जाने दिया। इसके बाद महाशिवरात्रि का तीसरा पहर भी शुरू हो गया था कि तब ही वहां एक हिरण आया। इसके बाद एक बार फिर से उसका पानी छलका और बेल पत्र शिवलिंग पर गिर गए।


इस तरह उसका महाशिवरात्रि के तीसरे पहर का पूजन भी संपन्न हो गया। जब हिरण ने उसे देखा तो उसने शिकारी से सवाल पूछा कि तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो और एक बार फिर से शिकारी ने वही जबाव दिया। इस पर हिरण ने कहा कि हे शिकारी अभी मुझे जाने दो मेरे घर में मेरा एक छोटा बेटा है। मैं उसे अपनी पत्नी के पास छोड़ आऊं फिर तुम मुझे मार लेना।इस पर शिकारी को गुस्सा आ गया और वह बोला ऐसे ही मैने दोनों हिरणियों जाने दिया तब हिरण ने बताया कि वह दोनों हिरणियां मेरी पत्नी है और वह मेरे जाने पर ही आ पाएंगी।

यह सुनकर शिकारी ने उसे जाने दिया। जब हिरण अपने परिवार के पास पहुंचा तो सभी ने अपनी- अपनी बात एक दूसरे को बताई। इसके बाद सबने विचार विमर्श किया कि पहले शिकारी के पास कौन जाएगा। जब कोई नतीजा नहीं निकला तो वह तीनों ही शिकारी के पास चले गए तो उनके बच्चे भी उनके साथ हो लिए। जब हिरण का पूरा परिवार शिकारी के पास पहुंचा तो रात्रि का चौथा पहर भी शुरू हो चुका था। जब शिकारी ने सभी को मारने के लिए धनुष पर तीर चढ़ाया तो वही क्रम फिर से शुरू हुआ और महाशिवरात्रि की उसकी चौथे पहर की पूजा भी संपन्न हो गई थी।

जब उसके चौथे पहर की पूजा भी पूरी हुई तो उसका मन बदल गया और उसने सोचा कि मनुष्य से अच्छे तो यह पशु ही हैं जो अपने वचन के पक्के हैं। जो मेरे सामने उपस्थित हो गए। इस पर उसने कहा कि मैं तुम्हें नहीं मार सकता तुम सब अपने घर लौट जाओ। उसके इतना कहते ही भगवान शिव उस शिकारी के सामने प्रकट हो गए और उसे वर मांगने के लिए कहा। लेकिन उस शिकारी ने कहा कि प्रभु मुझे कुछ नहीं चाहिए आपके दर्शन मात्र से ही मैं धन्य हो गया।इस पर भगवान शिव ने कहा कि हे निषाद तुम अपने सभी पाप कर्मों से मुक्त हो गए और तुम्हें जीवन के सभी सुखों की प्राप्ति होगें।

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