logo
Breaking

महाशिवरात्रि 2019 : भगवान शिव के नीलकंठ बनने की पूरी सच्चाई

भगवान शिव का पवित्र त्योहार महाशिवरात्रि 2019 (Mahashivratri 2019) आने वाला है। कई लोगों को नहीं पता कि महाशिवरात्रि कब है (Mahashivratri Kab Hai)? तो हम आपको बता दें कि महाशिवरात्रि 2019 मार्च की 4 तारीख को मनाया जाएगा। महाशिवरात्रि के दिन लोग व्रत रखते हैं और भगवान शिव की आराधना करते हैं। भगवान शिव को कई नामों से जाना जाता है। भोले, भोले शंकर, शंकर, महादेव आदि उनके प्रमुख नाम हैं। लेकिन उनका एक और बेहद खास नाम ''नीलकंठ'' है। बहुत से लोगों को नहीं पता कि शिव का नाम नीलकंठ कैसे पड़ा तो आज हम आपको उस कहानी के बारे में बता रहे हैं जिसके चलते शिव का नाम नीलकंठ पड़ गया।

महाशिवरात्रि 2019 : भगवान शिव के नीलकंठ बनने की पूरी सच्चाई
भगवान शिव का पवित्र त्योहार महाशिवरात्रि 2019 (Mahashivratri 2019) आने वाला है। कई लोगों को नहीं पता कि महाशिवरात्रि कब है (Mahashivratri Kab Hai)? तो हम आपको बता दें कि महाशिवरात्रि 2019 मार्च की 4 तारीख को मनाया जाएगा। महाशिवरात्रि के दिन लोग व्रत रखते हैं और भगवान शिव (Shiv) की आराधना करते हैं। भगवान शिव को कई नामों से जाना जाता है। भोले, भोले शंकर, शंकर, महादेव आदि उनके प्रमुख नाम हैं। लेकिन उनका एक और बेहद खास नाम 'नीलकंठ' है। बहुत से लोगों को नहीं पता कि शिव का नाम नीलकंठ क्यों पड़ा तो आज हम आपको उस कहानी के बारे में बता रहे हैं जिसके चलते शिव का नाम नीलकंठ पड़ गया।
एक बार समृद्धि और भाग्य की देवी लक्ष्मी तीनों लोकों से लुप्त हो गईं। वह क्षीर सागर में कूद गईं और पूरी तरह से लुप्त हो गईं। लेकिन देवता और असुर उन्हें हर हाल में वापस चाहते थे। वह विष्णु के पास गए तो उन्होंने कहा कि मंदार पर्वत को मथानी बनाएं और नाग वासुकी को उसकी डोरी बना कर समुद्र को मथें।
जिसके बाद लक्ष्मी प्रकट होंगी। लेकिन इसमें एक समस्या थी कि मंदार पर्वत को किस आधार पर रखा जाए। क्योंकि अगर सीधे पृथ्वी पर रख दिया गया तो पृथ्वी फट जाएगी। तब भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार लिया।

समुद्र मंथन करते असुर और देवता। फोटो क्रेडिट: विकीपीडिया
जो कि एक विशाल कछुए का रूप था। उस कछुए पर मंदार पर्वत को रखा गया और नाग वासुकी को रस्सी बना कर समुद्र मंथन शुरू हुआ। असुरों ने वासुकी की पूछ पकड़ी और देवताओं ने उसकी गर्दन। देवता और असुर युगों-युगों तक क्षीर सागर को मथते रहे।
अंततः उनका श्रम रंग लाया। लक्ष्मी अन्य बहुत सी मूल्यवान चीजों के साथ बाहर निकलीं। जिसमें अमरता देना वाला अमृत और मृत्यु देने वाला विष था। देवता और असुर सभी चीजों को आपस में बांट रहे थे तभी उसमें उन्हें हलाहल नाम का एक घातक विष मिला।
दोनों पक्षों में कोई भी इस विष को लेने के लिए तैयार नहीं हुआ। सच तो यह था कि दोनों पक्ष उस विष से खुद का पीछा छुड़ाना चाहते थे। तभी उन्होंने शिव को पुकारा। क्योंकि शिव एक तपस्वी थे तो उन्होंने अमृत और विष में कोई भेद नहीं किया।
उन्होंने हलाहल के पात्र को उठाया और अपने होंठों से लगा लिया। देवी ने अपने स्वामी को विष पीते देखा तो उनके मन में विष के प्रभाव को लेकर भारी भय पैदा हुआ। देवी शिव की तरफ दौड़ीं और उनके गर्दन को हाथों से दबा लिया और उनके गले को एक सांप से कस कर बांध दिया।
शिव सारा विष पी गए लेकिन वह उनके गले (कंठ) से नीचे नहीं उतर पाया। विष के प्रभाव से शिव का गला नीला पड़ गया। जिससे उनका नाम नीलकंठ पड़ गया। कई लोग यह सोचते हैं कि अगर शिव हलाहल पी लेते तो उनका अंत हो जाता। तो आपको बता दें कि ऐसा नहीं है। शिव स्वयंभू हैं।
उनका न आदि है न अंत। लेकिन अगर वह विष उनके पेट में चला जाता तो वह उनके अंदर की आग को नष्ट कर देता। ऐसे में अगर पीड़ा नष्ट हो जाती तो जीवन का कोई अर्थ नहीं रह जाता। पीड़ा और आनंद दोनों के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं रह जाता। इस कारण से देवी ने उनका विष पीना रोक दिया।
Share it
Top