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Maha Shivratri 2019 : महाशिवरात्रि 2019

नरेंद्र सांवरिया | UPDATED Feb 22 2019 3:46PM IST
Maha Shivratri 2019 : महाशिवरात्रि 2019

महाशिवरात्रि 2019 (Mahashivratri 2019) : महाशिवरात्रि कब है, महाशिवरात्रि २०१९, महाशिवरात्रि कब है 2019, महाशिवरात्रि डेट, महाशिवरात्रि कथा, महाशिवरात्रि व्रत, महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है और महाशिवरात्रि का महत्व लोग गूगल पर सर्च कर रहे हैं। महाशिवरात्रि 2019 में फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि (mahashivratri 2019 tithi) 4 मार्च 2019 को आरंभ समय सायं 16:28 बजे महाशिवरात्रि 2019 है। जबकि 2075 विक्रम संवत के अनुसार महाशिवरात्रि 2019 का व्रत ((Mahashivratri 2019 Vrat) शिव योग, नक्षत्र धनिष्ठा में मगलवार, 5 मार्च 2019 को रखा जाएगा। महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं...

महाशिवरात्रि 2019 शुभ मुहूर्त

महाशिवरात्रि तिथि व शुभ मुहूर्त 2019

महाशिवरात्रि 2019 : 4 मार्च 2019

निशिथ काल पूजा :  24:07 से 24:57

पारण का समय :  06:46 से 15:26 (5 मार्च)

चतुर्दशी तिथि आरंभ :  16:28 (4 मार्च)

चतुर्दशी तिथि समाप्त :  19:07 (5 मार्च)

महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है

 महाशिवरात्रि क्यों मनाई जताई है अगर आपके आपके मन में भी यही सवाल है तो आपको बता दें कि हिन्दू पंचांग के अनुसार ‘शिवरात्रि’ हर महीने आती है लेकिन महाशिवरात्रि साल में केवल एक ही दिन फाल्गुन मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को आती है और महाशिवरात्रि पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन का महापर्व है। शिवमहापुराण के अनुसार महाशिवरात्रि का पर्व शिव जी और देवी पार्वती की शादी के रूप में मनाया जाता है। 

महाशिवरात्रि का महत्व

महाशिवरात्रि की महिमा अत्यंत पवित्र है। महाशिवरात्रि का महत्व शिव महापुराण में विस्तार से बताया गया है। शिव-पार्वती विवहा पर्व को महाशिवरात्रि पर्व के रूप में मनाया जाता है। महाशिवरात्रि’ के दिन शिवजी और माता पार्वती विवाह-सूत्र में बंधे थे। पौराणिक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार महाशिवरात्रि की मध्य रात्रि में भगवान शिव, शिवलिंग (प्रतीक) के रूप में प्रकट हुए थे। पहली बार शिवलिंग की पूजा भगवान विष्णु और ब्रह्माजी ने की थी। वेदों में शिव को महादेव कहा गया है, महान देवता जो स्वयं ईश्वर ही है। तंत्र में शिव को अपने देवत्व को जागृत करने के लिए शक्ति की, (देवी) की आवश्यकता पड़ती है। गंगाजी को जटाओं में धारण करने वाले शिव जी के सिर पर चंद्रमा, हाथ में त्रिशूल, मस्तक पर त्रिपुंड, कंठ में कालपाश (नागराज), रुद्राक्ष माला से सुशोभित तीन नेत्रों वाले शिव के हाथ में डमरू और पिनाकिन धनुष है।

शिव के स्वरूप

भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले शिवजी को शिवशंकर, शंकर, नीलकंठ, बाबा बर्फानी, भोलेनाथ, महादेव, महकाल, भगवान् आशुतोष, उमापति, महादेव, गौरीशंकर, सोमेश्वर, महाकाल, उमापति, ओंकारेश्वर, वैद्यनाथ, शिव, त्रिपुरारि, सदाशिव तथा अन्य सहस्त्रों नामों से पूजते हैं।

महाशिवरात्रि व्रत पूजन विधि

  • महाशिवरात्रि के दिन गंगा स्नान कर भगवान शिव की आराधना करने वाले भक्तों महाशिवरात्रि व्रत पूजन विधि के अनुसार करने से इच्छित फल, धन, सौभाग्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। 
  • महाशिवरात्रि व्रत का सबसे प्रमुख भाग उपवास होता है। सबसे पहले पानी में गंगाजल डाल कर स्नान करें।  
  • स्नान आदि ने निवृत्त होने के बाद हाथ में अक्षत और गंगाजल लेकर महाशिवरात्रि व्रत का संकल्प लें। 
  • संकल्प लेने के बाद सफेद वस्त्र धारण करें और किसी भी शिव मंदिर में जाकर शिवजी का पंचामृत से अभिषेक कराएं।
  • शंकर जी का अभिषके करने के लिए पंचामृत में दूध, दही, शहद, गंगाजल और काले तिल का उपयोग करें। 
  • पंचामृत से अभिषेक के बाद शिवलिंग का विधि पूर्वक पूजन करें शिवलिंग बेल-पत्र, गाजर, बेर, धतूरा, भांग, सेंगरी  और जनेव जरूर चढ़ाएं। 
  • भगवान शिव जी का अभिषेक करने के पश्च्यात शिवपरिवार को केसर का तिलक करें और सफेद फूल की माला अर्पित करें।
  • महाशिवरात्रि पर भगवान का तिलक करने के बाद उन्हें स्वच्छ वस्त्र अर्पित करें और धूप-दीप शिवजी की पूजा करें। 
  • शिव चालीसा का पाठ करने के बाद शिव जी की आरती करना ना भूलें। 
  • आरती करने के बाद उत्तर दिशा की तरफ मुख करके ॐ नमः शिवाय मंत्र का 108 बार जाप करें। रात्रि में शिव जी का जागरण करना अनिवार्य है।
  • शिव आराधना में लीन रहते हुए अगली सुबह शिवजी को फल का भोग लगा कर स्वयं भी फल का सेवन कर व्रत खोलें।  

(शिव पुराण) कथा

चेतन प्राणियों के पिता, ब्रह्मा औक ब्रह्माण्ड में व्यवस्था बनाए रेखने वाले विष्णु, दोनों, संसार के स्त्रष्टा होने का दावा कर रहे थे। अचानक उनके सामने अग्नि का एक स्तम्भ प्रकट हुआ। ऐसा लगता था कि उस स्तम्भ का न तो कोई शिखर था न आधार। ब्रह्मा ने हंस का रूप धारण किया और ऊपर आकाश की तरफ उड़ान भरी, लेकिन वे स्तम्भ का शिखर नहीं खोज पाए। विषणु ने वराह का रूप धर कर पृथ्वी को खोद डाला,  लेकिन उन्हें उस अग्नि स्तम्भ का कोई आधार नहीं मिला। स्तम्भ का न तो कोई शिखर था, न कोई आधार, न आरम्भ, न अंत, न स्त्रोत, न लक्ष्य। वह सवयंभू, आत्म-निर्भर और आत्म-लीन जान पड़ता था। ब्रह्मा और विषणु इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि वह अग्नि स्तम्भ सभी देवताओं को मलाकर उन दोनों से बड़ा था। वह एक और भी बड़े देवता महादेव का प्रतीक था वह देवत्व का चरम रूप था। अस अग्नि स्तम्भ से शिव प्रकट हुए। ब्रह्मा और विष्णु दोनों ने शिव का अभिवादन किया और उनकी स्तुतियां गायीं।

महाशिवरात्रि कथा

प्राचीन काल में, किसी जंगल में एक गुरुद्रुह नाम का एक शिकारी रहता था जो जंगली जानवरों का शिकार करता तथा अपने परिवार का भरण-पोषण किया करता था। एक बार शिव-रात्रि के दिन जब वह शिकार के लिए निकला , पर संयोगवश पूरे दिन खोजने के बाद भी उसे कोई शिकार न मिला, उसके बच्चों, पत्नी एवं माता-पिता को भूखा रहना पड़ेगा इस बात से वह चिंतित हो गया , सूर्यास्त होने पर वह एक जलाशय के समीप गया और वहां एक घाट के किनारे एक पेड़ पर थोड़ा सा जल पीने के लिए लेकर, चढ़ गया क्योंकि उसे पूरी उम्मीद थी कि कोई न कोई जानवर अपनी प्यास बुझाने के लिए यहाँ ज़रूर आयेगा। वह पेड़ ‘बेल-पत्र’ का था और उसी पेड़ के नीचे शिवलिंग भी था जो सूखे बेलपत्रों से ढके होने के कारण दिखाई नहीं दे रहा था। रात का पहला प्रहर बीतने से पहले एक हिरणी वहां पर पानी पीने के लिए आई ।उसे देखते ही शिकारी ने अपने धनुष पर बाण साधा ।ऐसा करने में, उसके हाथ के धक्के से कुछ पत्ते एवं जल की कुछ बूंदे नीचे बने शिवलिंग पर गिरीं और अनजाने में ही शिकारी की पहले प्रहर की पूजा हो गयी ।हिरणी ने जब पत्तों की खड़खड़ाहट सुनी, तो घबरा कर ऊपर की ओर देखा और भयभीत हो कर, शिकारी से , कांपते हुए स्वर में बोली- ‘मुझे मत मारो ।’ शिकारी ने कहा कि वह और उसका परिवार भूखा है इसलिए वह उसे नहीं छोड़ सकता। हिरणी ने वादा किया कि वह अपने बच्चों को अपने स्वामी को सौंप कर लौट आयेगी। तब वह उसका शिकार कर ले ।शिकारी को उसकी बात का विश्वास नहीं हो रहा था। उसने फिर से शिकारी को यह कहते हुए अपनी बात का भरोसा करवाया कि जैसे सत्य पर ही धरती टिकी है; समुद्र मर्यादा में रहता है और झरनों से जल-धाराएँ गिरा करती हैं वैसे ही वह भी सत्य बोल रही है । क्रूर होने के बावजूद भी, शिकारी को उस पर दया आ गयी और उसने ‘जल्दी लौटना’ कहकर , उस हिरनी को जाने दिया। थोड़ी ही देर बाद एक और हिरनी वहां पानी पीने आई, शिकारी सावधान हो गया, तीर सांधने लगा और ऐसा करते हुए, उसके हाथ के धक्के से फिर पहले की ही तरह थोडा जल और कुछ बेलपत्र नीचे शिवलिंग पर जा गिरे और अनायास ही शिकारी की दूसरे प्रहर की पूजा भी हो गयी ।इस हिरनी ने भी भयभीत हो कर, शिकारी से जीवनदान की याचना की लेकिन उसके अस्वीकार कर देने पर ,हिरनी ने उसे लौट आने का वचन, यह कहते हुए दिया कि उसे ज्ञात है कि जो वचन दे कर पलट जाता है ,उसका अपने जीवन में संचित पुण्य नष्ट हो जाया करता है । उस शिकारी ने पहले की तरह, इस हिरनी के वचन का भी भरोसा कर उसे जाने दिया। अब तो वह इसी चिंता से व्याकुल हो रहा था कि उन में से शायद ही कोई हिरनी लौट के आये और अब उसके परिवार का क्या होगा ।इतने में ही उसने जल की ओर आते हुए एक हिरण को देखा, उसे देखकर शिकारी बड़ा प्रसन्न हुआ ,अब फिर धनुष पर बाण चढाने से उसकी तीसरे प्रहर की पूजा भी स्वतः ही संपन्न हो गयी लेकिन पत्तों के गिरने की आवाज़ से वह हिरन सावधान हो गया ।उसने शिकारी को देखा और पूछा –“ तुम क्या करना चाहते हो ?” वह बोला-“अपने कुटुंब को भोजन देने के लिए तुम्हारा वध करूंगा ।” वह मृग प्रसन्न हो कर कहने लगा – “मैं धन्य हूँ कि मेरा यह शरीर किसी के काम आएगा, परोपकार से मेरा जीवन सफल हो जायेगा पर कृपया कर अभी मुझे जाने दो ताकि मैं अपने बच्चों को उनकी माता के हाथ में सौंप कर और उन सबको धीरज बंधा कर यहाँ लौट आऊं ।” शिकारी का ह्रदय, उसके पापपुंज नष्ट हो जाने से अब तक शुद्ध हो गया था इसलिए वह विनयपूर्वक बोला –‘ जो-जो यहाँ आये ,सभी बातें बनाकर चले गये और अभी तक नहीं लौटे ,यदि तुम भी झूठ बोलकर चले जाओगे ,तो मेरे परिजनों का क्या होगा ?” अब हिरन ने यह कहते हुए उसे अपने सत्य बोलने का भरोसा दिलवाया कि यदि वह लौटकर न आये; तो उसे वह पाप लगे जो उसे लगा करता है जो सामर्थ्य रहते हुए भी दूसरे का उपकार नहीं करता। शिकारी ने उसे भी यह कहकर जाने दिया कि ‘शीघ्र लौट आना।’ रात्रि का अंतिम प्रहर शुरू होते ही उस शिकारी के हर्ष की सीमा न थी क्योंकि उसने उन सब हिरन-हिरनियों को अपने बच्चों सहित एकसाथ आते देख लिया था।उन्हें देखते ही उसने अपने धनुष पर बाण रखा और पहले की ही तरह उसकी चौथे प्रहर की भी शिव-पूजा संपन्न हो गयी । अब उस शिकारी के शिव कृपा से सभी पाप भस्म हो गये इसलिए वह सोचने लगा-‘ओह, ये पशु धन्य हैं जो ज्ञानहीन हो कर भी अपने शरीर से परोपकार करना चाहते हैं लेकिन धिक्कार है मेरे जीवन को कि मैं अनेक प्रकार के कुकृत्यों से अपने परिवार का पालन करता रहा।’ अब उसने अपना बाण रोक लिया तथा मृगों से कहा की वे सब धन्य है तथा उन्हें वापिस जाने दिया।उसके ऐसा करने पर भगवान् शंकर ने प्रसन्न हो कर तत्काल उसे अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन करवाया तथा उसे सुख-समृद्धि का वरदान देकर “गुह’’ नाम प्रदान किया ।मित्रों, यही वह गुह था जिसके साथ भगवान् श्री राम ने मित्रता की थी। शिव जी जटाओं में गंगाजी को धारण करने वाले, सिर पर चंद्रमा को सजाने वाले,मस्तक पर त्रिपुंड तथा तीसरे नेत्र वाले ,कंठ में कालपाश [नागराज] तथा रुद्रा- क्षमाला से सुशोभित , हाथ में डमरू और त्रिशूल है जिनके और भक्तगण बड़ी श्रद्दा से जिन्हें शिवशंकर, शंकर, भोलेनाथ, महादेव, भगवान् आशुतोष, उमापति, गौरीशंकर, सोमेश्वर, महाकाल, ओंकारेश्वर, वैद्यनाथ, नीलकंठ, त्रिपुरारि, सदाशिव तथा अन्य सहस्त्रों नामों से संबोधित कर उनकी पूजा-अर्चना किया करते हैं , ऐसे भगवान् शिव एवं शिवा हम सबके चिंतन को सदा-सदैव सकारात्मक बनायें एवं सबकी मनोकामनाएं पूरी करें।


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