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Lohri 2019 : लोहड़ी पर निबंध, ये है लोहड़ी की कहानी

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Jan 9 2019 6:59PM IST
Lohri 2019 : लोहड़ी पर निबंध, ये है लोहड़ी की कहानी

Lohri 2019 lohri festival essay and story

लोहड़ी उत्तर भारत का प्रमुख त्योहार है। यह मकर संक्रांति के एक दिन पहले मनाया जाता है। मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर इस त्योहार का उत्साह रहता है। रात में खुले स्थान में परिवार और आस-पड़ोस के लोग मिलकर आग के किनारे घेरा बना कर बैठते हैं। इस समय रेवड़ी, मूंगफली, लावा आदि खाए जाते है।

लोहड़ी पर निबंध

लोहड़ी पौष के अंतिम दिन सूर्यास्त के बाद (मकर संक्रांति से पहली रात) मनाया जाता है। मकर संक्रांति 13 या 14 जनवरी को पड़ता है। लोहड़ी मुख्य पंजाब का त्योहार है। लोहड़ी (Lohri) से जुड़ी पंरपराओ और रीति रिवाजों से ज्ञात होता है। दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के योगाग्नि-दहन की याद में ही यह अग्नि जलाई जाती है।

इस अवसर पर विवाहिता पुत्रियों को माँ के घर से 'त्योहार' (वस्त्र, मिठाई, रेवड़ी, फलादि) भेजा जाता है। पहली बार आई बहू या घर के नवजात शिशु होने पर बधाई दी जाती है। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में 'खिचड़वार' और दक्षिण भारत के 'पोंगल' पर भी-जो 'लोहड़ी' के समीप ही मनाए जाते हैं-बेटियों को भेंट जाती हैं।

लोहड़ी से 20-22 दिन पहले ही लड़के-लड़कियां 'लोहड़ी' के लोकगीत गाकर लकड़ी और उपले इकट्ठे करते हैं। चौराहे या मुहल्ले के किसी खुले स्थान पर आग जलाई जाती है। मुहल्ले या गाँव के लोग आग के चारों ओर बैठ जाते हैं। लोग अग्नि के चारों ओर चक्कर काटते हुए नाचते-गाते हैं।
 
और घर व्यवसाय के काम से निपटकर सभी परिवार आग की परिक्रमा करते हैं। लोग आग मे रेवड़ी, मूंगफली, खील, मक्की के दानों की आहुति देते हैं। ये ही चीजें प्रसाद के रुप में सभी लेगों को बाँटी जाती हैं। आग के चारों ओर बैठकर लोग आग सेंकते हैं। घर लौटते समय 'लोहड़ी' में से दो चार दहकते कोयले, प्रसाद के रूप में, घर पर लाने की प्रथा भी है।
  
कई स्‍थानों पर लोहड़ी को तिलोड़ी भी कहा जाता था। यह शब्द तिल और रोड़ी यानी कि गुड़ से मिलकर बना है। समय के साथ बदलकर तिलोड़ी को लोहड़ी कहा जाने लगा। यह भी एक वजह है की तिल के साथ गुड़ की गज्जक खाने की भी पंरम्परा है। लोहड़ी का त्योहार पूरे उत्तर भारत(India) मे मनाया जाता है।
 
लोकिन खासतौर पर पंजाब हरियाण दिल्ली और जम्मू-कशमिर मे लोहड़ी के त्योहार (Festivel) की अलग रोनक होती है। पंजाब के लोगों के लिए लोहड़ी (LOHRI) का त्योहार (Festivel) एक महत्वपूर्ण महत्व रखता है।क्योंकि यह पंजाब में कटाई के मौसम और सर्दियों के मौसम के अंत का प्रतीक है।
 
और पंजाबी किसानो के लिए लोहड़ी इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी  जाती है। क्योकि लोहड़ी के अगले दिन से उनका नया साल शुरु हो जाता है। इस समय यहा पर नई फसल की पूजा की जाती है। इसी लिए पंजाब मे लोहड़ी का त्योहार उत्साह के साथ माना जाता है।
 
लोहड़ी का समारेह पारंपरिक गीतों और डांस के द्वारा मनाया जाता है। और इसके साथ ही फिल्मी गानो पर भी खूब धूम माचते है। लोग लंबे समय से लोहड़ी के त्योहार का इंतजार कर रहे होते है। अलाव (Bonfire) पर्व पर अच्छी तरह से तैयार होते हैं। लोहड़ी पर भोजन के लिए सरसो का साग और मक्की की रोटी पसंद की जाती है। अच्छी फसल के लिए प्रार्थना के साथ दिन समाप्त होता है।
 

लोहड़ी का महत्व

मूल रूप से लोहड़ी को संक्रांति से ठीक पहले की रात को मनाया जाता था। जिसके बाद साल की सबसे लंबी रात और सबसे छोटे दिन होते थी। क्योंकि रात बेहद सर्द होती है, इसलिए लोगों ने आग को जलाकर और रात भर उसे बचाकर रखा और आग के चारों ओर अपना समय बिताते हुए, सूर्य और अग्नि के देवताओं का प्रचार किया।
 
फिर प्रसाद को  खाकर नृत्य कर अपने रिश्तेदारों के साथ गाते हैं और फिर भारी और स्वादिष्ट भोजन लेते हैं। इस त्योहार में रबी की फसलों की कटाई का समय भी होता है, यानी सर्दियों के मौसम की फसलें। भारत के सबसे उपजाऊ बेल्ट पंजाब के लोग इस त्योहार को पूरी तरह से गन्ने की कटाई के रूप में मनाते हैं।
 
तिल, गुड़, मूली, सरसों और पालक भी काटा जाता है, और वे उत्सव के प्राथमिक आकर्षण हैं। लोग रेवड़ी और गजक नामक मिठाइयाँ बनाते हैं। और मक्की की रोटी के साथ सरसो का साग जैसे स्टेपल। मूली दावत के आकर्षणों में से एक है और इसे इसमें शामिल किया गया है।

 लोहड़ी का इतिहास 

लोहड़ी के त्योहार को दुल्ला भट्टा की कहानी से जोड़ा जाता है। लोहड़ी की सभी गानों को दुल्ला भट्टी से ही जुड़ा तथा यह भी कह सकते हैं कि लोहड़ी के गानों का केंद्र बिंदु दुल्ला भट्टी को ही बनाया जाता हैं।दुल्ला भट्टी मुग़ल शासक अकबर के समय में पंजाब में रहता था।
 
उसे पंजाब के नायक की उपाधि से सम्मानित किया गया था! उस समय संदल बार के जगह पर लड़कियों को गुलामी के लिए बल पूर्वक अमीर लोगों को बेच जाता था जिसे दुल्ला भट्टी ने एक योजना के तहत लड़कियों को न की मुक्त ही करवाया बल्कि उनकी शादी भी हिन्दू लड़को से करवाई और उनके शादी के सभी व्यवस्था भी करवाई।
 
दुल्ला भट्टी एक विद्रोही था और जिसकी वंशवली भट्टी राजपूत थे। उसके पूर्वज पिंडी भट्टियों के शासक थे जो की संदल बार में था अब संदल बार पकिस्तान में स्थित हैं। वह सभी पंजाबियों का नायक था। इन ऐतिहासिक कारणो के चलते पंजाब लोहड़ी का त्योहार इतने उत्साह के साथ मनाया जाता है।

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