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Laxmi Jayanti Date 2020 : लक्ष्मी जयंती 2020 में कब है, जानिए शुभ मुहूर्त, महत्व, पूजा विधि और मां लक्ष्मी की कथा

Laxmi Jayanti Date 2020 : लक्ष्मी जयंती को मां लक्ष्मी के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है, इस दिन मां लक्ष्मी की विशेष रूप से पूजा - अर्चना की जाती है, लक्ष्मी जयंती को बसंत पूर्णिमा, डोल पूर्णिमा, होली पूर्णिमा और छोटी होली के नाम से भी जाना जाता है तो चलिए जानते हैं लक्ष्मी जयंती 2020 में कब है(Laxmi Jayanti 2020 Mai Kab Hai), लक्ष्मी जयंती का शुभ मुहूर्त (Laxmi Jayanti Shubh Muhurat),लक्ष्मी जयंती का महत्व (Laxmi Jayanti Importance), लक्ष्मी जयंती की पूजा विधि (Laxmi Jayanti Puja Vidhi) और मां लक्ष्मी की कथा (Maa Laxmi Ki Katha)

Laxmi Jayanti Date 2020 : लक्ष्मी जयंती 2020 में कब है, जानिए शुभ मुहूर्त, महत्व, पूजा विधि और मां लक्ष्मी की कथा (Advance)Laxmi Jayanti Date 2020 : लक्ष्मी जयंती 2020 में कब है, जानिए शुभ मुहूर्त, महत्व, पूजा विधि और मां लक्ष्मी की कथा (Advance)

Laxmi Jayanti Date 2020 : लक्ष्मी जयंती का पर्व मुख्य रूप से दक्षिण भारत में मनाया जाता है। मां लक्ष्मी (Goddess Laxmi) को धन और संपदा की देवी मान जाता है। इस दिन जो भी व्यक्ति सच्चे मन से मां लक्ष्मी की पूजा (Goddess Laxmi Puja) करता है उसे मां लक्ष्मी का आशीर्वाद जरूर प्राप्त होता है तो चलिए जानते हैं लक्ष्मी जयंती 2020 में कब है, लक्ष्मी जयंती का शुभ मुहूर्त,लक्ष्मी जयंती का महत्व, लक्ष्मी जयंती की पूजा विधि और मां लक्ष्मी की कथा...


लक्ष्मी जयंती 2020 तिथि (Laxmi Jayanti 2020 Tithi)

9 मार्च 2020

लक्ष्मी जयंती 2020 शुभ मुहूर्त (Laxmi Jayanti 2020 Shubh Muhurat)

पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ - सुबह 3 बजकर 03 मिनट से (09 मार्च 2020 )

पूर्णिमा तिथि समाप्त - रात 11 बजकर 17 मिनट तक (09 मार्च 2020 )


लक्ष्मी जयंती का महत्व (Laxmi Jayanti Ka Mahatva)

मां लक्ष्मी को धन और संपदा की देवी माना जाता है इनका जन्म समुद्र मंथन के दौरान फाल्गुन पूर्णिमा के दिन हुआ था। इसलिए इस दिन को मां लक्ष्मीं के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। फाल्गुन पूर्णिमा को बसंत पूर्णिमा,डोल पूर्णिमा और होली पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। लक्ष्मी जयंती के दिन उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र होता है। लक्ष्मी जयंती मुख्य रूप से दक्षिण भारत में मनाई जाती है। इस दिन लोग व्रत रखकर मां लक्ष्मी के मंत्र और लक्ष्मी सहस्त्र नामवली का पाठ करते हैं। जिससे मां लक्ष्मी उनसे प्रसन्न हो सके।

लक्ष्मी जयंती पर मां लक्ष्मी की पूजा करने से सभी प्रकार के ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है और जीवन में कभी भी धन की कोई कमीं नही होती। यह दिन होलिका दहन का भी होता है। इसलिए इस दिन भगवान विष्णु की पूजा भी विशेष रूप से की जाती है। लक्ष्मी जयंती के दिन यदि कोई जातक मां लक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु की भी पूजा करता है तो उसकी धन संपदा के साथ - साथ भाग्य में भी वृद्धि होती है। इस दिन होलिका दहन से पहले मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा अवश्य ही करनी चाहिए।


लक्ष्मी जयंती की पूजा विधि (Laxmi Jayanti Puja Vidhi)

1. लक्ष्मी जयंत के दिन मां लक्ष्मी की पूजा भगवान विष्णु के साथ अवश्य करनी चाहिए। इस दिन साधक को सुबह जल्दी उठकर किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करना चाहिए।

2. इसके बाद किसी साफ वस्त्र धारण करके एक चौकी लेकर उस पर गंगाजल छिड़क कर लाल रंग का कपड़ा बिछाकर मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की प्रतिमा या मूर्ति स्थापित करनी चाहिए।

3. मूर्ति स्थापित करने के बाद भगवान भगवान विष्णु को पीले वस्त्र और मां लक्ष्मी को लाल वस्त्र अर्पित करने चाहिए।

4. इसके बाद भगवान भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी को लाल फूलों का माला, पुष्प, खीर आदि अर्पित करने चाहिए। मां लक्ष्मी को इस दिन श्रृंगार की सभी वस्तुएं भी अर्पित करें।

5.सभी चीजें अर्पित करने के बाद दोनों के आगे घी का दीपक जलाकर विधिवत पूजा करनी चाहिए।

6. इसके बाद मां लक्ष्मी की कथा सुननी या पढ़नी अवश्य चाहिए।

7. कथा सुनने के बाद मां लक्ष्मी को खीर का और भगवान विष्णु को पीली मिठाई का भोग अवश्य लगाना चाहिए।

8. इसके बाद धूप व दीप से मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की आरती भी अवश्य उतारनी चाहिए।

9. सभी पूजा विधि संपन्न करने के बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी से क्षमा याचना अवश्य करें।

10. अंत में नौ वर्ष से छोटी कन्याओं को खीर का प्रसाद अवश्य बाटें।


लक्ष्मी जयंती की कथा (Laxmi Jayanti Story)

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार राक्षसों ने स्वर्ग लोक पर कब्जा कर लिया। जिसके बाद सभी लोग भगवान विष्णु के पास गए तब भगवान विष्णु ने सभी देवताओं को समुद्र मंथन करने के लिए कहा। लेकिन इसके उन्हें राक्षसों की आवश्यकता थी तब नाराद जी राक्षसों के पास गए और उन्हें अमृत का लालच देकर समुद्र मंथन के लिए मना लिया। यह समुद्र मंथन एक कछुए की पीठ और वासुकी नाग के द्वारा किया जा रहा था। उस समुद्र मंथन से एक- एक करके चौदह रत्न निकले।

उन्हीं चौदह रत्नों में से मां लक्ष्मी एक थीं मां लक्ष्मी । मां लक्ष्मी ने एक हाथ में कलश में था और दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। समुद्र मंथन से उत्पन्न होने के बाद मां लक्ष्मी ने भगवान विष्णु का पति रूप मे वरण कर लिया। जिस दिन मां लक्ष्मी समुद्र मंथन से उत्पन्न हुई थी। वह दिन फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा का था। इसी कारण से हर साल फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मां लक्ष्मी के जन्मदिवस यानी लक्ष्मी जयंती के रूप में मनाया जाता है।

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