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9 हजार से कम में कैसे करें केदारनाथ-बद्रीनाथ की यात्रा

सोशल मीडिया वाली रील्स, उतराखंड पर्यटन के सोशल मीडिया हेंडल, घुमक्कड़ियों की यायावरी की तस्वीरें केदारनाथ और बदरीनाथ की खूबसूरती से आजकल पटी पड़ी हैं। स्क्रॉल करते हुए, कई बार खूबसूरत तस्वीरों के आसरे मन हिमालय तक पहुंच जाता है।

9 हजार से कम में कैसे करें केदारनाथ-बद्रीनाथ की यात्रा
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सोशल मीडिया वाली रील्स, उतराखंड पर्यटन के सोशल मीडिया हेंडल, घुमक्कड़ियों की यायावरी की तस्वीरें केदारनाथ और बदरीनाथ की खूबसूरती से आजकल पटी पड़ी हैं। स्क्रॉल करते हुए, कई बार खूबसूरत तस्वीरों के आसरे मन हिमालय तक पहुंच जाता है। ये साल इसलिए भी घुम्मकड़ियों के लिए खास है क्योंकि कोविड की बंदिशें कम हो चुकी हैं। पिछले 2 सालों से कहीं कोने में पड़े बैग, बाट जोह रहे हैं कि उन्हें बांधा जाए और उन पर बारिश की बूंदें पड़ें, बर्फ के फाहे गिरे, बाहर की मिट्टी लगे।

तो दोस्तों, इस यात्रा वृतांत के बाद अगर आपको बैग बांधने की ललक ना उठे तो पैसे वापस! दिल्ली से 295 किलोमीटर की केदारनाथ यात्रा और वहां से तकरीबन 220 किलोमीटर की बद्रीनाथ यात्रा की तस्वीरें आपकी दिमागी मेमोरी में यकीनी तौर पर 1 टीबी से ज्यादा की स्पेस लेगी। बादलों से घिरे पहाड़, निरंतर चढ़ाई के साथ आगे बढ़ते जाने का जूनून, ना खत्म होने वाले रास्ते, नदियां, संस्कृति, धर्म और बहुत सारा यायावरी वाला खुमार। इन सबकी पूर्ति आप इस यात्रा में कर सकते हैं।

सबसे पहले जरूरत होगी केदारनाथ और बद्रीनाथ के लिए रजिस्ट्रेशन की। जिसके लिए उतराखंड सरकार ने आसान तरीके से रजिस्ट्रेशन की नि:शुल्क सुविधा दी है। रजिस्ट्रेशन के बिना प्लान बनाना समझदारी वाला कदम नही कहा जा सकता, इसलिए आगे आने वाली परेशानियों को पहले ही निपटा दें। यात्रा से पहले बैग में सर्दी वाले कपड़ों के साथ, रेनकोट, कंबल या लोई, केप (टोपा), अच्छे ग्रिप वाले जूते, जरूरी दवाईयां, कुछ चॉकलेट-चिप्स-बिस्किट-घर के बने स्नैक्स रखना ना भूलें।

केदारनाथ की चढ़ाई यूं तो गौरीकुंड से शुरू होती है जिसके लिए सोनप्रयाग तक पहुंचना पड़ता है। तो हमारी यात्रा दिल्ली से शुरू हुई और पहला पड़ाव था, ऋषिकेश। जहां पहुंचने के काफी तरीके हैं मगर हमने उतराखंड परिवहन की 'जनरथ बस' का विकल्प चुना। जिसकी ए.सी बस की टिकट मात्र 500 रूपये में मिल जाती हैं। हम 4 दोस्तों ने 9 बजे वाली बस पकड़ी और अलसुबह 3 बजे ऋषिकेश पहुंच गए। ऋषिकेश से 4 बजे के बाद आपको रूद्रप्रयाग या सोनप्रयाग की बस मिल जाएगी। अगर आप सोनप्रयाग तक ब्रेक-जर्नी करना चाहें तो पहला पड़ाव देवप्रयाग रखिए। वहां आपको मिलेगा अलकनंदा और मंदाकिनी नंदी का अद्भूत संगम। बेहद खूबसूरत और अलौकिक। स्नान कीजिए और दिल्ली की सारी थकान को उतराखंड में खो जाने दीजिए।

खैर ऋषिकेश से सोनप्रयाग तक बस से पहुंचने के लिए तकरीबन 500 रूपये खर्च करने पड़ेंगे। हालांकि 700 रूपये प्रति व्यक्ति की दर से बोलेरो गाडी भी आपको सोनप्रयाग तक छोड़ सकती हैं जोकि आसानी से मिल जाती हैं। ऋषिकेश से सोनप्रयाग का रास्ता तकरीबन 8 घंटे में तय होता है। जिसमें खूबसूरत सड़कों के अलावा, विशालकाय पहाड़, अटखेलियां करती नदियों के विंहगम दृश्यों और लज़ीज गढ़वाली खाने का स्वाद चखा जा सकता है।

हम चार दोस्तों ने तय किया कि हम कार से सफर करेंगे तो हमनें 4000 रूपये में सीधी सोनप्रयाग तक कार हायर की और निकल पड़े। अपनी कार हायर करने का फायदा ये हुआ कि हम सामान्य समय से पहले ही तकरीबन 10.30 बजे सोनप्रयाग पहुंच गए।

महादेव के जयकारों से वातावरण गूंजित था। एक अलग ही अलौकिकता और सांस्कृतिक जुड़ाव था इस जगह में। पार्किंग खचाखच गाड़ियों से भरी थी। देश के हर हिस्से के दर्शनार्थी बाबा केदार के दर्शन के लिए सोनप्रयाग पहुंच रहे थे। सोनप्रयाग बस स्टेंड से कोई तकरीबन 300 मीटर पैदल चलकर आपको गौरीकुंड के लिए बोलेरो मिल जाएगी। जिसमें 50 रूपये प्रति व्यक्ति भुगतान करके 5 किलोमीटर का सफर मात्र 15-20 मिनट में तय किया जा सकता है।

अब हम उस स्थान पर पहुंच चुके थे जहां से बाबा केदार के मंदिर तक पहुंचने की 18 किलोमीटर की यात्रा शुरू होती है। हालांकि सरकार का मानना है कि ये 16 किमी है। खैर, तापमान कोई तकरीबन 6 डिग्री था। बगल से पहने वाली नदी खून जमाने वाले पानी के साथ यात्रा पर थी वहीं दूसरी तरफ चमत्कारिक गौरीकुंड गर्म पानी से भरा था। जिसमें श्रद्धालु स्नान कर रहे थे। हमने स्नान के लिए नदी वाला विकल्प चुना और 2 डुबकी के बाद तीसरी डुबकी लगाने की हिम्मत ना हुई। खैर प्रकृति से पंगा कौन मौल ले। हमने खाना खाकर गौरीकुंड से केदारनाथ की यात्रा 2 बजे शुरू की।

ऋषिकेश से गौरीकुंड तक भोजन सामान्य खर्चे में किया जा सकता है। गौरीकुंड के बाद जैसे-जैसे ऊपर चढ़ते जाएंगे, मंहगाई सरकारी आंकड़ों से भी अधिक बढ़ती जाएगी। पानी की बोतल मिलेगी 50-60 रूपये में और मैगी मिलेगी 60 रूपये में, दाल चावल की प्लेट 150 रूपये में और 4 रोटी और दाल 120 में। एक और बात स्वादपसंद लोग इस खाने को खाकर गाली भी दे सकते हैं। बहरहाल अब जो मिलेगा, वही खाना पड़ेगा।

सामान्य तौर पर गौरीकुंड से केदारनाथ पहुंचने के रास्ते में जंगलपट्टी, भीमबली, रामबाड़ा, लिंचोली और रूद्रा प्वाइंट आते हैं जिसके लिए 8-10 घंटे लग सकते हैं, मगर कुछ लोगों को इससे भी ज्यादा समय लगता है। बारिश वाली स्थिति में समय निश्चित तौर पर थोड़ा ज्यादा लगेगा। वहीं खच्चर से यात्रा करने वालों को सरकारी रेट के हिसाब से 2500 रूपये एक तरफ का देना पड़ रहा है। कुछ खच्चर वाले इससे भी ज्यादा की मांग करते हैं, मगर उनसे मोलभाव किया जा सकता है। वहीं पालकी के रेट 8000-10000 रूपये तक हैं। इसी के साथ पिट्ठू में चढ़ाई करने के 6500-7000 रूपये तक देने पड़ रहे हैं।

हमने गौरीकुंड पर अपना कुछ सामान 100 रूपये प्रति बैग की दर से क्लॉक रूम में जमा करवाया और पैदल चढ़ना शुरू हुए और चलते-थकते-हांफते हुए केदारनाथ से 5 किमी पहले लिंचोली नाम की जगह पर रात 8 बजे पहुंचे। हमने तय किया कि यहीं रात्रि विश्राम करेंगे और सुबह अपना सामान यहीं निगरानी में छोड़कर आगे की यात्रा और दर्शन करेंगे। ऊपर रुकने की जगहों में सबसे सुलभ टेंट हैं। जिनमें 500 रूपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से रूका जा सकता है। हमने रात गुजारी और सुबह 3 बजे जगकर आगे की चढाई शुरू की। शरीर जमा देने वाली ठंड को साथ लिए हम 5.30 बजे तक केदारनाथ की लाइन में पहुंच चुके थे। नज़ारा अलौकिक।

विशाल खूबसूरत हिमालय की गोद में बाबा केदार का भव्य मंदिर, अलौकिक और नयनाभिराम दृश्य की झलकी देता है। महादेव के जयकारे गुंजायमान हैं। व्यवस्था में लगे लोग लाइन से सभी दर्शनार्थियों को अंदर भेज रहे हैं। हमने प्रसाद लिया। और लाइन में लगने के 2 घंटे के भीतर खुद को बाबा केदार की शरण में पाया। शिलारूपी बाबा केदार से सर्वजन के कल्याण की कामना के साथ हम बाहर आए और दौर शुरू हुआ फोटोग्राफी और सेल्फियों का।

ऊपर इंटरनेट के सिग्नल ज़रा कमज़ोर हैं। मगर घर पर बात हो सकती है। हमने पाया कि ऊपर जियो और एयरटेल के सिग्नल ही आ रहे हैं। खैर हमारे पास जिओ भी था, हमने पूरे परिवार को बाबा केदार के मंदिर के वर्चुअल दर्शन करवाए। लगे हाथ हमने भीम शिला और आदि शंकराचार्य की समाधी के भी दर्शन किए। भीम शिला ये एहसास कराने के लिए काफी है कि कंकड़ से शंकर कैसे बना जाता है। 2013 के प्रलय में जहां केदारनाथ से लेकर, रामबाड़ा तक सब कुछ उजड़ गया था वहीं भीमशिला के कारण मंदिर को तनिक भी हानि नही हुई थी। सब महादेव की कृपा है।

नाश्ता करने के उपरांत हमने नीचे उतरने की शुरूआत की। बीच में बारिश ने काफी बाधा पहुंचाई। आमतौर पर 5-6 घंटे में आसानी से केदारनाथ से गौरीकुंड आया जा सकता है। वहीं खच्चर से आने का रेट घटकर 1700 रूपये, पिट्ठू से आने का रेट 5000 रूपये हो जाता है। उतरते हुए फिसलने की संभावनाएं ज्यादा होती है जिसके लिए आपको ग्रिप बनाकर उतरना चाहिए। खच्चर वालों को भी धीरे धीरे उतरने की हिदायत देनी चाहिए।

हम शाम 5 बजे तक नीचे उतर चुके थे। हमने तय किया कि समय की बर्बादी किए बिना और पैसे बचाते हुए हम रात में ही बद्रीनाथ के लिए यात्रा प्रारंभ करेंगे। सोनप्रयाग पहुंचकर हमने बोलेरो के रेट पूछे तो कोई 10000 से कम में नही आ रहा था। शाम 5 बजे के बाद बसों की सर्विस बंद होती है। जिस गाड़ी में हम ऋषिकेश से सोनप्रयाग आए, हमने उसके ड्राइवर को फोन किया और इत्तेफाक से वो वहीं मौजूद था। उसने हमसे 17000 रूपये की मांग रखी जिसमें तय हुआ कि वो हमें बद्रीनाथ के बाद ऋषिकेश भी छोड़ेगा। फायदे का सौदा जानकर हम चारों फिर उसी गाड़ी में सवार हुए।

सोनप्रयाग से बद्रीनाथ पहुंचने में गुप्तकाशी, चोप्ता, गुप्तेश्वर, चमोली, पीपलकोटी को क्रास करना पड़ता है। हम काफी थक चुके थे, ड्राइवर भी थका हुआ था। हमने तय किया कि रात में ट्रेवल करने की जगह चोप्ता में कमरा लेकर आराम करेंगे। हमें मात्र 1000 रूपये में चारों के लिए कमरा उपलब्ध हो गया। सुबह बढ़िया गर्मपानी से स्नान करके, नाश्ता निपटाया और ठीक 7 बजे बद्रीनाथ के लिए निकल लिए। बीच में जाते हुए हमने पीपलकोटी पर भवानी स्वीट्स के पकौड़े और जलेबियां खाई। सुना काफी फेमस हैं। खैर, स्वादिष्ट तो थे।

हम खूबसूरत वादियों, विशालकाय पहाड़ों के साथ चलते-चलते दोपहर 1 बजे बद्रीनाथ की शरण में पहुंच गए। लाइन कोई तकरीबन 2 घंटे की थी। बाबा बदरी विशाल के दर्शन करके हम शाम 4 बजे फ्री हुए और बिना रूके हिंदुस्तान के आखिरी गांव की उपाधि प्राप्त 'माना गांव' में पहुंचे। माना गांव, बद्रीनाथ से कोई साढ़े तीन किलोमीटर की दूरी पर है। ट्यूरिस्टों से भरा हुआ छोटा सा खूबसूरत गांव। ठंड का पारा माइनस में जा चुका था। मगर जूनून 50 डिग्री पर था। माना गांव आने से हम सरस्वती नदी के दर्शन कर सकते हैं। जोकि हमे प्रयाग संगम में गुप्त रूप से प्राप्त होती है। मां सरस्वती को प्रणाम किया और हिंदुस्तान की आखिरी दुकान में 2 चाय की चुस्कियों लेकर ऋषिकेश वापसी की यात्रा शुरु की।

इस बीच जहां मौका मिला, खूब फोटो खिंचवाई, विडियो बनाई और खूबसूरत यादों को मोबाइल की मेमोरी के साथ अपनी दिमागी मेमोरी में सदा के लिए फिक्स कर लिया। रातभर ड्राइव करने के बाद हम अगले दिन सुबह 5 बजे ऋषिकेश पहुंच चुके थे। बारिश ने काफी परेशान किया, जिसके लिए सुझाव है कि ज्यादा रात में अगर ट्रैवल करें तो ड्राइवर की नींद और ड्राइवर के साथ आगे बैठने वाले की नींद पूरी हो। हमने सस्ता होटल लेकर ऋषिकेश में आराम किया और गंगा स्नान करके दोपहर 3 बजे की जनरथ से अपनी दिल्ली वापसी सुनिश्चित की। वैसे 5000 रूपये तक में ऋषिकेश से दिल्ली की कार बुक की जा सकती है।

दिल्ली पहुंचकर जब खर्चे का कुल हिसाब लगाया तो प्रति व्यक्ति खर्चा 8600 रूपये आया। तो घुमक्कड़ियों, बाबा के भक्तों तैयार कर लो अपना बैग। लेकिन याद रहे, टाइमिंग और प्लानिंग बहुत जरूरी है। हमने अपना सफर गुरूवार रात शुरू किया और सोमवार शाम को दिल्ली पहुंच चुके थे। एक और बात बुजुर्गों और बच्चों को अगर ले जाने का विचार है तो फाटा से केदारनाथ की हेलिकॉप्टर सेवा सबसे बेहतरीन, सस्ता और सुलभ साधन है। हालांकि उसकी बुकिंग आसानी से नही होती। तो साथियों, इस जानकारी के साथ बांधिए अपना बैग और चल दीजिए अपने जीवन की बेहतरीन यात्राओं में से एक यात्रा को पूरा करने के लिए। बाबा बद्री-केदार सबका कल्याण करें। हर हर महादेव।

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