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Kajari Teej 2019 : हरियाली तीज, कजरी तीज और हरतालिका तीज में क्या है अंतर जानिए

हरियाली तीज, कजरी तीज और हरतालिका तीज तीनों ही व्रत पति की लंबी उम्र के लिए किए जाते हैं, हरियाली तीज सावन शुक्ल पक्ष की तृतीया, कजरी तीज भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया और हरतालिका तीज भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को पड़ती है, लेकिन इन सभी व्रतों में भी अंतर हैं , तो आइए जानते हैं हरियाली तीज, कजरी तीज और हरतालिका तीज के अंतर के बारे में...

Kajari Teej 2019 : हरियाली तीज, कजरी तीज और हरतालिका तीज में क्या है अंतर जानिए

Kajari Teej 2019 कजरी तीज का पर्व इस साल 2019 में 18 अगस्त 2019 को पड़ रहा है। वैसे तो तीज चाहें कोई सी भी हो सभी तीजों पर भगवान शिव और माता पार्वती की ही पूजा की जाती है। तीज का त्योहार साल में तीन बार आता है। जिन्हें हरियाली तीज (Hariyali Teej), कजरी तीज (Kajari Teej)और हरतालिका तीज (Hartalika Teej) के नाम से जाना जाता है। तीज का व्रत अखंड सौभाग्य और पति की लंबी उम्र के लिए किया जाता है। इन तीनों व्रतों को कुंवारी कन्याएं भी कर सकती हैं। लेकिन फिर भी इन तीनों तीजों में बड़ा अंतर हैं तो आइए जानते हैं हरियाली तीज, कजरी तीज और हरतालिका तीज में अंतर


हरियाली तीज का महत्व (Hariyali Teej Importance)

हरियाली तीज पर भी सुहागन स्त्रियां व्रत रखती हैं। हरियाली तीज सावन महिने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को पड़ती है। इस दिन भगवान शिव और माता गौरी की पूजा की जाती है। हरियाली तीज के दिन महिलाएं बिना अन्न जल ग्रहण किए इस कठिन व्रत को करती हैं और भगवान शिव और माता पार्वती से अपने पति की लंबी उम्र की प्रार्थना करती हैं। हरियाली तीज को सुहाग से इसलिए जोड़ा जाता है। क्योंकि सबसे पहले माता पार्वती ने यह व्रत और पूजा की थी। उन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए सैकड़ों वर्षो तक कठोर तपस्या की थी। इसके बाद ही भगवान शिव ने माता पार्वती को अपनी पत्नी बनाने का वरदान दिया था। इसके अलावा इस व्रत को कुंवारी कन्याएं भी करती हैं। माना जाता है कि अगर कोई कुंवारी कन्या हरियाली तीज का व्रत रखती हैं तो उसे मनचाहा जीवनसाथी प्राप्ति होता है। वहीं सुहागन स्त्रियों को अखंड सौभाग्य का वर प्राप्त होता है।

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कजरी तीज का महत्व (Kajari Teej Importance)

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन पड़ने वाली तीज को कजरी तीज के नाम से जाना जाता है। इस तीज को कजली तीज, सातूड़ी तीज और भादो तीज के नाम से भी जाना जाता है। इस व्रत को सुहागन स्त्रियां अखंड सौभाग्यवती रहने के लिए करती हैं। इसके अलावा कुंवारी कन्याएं भी अपना मंदपंसद वर प्राप्त करने के लिए इस व्रत को रखती हैं। कजली तीज मनाने के पीछे एक पौराणिक कथा भी मौजूद है। इस कथा के अनुसार मध्य भारत में कजली नाम का एक वन था। वहां के लोग कजली के नाम पर बहुत सारे गीत गाया करते थे। एक बार वहां के राजा की मृत्यु हो गई । जिसके बाद वहां की रानी भी राजा के साथ सती हो गई। वहां के लोग इस घटना के कारण अत्यंत ही दुखी रहने लगे। तब ही से वहां के लोग कजली के गीत पति और पत्नी के प्रेम से जोड़कर गाने लगे। कजरी तीज पर गायों की पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है। शाम को व्रत तोड़ने से पहले महिलाएं सात रोटियों पर चना और गुड़ रखकर गायों को खिलाती हैं।

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हरतालिका तीज का महत्व (Hartalika Teej Importance)

हरतालिका तीज , हरियाली तीज और कजरी तीज से अधिक महत्वपूर्ण है। माना जाता है कि पर्वतराज हिमालय अपनी पुत्री का विवाह भगवान विष्णु जी से करवाना चाहते थे। लेकिन पार्वती तो बचपन से ही महादेव को अपना पति मान चुकी थी। इसलिए उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए गंगा नदी के तट पर गुफा में जाकर शिव जी की आराधना शुरु कर दी।माता पार्वती ने रेत से भगवान शिव की प्रतिमा बनाई और अन्न जल त्याग कर कठिन उपवास रखा। देवी ने रात भर जाकर महादेव के लिए गीत गाए। यह सब देखकर भोलेनाथ का आसन डोल गया और भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को हस्त नक्षत्र में शिवजी ने माता पार्वती को दर्शन दिए। उसके बाद माता पार्वती ने पूजा की सभी सामग्री नदी में प्रवाहित कर दी और अपना उपवास तोड़ दिया। इसलिए हरतालिका तीज पर महिलाएं सुंदर मंडप सजाकर बालू से शिव जी और पार्वती जी की प्रतिमा बनाकर उनका गठबंधन करती हैं।

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