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jyeshtha purnima 2019 : ज्येष्ठ पूर्णिमा व्रत की कथा

jyeshtha purnima 2019 : ज्येष्ठ पूर्णिमा 2019 में कब है (Jyeshtha Purnima 2019 Mai kab Hai) , क्या है ज्येष्ठ पूर्णिमा व्रत की कथा (Jyeshtha Purnima Vrat katha) अगर आपको यह नहीं पता तो आज हम आपको इसके बारे में बताएंगे। उत्तर भारत में इसे ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) के रूप में मनाया जाता है तो वहीं गुजरात , महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में इस वट पूर्णिमा (Vat Purnima) के रूप में मनाया जाता है। ज्येष्ठ पूर्णिमा का पर्व (Jyeshtha Purnima Festival) इस बार 17 जून 2019 (Jyeshtha Purnima 17 June 2019) यानी सोमवार के दिन पड़ रहा है। ज्येष्ठ के महिना (Jyeshtha Month) एक ऐसा महिना होता है। जब गर्मी का प्रकोप बहुत ज्यादा होता है। जिसकी वजह से नदी , तालाब आदि सब सूख जाते हैं। लोग गर्मी की वजह से व्याकुल होने लगते हैं। इस समय कुछ जगहों पर पानी एक बूंद तक नहीं मिलती । इसी वजह से ज्येष्ठ महिने में बारिश के लिए इंद्र देव (Indra Dev) को प्रसन्न करने के लिए हवन और यज्ञ किए जाते हैं। अगर आप भी ज्येष्ठ पूर्णिमा का व्रत और ज्येष्ठ पूर्णिमा पूजन (Jyeshtha Purnima Pujan) करना चाहते हैं और आपको इसकी कथा के बारे में नहीं पता है तो आज हम आपको इसके बारे में बताएंगे । तो चलिए जानते हैं ज्येष्ठ पूर्णिमा कथा के बारे में...

jyeshtha purnima 2019 : ज्येष्ठ पूर्णिमा व्रत की कथा

jyeshtha purnima 2019 : ज्येष्ठ पूर्णिमा 2019 में कब है (Jyeshtha Purnima 2019 Mai kab Hai) , क्या है ज्येष्ठ पूर्णिमा व्रत की कथा (Jyeshtha Purnima Vrat katha) अगर आपको यह नहीं पता तो आज हम आपको इसके बारे में बताएंगे। उत्तर भारत में इसे ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) के रूप में मनाया जाता है तो वहीं गुजरात , महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में इस वट पूर्णिमा (Vat Purnima) के रूप में मनाया जाता है। ज्येष्ठ पूर्णिमा का पर्व (Jyeshtha Purnima Festival) इस बार 17 जून 2019 (Jyeshtha Purnima 17 June 2019) यानी सोमवार के दिन पड़ रहा है। ज्येष्ठ के महिना (Jyeshtha Month) एक ऐसा महिना होता है। जब गर्मी का प्रकोप बहुत ज्यादा होता है। जिसकी वजह से नदी , तालाब आदि सब सूख जाते हैं। लोग गर्मी की वजह से व्याकुल होने लगते हैं। इस समय कुछ जगहों पर पानी एक बूंद तक नहीं मिलती । इसी वजह से ज्येष्ठ महिने में बारिश के लिए इंद्र देव (Indra Dev) को प्रसन्न करने के लिए हवन और यज्ञ किए जाते हैं। अगर आप भी ज्येष्ठ पूर्णिमा का व्रत और ज्येष्ठ पूर्णिमा पूजन (Jyeshtha Purnima Pujan) करना चाहते हैं और आपको इसकी कथा के बारे में नहीं पता है तो आज हम आपको इसके बारे में बताएंगे । तो चलिए जानते हैं ज्येष्ठ पूर्णिमा कथा के बारे में...


ज्येष्ठ पूर्णिमा व्रत कथा (Jyeshtha Purnima ki Vrat Katha)

पौराणिक व्रत कथा के अनुसार कहा जाता है कि सावित्री के पति अल्पायु थे, एक दिन देव ऋषि नारद सावित्री के पास आए और कहने लगे की तुम्हारा पति अल्पायु है। आप कोई दूसरा वर मांग लें। पर सावित्री ने कहा- मैं एक हिंदू नारी हूं, पति को एक ही बार चुनती हूं। इसी समय सत्यवान के सिर में अत्यधिक पीड़ा होने लगी।

सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे अपने गोद में पति के सिर को रख उसे लेटा दिया। उसी समय सावित्री ने देखा अनेक यमदूतों के साथ यमराज आ पहुंचे है। सत्यवान के जीव को दक्षिण दिशा की ओर लेकर जा रहे हैं। यह देख सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चल देती हैं। उन्हें आता देख यमराज ने कहा कि- हे पतिव्रता नारी! पृथ्वी तक ही पत्नी अपने पति का साथ देती है।

अब तुम वापस लौट जाओ। उनकी इस बात पर सावित्री ने कहा- जहां मेरे पति रहेंगे मुझे उनके साथ रहना है। यही मेरा पत्नी धर्म है। सावित्री के मुख से यह उत्तर सुन कर यमराज बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सावित्री को वर मांगने को कहा और बोले- मैं तुम्हें तीन वर देता हूं। बोलो तुम कौन-कौन से तीन वर लोगी।


तब सावित्री ने सास-ससुर के लिए नेत्र ज्योति मांगी, ससुर का खोया हुआ राज्य वापस मांगा एवं अपने पति सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनने का वर मांगा। सावित्री के ये तीनों वरदान सुनने के बाद यमराज ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा- तथास्तु! ऐसा ही होगा। सावित्री पुन: उसी वट वृक्ष के पास लौट आई। जहां सत्यवान मृत पड़ा था।

सत्यवान के मृत शरीर में फिर से संचार हुआ। इस प्रकार सावित्री ने अपने पतिव्रता व्रत के प्रभाव से न केवल अपने पति को पुन: जीवित करवाया बल्कि सास-ससुर को नेत्र ज्योति प्रदान करते हुए उनके ससुर को खोया राज्य फिर दिलवाया। वट सावित्री अमावस्या के दिन वट वृक्ष का पूजन-अर्चन और व्रत करने से सौभाग्यवती महिलाओं की ही मनोकामना पूर्ण होती है और उनका सौभाग्य अखंड रहता है।

सावित्री के पतिव्रता धर्म की कथा का सार यह है कि एकनिष्ठ पतिपरायणा स्त्रियां अपने पति को सभी दुख और कष्टों से दूर रखने में समर्थ होती है। जिस प्रकार पतिव्रता धर्म के बल से ही सावित्री ने अपने पति सत्यवान को यमराज के बंधन से छुड़ा लिया था। इतना ही नहीं खोया हुआ राज्य तथा अंधे सास-ससुर की नेत्र ज्योति भी वापस दिला दी। उसी प्रकार महिलाओं को अपना गुरु केवल पति को ही मानना चाहिए।

गुरु दीक्षा के चक्र में इधर-उधर नहीं भटकना चाहिए। वट अमावस्या का उत्तराखंड, उड़ीसा, बिहार, उत्तरप्रदेश आदि स्थानों पर विशेष महत्व है। अत: वहां की महिलाएं विशेष पूजा-आराधना करती हैं। साथ ही पूजन के बाद अपने पति को रोली और अक्षत लगाकर चरणस्पर्श कर मिष्ठान प्रसाद वितरित करती है।

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