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Jyeshtha Purnima 2019 : जानें कब है ज्येष्ठ पूर्णिमा, महत्व , पूजा विधि, कथा और आरती

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Jyeshtha Purnima 2019 : जानें कब है ज्येष्ठ पूर्णिमा, महत्व , पूजा विधि, कथा और आरती

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ज्येष्ठ पूर्णिमा तिथि और शुभ मुहूर्त (Jyeshtha Purnima Tithi or Subh Mahurat )

ज्येष्ठ पूर्णिमा तिथि

16 जून 2019

ज्येष्ठ पूर्णिमा शुभ मुहूर्त

ज्येष्ठ पूर्णिमा आरंभ - 09:31 बजे से (16 जून 2019)

ज्येष्ठ पूर्णिमा समाप्त - 09:30 बजे तक (17 जून 2019)


ज्येष्ठ पूर्णिमा का महत्व (Jyeshtha Purnima ka Mahatva)

ज्येष्ठ मास में गंगा दशहरा, निर्जला एकादशी जैसे कई महत्वपूर्ण त्योहार पड़ते हैं । इन्हीं में से एक है ज्येष्ठ पूर्णिमा। जिसका शास्त्रों में बहुत अधिक महत्व बताया गया है। ज्येष्ठ महिने में गर्मी अपना प्रचंड रूप धारण करती हैं । के महत्व की बात नदी ,तालाब सब सूख आदि सब सुख जाते हैं।

धरती पर पानी का स्तर भी कम होने लगता है। इसलिए इस महिने में पानी पिलाना सबसे शुभ माना जाता है।इन्ही पर्वों के माध्यम से ऋषि-मुनियों ने मानव जन तक यह संदेश पहुंचाया है कि जल के मानव जीवन के लिए कितना जरूरी है। इसका संरक्षण और सदुपयोग करें।


ज्येष्ठ पूर्णिमा पूजा विधि (Jyeshtha Purnima ki puja Vidhi)

1.ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन सुहागन स्त्रियां श्रृंगार करके दुल्हन की तरह सजती हैं और वट वृक्ष की पूजा करती है।

2. इसके बाद एक बांस की टोकरी में सात प्रकार के अनाज को कपड़े से ढंक कर रखा जाता है।

3. दूसरी टोकरी में माँ सावित्री की प्रतिमा रखी जाती है और उसी के साथ धूप, दीप, अक्षत, कुमकुम, मौली आदि पूजा सामग्री भी रखी जाती है।

4 . इसके बाद स्त्रियां वट सावित्री की कथा पढ़ती हैं और वट वृक्ष के सात चक्कर लगाते हुए मौली का धागा वट वृक्ष पर बांधा जाता है।

5.इसके बाद घर आकर पति और घर के बड़ों के पैर छुकर आर्शीवाद लेती हैं और गुड़ -चने का प्रसाद बांटती हैं।


ज्येष्ठ पूर्णिमा व्रत कथा (Jyeshtha Purnima ki Vrat Katha)

पौराणिक व्रत कथा के अनुसार कहा जाता है कि सावित्री के पति अल्पायु थे, एक दिन देव ऋषि नारद सावित्री के पास आए और कहने लगे की तुम्हारा पति अल्पायु है। आप कोई दूसरा वर मांग लें। पर सावित्री ने कहा- मैं एक हिंदू नारी हूं, पति को एक ही बार चुनती हूं। इसी समय सत्यवान के सिर में अत्यधिक पीड़ा होने लगी।

सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे अपने गोद में पति के सिर को रख उसे लेटा दिया। उसी समय सावित्री ने देखा अनेक यमदूतों के साथ यमराज आ पहुंचे है। सत्यवान के जीव को दक्षिण दिशा की ओर लेकर जा रहे हैं। यह देख सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चल देती हैं। उन्हें आता देख यमराज ने कहा कि- हे पतिव्रता नारी! पृथ्वी तक ही पत्नी अपने पति का साथ देती है।

अब तुम वापस लौट जाओ। उनकी इस बात पर सावित्री ने कहा- जहां मेरे पति रहेंगे मुझे उनके साथ रहना है। यही मेरा पत्नी धर्म है। सावित्री के मुख से यह उत्तर सुन कर यमराज बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सावित्री को वर मांगने को कहा और बोले- मैं तुम्हें तीन वर देता हूं। बोलो तुम कौन-कौन से तीन वर लोगी।

तब सावित्री ने सास-ससुर के लिए नेत्र ज्योति मांगी, ससुर का खोया हुआ राज्य वापस मांगा एवं अपने पति सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनने का वर मांगा। सावित्री के ये तीनों वरदान सुनने के बाद यमराज ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा- तथास्तु! ऐसा ही होगा। सावित्री पुन: उसी वट वृक्ष के पास लौट आई। जहां सत्यवान मृत पड़ा था।

सत्यवान के मृत शरीर में फिर से संचार हुआ। इस प्रकार सावित्री ने अपने पतिव्रता व्रत के प्रभाव से न केवल अपने पति को पुन: जीवित करवाया बल्कि सास-ससुर को नेत्र ज्योति प्रदान करते हुए उनके ससुर को खोया राज्य फिर दिलवाया। वट सावित्री अमावस्या के दिन वट वृक्ष का पूजन-अर्चन और व्रत करने से सौभाग्यवती महिलाओं की ही मनोकामना पूर्ण होती है और उनका सौभाग्य अखंड रहता है।

सावित्री के पतिव्रता धर्म की कथा का सार यह है कि एकनिष्ठ पतिपरायणा स्त्रियां अपने पति को सभी दुख और कष्टों से दूर रखने में समर्थ होती है। जिस प्रकार पतिव्रता धर्म के बल से ही सावित्री ने अपने पति सत्यवान को यमराज के बंधन से छुड़ा लिया था। इतना ही नहीं खोया हुआ राज्य तथा अंधे सास-ससुर की नेत्र ज्योति भी वापस दिला दी। उसी प्रकार महिलाओं को अपना गुरु केवल पति को ही मानना चाहिए।

गुरु दीक्षा के चक्र में इधर-उधर नहीं भटकना चाहिए। वट अमावस्या का उत्तराखंड, उड़ीसा, बिहार, उत्तरप्रदेश आदि स्थानों पर विशेष महत्व है। अत: वहां की महिलाएं विशेष पूजा-आराधना करती हैं। साथ ही पूजन के बाद अपने पति को रोली और अक्षत लगाकर चरणस्पर्श कर मिष्ठान प्रसाद वितरित करती है।


ज्येष्ठ पूर्णिमा की आरती (Jyeshtha Purnima Aarti)

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।

भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥

जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।

सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय...॥

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।

तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय...॥

तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥

पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय...॥

तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।

मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय...॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।

किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय...॥

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।

अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय...॥

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।

श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय...॥

तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।

तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय...॥

जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।

कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय...॥

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