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Janmashtami 2019 : जन्माष्टमी पर जानिए कैसे किया भगवान श्री कृष्ण ने बवंडर रूपी तृणावर्त का वध

जन्माष्टमी का पर्व भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है, भगवान श्री कृष्ण ने अनेकों असुरों का वध किया है, इन्हीं मे से एक असुर था तृणावर्त, जिसने बवंडर का रूप लेकर भगवान श्री कृष्ण को मारना चाहा था।

Janmashtami 2019 : जन्माष्टमी पर जानिए कैसे किया भगवान श्री कृष्ण ने बवंडर रूपी तृणावर्त का वध

Janmashtami 2019 भगवान श्री कृष्ण की अनेकों लीलाओं का जन्माष्टमी पर मंचन किया जाता है। भगवान श्री कृष्ण ने अपने बचपन में अनेकों लीलााएं की हैं। इन्ही में से एक लीला है तृणावर्त वध। जन्माष्टमी (Janmashtami ) प्रत्येक साल भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन मनाई जाती है। इस साल यह तिथि 24 अगस्त 2019 के दिन पड़ रही है। इस दिन पूरा देश यशोदा के लाल का जन्मोत्सव मनाएगा। मंदिरों में इस दिन अधिक रौनक होती है। देश के सभी मंदिर इस दिन सजाए जाते हैं और भगवान श्री कृष्ण की कथाएं (Shri Krishna Katha) भी लोग सुनते और पढ़ते हैं। तो आइए जानते हैं भगवान श्री कृष्ण ने कैसे किया बवंडर रूपी तृणावर्त का वध


भगवान श्री कृष्ण ने कैसे किया तृणावर्त का वध (Shri Krishna Na Kaise Kiya Trinavat Ka Vadh )

कंस ने भगवान कृष्ण को मारने के लिए अनेकों प्रयास किए थे। इस बार कंस ने भगवान श्री कृष्ण का वध करने के लिए तृणावर्त नाम के एक राक्षस को भेजा। यह राक्षस कंस का खास निजी सेवक भी था। कंस ने तृणावर्त को गोकुल भगवान श्री कृष्ण को मारने के लिए भेजा था। कंस की आज्ञा पाकर तृणावर्त ने एक बवंडर का रूप धारण कर किया और वह गोकुल पहुंच गया। भगवान श्री कृष्ण को देखते ही वह असुर उन्हें अपने साथ आकाश में उड़ा ले गया। उसके प्रकोप से चारों और आंधी ही आंधी थी। जिससे लोग देखने में भी असमर्थ हो गए। सारा गोकुल कुछ समय के लिए अंधकारमय हो गया था। उसकी इस माया से सभी गोकुलवासी एक दूसरे को पहचान भी नहीं पा रहे थे।

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इतने में माता यशोदा भी घर से बाहर आ गई और अपने पुत्र को आंगन में न पाकर वह अत्यंत चिंतित हो गई। वह अपने लाल को न वहां न पाकर रोने लगी। उनकी गायों के बछड़े भी मर गए थे। जिस प्रकार गायें अपने बछड़ों के वियोग में रो रही थी। उसी प्रकार माता यशोदा भी अपने पुत्र के लिए रो रही थी। यशोदा जी रोते - रोते जमीन पर गिर पड़ी। जब वह आंधी कम हुई तो लोग यशोदा जी की पुकर सुनकर उनकी और दौड़ पड़े। यशोदा जी उस समय अपने पुत्र को न देखकर फूट- फूटकर रो रही थी। वहीं तृणावर्त श्री कृष्ण का वध करने के लिए उन्हें आकाशमंडल में ले गया। भगवान श्री कृष्ण ने अचानक ही अपना भार इतना बढ़ा लिया कि तृणावर्त उनका भार संभाल ही नहीं पा रहा था।


जिसकी वजह से उसका वेग कम हो गया और वह आगे कि और बढ न सका। तृणावर्त भगवान कृष्ण के भार को नीलगिरी चट्टान के बराबर समझने लगा। श्री कृष्ण ने तृणावर्त का गला इतनी जोर से पकड़ा कि वह उनसे अपना गला छुड़ा ही नही पाया। उस राक्षस का दम घुटने लगा उसी आंखे बाहर की और आने लगी और वह कुछ बोल भी नही पा रहा था और उसके प्राण वहीं पर निकल गए। गोकुल वासियों ने देखा कि एक भयानक राक्षस एक चट्टान पर जाकर गिर पड़ा है और उस राक्षस का प्रत्येक अंग चकनाचूर हो गया है। भगवान श्री कृष्ण उसके शरीर पर बैठे हुए हैं। यह देखकर वहां खड़े सभी लोग आश्चर्च चकित हो गए।

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वहां खड़ी महिलाओं ने तुरंत ही भगवान श्री कृष्ण को अपनी गोद में उठाया और यशोदा जी के पास ले आईं। यशोदा जी और नंद बाबा अपने पुत्र को सकुशल देखकर अत्यंत ही प्रसन्न थे। सभी लोग इस बात को लेकर परेशान थे कि यह राक्षस है कौन और कैसे एक छोटे से बालक ने इतने बड़े राक्षस को मृत्यु के घाट उतार दिया।

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