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Janmashtami 2019 : जन्माष्टमी पर जानें कैसे हुआ द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण और हनुमान जी का मिलन

जन्माष्टमी पर आज हम आपको द्वापर युग की एक घटना के बारे में बताने जा रहे हैं, हनुमान जी ने अपने आराध्य प्रभु के दर्शनों के लिए पूरा एक युग बिता दिया था, यह देखकर नारद जी ने श्री कृष्ण से कहा कि क्या आपके इस भक्त के पास अपने प्रभु को पहचनाने की दृष्टि नहीं है, नारद जी की यह बात सुनकर श्री कृष्ण ने नारद जी को हनुमान जी की परीक्षा की आज्ञा दी।

Janmashtami 2019 : जन्माष्टमी पर जानें कैसे हुआ द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण और हनुमान जी का मिलन

Janmashtami 2019 जन्माष्टमी पर भगवान श्री कृष्ण की अनेकों कथाओं का वर्णन किया जाता है। इन्हीं में से एक कथा है भगवान श्री कृष्ण और हनुमान जी के मिलन को लेकर। द्वापर युग में एक समय ऐसा भी आया जब भगवान श्री कृष्ण ने अपने त्रेतायुग के प्रिय भक्त को द्वापर युग में दर्शन दिए। जन्माष्टमी का पर्व (Janmashtami Festival) इस साल 2019 में 24 अगस्त 2019 के दिन मनाया जाएगा। भगवान श्री कृष्ण (Lord Shri Krishna) को विष्णु जी का ही आठवां अवतार माना जाता है। जिन्होंने अधर्मी कंस को मारने के लिए धरती पर जन्म लिया था तो आइए जानते हैं द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण और हनुमान जी का मिलन कैसे हुआ


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भगवान श्री कृष्ण और हनुमान जी का मिलन (Bhagwan Shri Krishna or Hanuman Ji Ka Milan)

एक बार द्वापर युग में नारद जी ने राम भक्त हनुमान जी की परीक्षा लेने के बारे में सोचा। उन्होंने भगवान श्री कृष्ण से कहा कि क्या रामभक्त हनुमान के पास ऐसी दृष्टि है कि वह अपने आराध्य भगवान को पहचान सके। इस पर भगवान श्री कृष्ण ने नारद जी से कहा कि आप स्वंय ही देख लें कि मेरे भक्त के पास ऐसी कोई मौजूद भी है कि नहीं। भगवान श्री कृष्ण की आज्ञा पाकर नारद जी हनुमान जी के पास पहुंच गए और उनसे पूछने लगे कि आप आज अत्याधिक प्रसन्न दिखाई दे रहें हैं। इस प्रश्न के उत्तर में हनुमान जी कहते हैं कि हे नारद जी आप तो त्रिकाल दर्शी हैं। आप तो सब कुछ जानते हैं कल रामनवमी हैं कल मेरे प्रभू श्री राम का जन्मदिवस है और मैं प्रत्येक वर्ष अयोद्धया नगरी में सरयू नदी के किनारें ब्राह्मणों को भोजन कराता हुं। भगवान श्री कृष्ण अपनी दिव्य दृष्टि से यह सब कुछ देख रहे थे।

नारद जी तुंरत ही भगवान श्री कृष्ण के पास जाते हैं और उनसे कहते हैं कि प्रभु में अभी आपके दूत हनुमान से मिलकर आ रहा हुं। मैने उनसे कहा कि आप चाहें तो मेरे साथ चलकर अपने आराध्य प्रभू श्री राम के दर्शन कर सकते हैं। क्योंकि श्री कृष्ण भी भगवान विष्णु के ही अवतार हैं जिन्होंने द्वापर युग में जन्म लिया है। लेकिन आपके प्रिय भक्त ने मेरे साथ आने से इंकार कर दिया और यह कह दिया कि जब तक प्रभू की इच्छा नहीं होगी तब तक मैं उनसे नहीं मिल सकता। अगर मैं ऐसा करता हुं तो यह उनका अपमान होगा। इस पर नारद जी भगवान श्री कृष्ण से कहते हैं हे प्रभु क्यों न भेष बदलकर उस जगह पर चला जाए। जहां पर हनुमान जी आपका जन्मदिवस मना रहे हैं।अगले दिन हनुमान जी भी भेष बदलकर सरयू किनारें पर पहुंच जाते हैं और नारद जी और श्री कृष्ण भी अपना भेष बदलकर वहां पर पहुंच जाते हैं।


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इसके बाद नारद जी कहते हैं कि मुझे नहीं लगता कि अब आपका भक्त आपको पहचान पाएगा। हनुमान जी जय श्री राम का नारा लगाते हुए लोगों में भोजन बांटते जातें हैं। भोजन बांटते - बाटंते जब वह भगवान श्री कृष्ण और नारद जी के पास आते हैं तो उन्हें देखकर रूक जाते हैं। श्री कृष्ण हनुमान जी से कहते हैं कि हम लोग भूखें हैं हमें भी भोजन परोसें। यह सुनकर हनुमान जी की आखों से आंसुओं की धारा बहने लगती है। क्योंकि वह पहचान जाते हैं कि यह कोई और नहीं बल्कि उनके आराध्य देव श्री राम के अवतार कृष्ण जी हैं।

इसके बाद भगवान श्री कृष्ण और अपने असली रूप में आ जाते हैं और हनुमान जी को दर्शन देते हैं। इसके बाद श्री कृष्ण हनुमान जी को द्वारका नगरी आने के लिए कहते हैं। जिस पर हनुमान जी कहते हैं कि मैं द्वारका जरूर आऊंगा और आपके और माता सीता के दर्शन अवश्य करूंगा। यह देखकर नारद जी भगवान श्री श्रमा मांगते और कहते हैं कि मैं यह मानता हुं की हनुमान से बड़ा भक्त आपका इस संसार में कोई और हो ही नहीं सकता।

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