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Holi 2019 : होली पर निबंध हिंदी में

होली 2019 कब है (Holi 2019 Date) अगर आपको नहीं पता तो बता दें कि होली 2019 में बुधवार 20 मार्च 2019 (Holi 2019) को धुलेंडी है जबकि रंगों का त्योहार होली 21 मार्च 2019, गुरूवार को मनाई जाएगी। फाल्गुन मास (Falgun Month) की शुक्ल पक्ष की पूर्ण तिथि को फाल्गुन पूर्णिमा (Falgun Purnima 2019) कहा जाता है। इसी के साथ चैत्र माह / वसंतोत्सव की शुरुआत भी हो जाती है। ऐसे में अगर आपको स्कूल के लिए होली पर निबंध (Holi Essay In hindi) लिखना है तो आचार्य डॉ. गोविंद बल्लभ जोशी द्वारा होली का सबसे बेस्ट होली पर निबंध (Holi Par Nibandh) हिंदी में आपके लिए मददगार रहेगा।

Holi 2019 : होली पर निबंध हिंदी में

होली 2019 कब है (Holi 2019 Date) अगर आपको नहीं पता तो बता दें कि होली 2019 में बुधवार 20 मार्च 2019 (Holi 2019) को धुलेंडी है जबकि रंगों का त्योहार होली 21 मार्च 2019, गुरूवार को मनाई जाएगी। फाल्गुन मास (Falgun Month) की शुक्ल पक्ष की पूर्ण तिथि को फाल्गुन पूर्णिमा (Falgun Purnima 2019) कहा जाता है। इसी के साथ चैत्र माह / वसंतोत्सव की शुरुआत भी हो जाती है। ऐसे में अगर आपको स्कूल के लिए होली पर निबंध (Holi Essay In hindi) लिखना है तो आचार्य डॉ. गोविंद बल्लभ जोशी द्वारा होली का सबसे बेस्ट होली पर निबंध (Holi Par Nibandh) हिंदी में आपके लिए मददगार रहेगा।

रंगों की बौछार करती, मन में उमंग भरती आ गई होली। प्राचीन काल से मनाया जा रहा यह पर्व अपने विविधवर्णी स्वरूप में समाज को अनेक संदेश देता है। स्वास्थ्य के प्रति सजग और समाज-देश के प्रति जागरूक होने के साथ ही यह पर्व हमें अपने मन में व्याप्त मलीनता और नीरसता को दूर कर नवऊर्जा से संचारित कर देता है। आइए, हम सब इसमें निहित संदेश को आत्मसात करें और परस्पर प्रेम के रंग में सराबोर होकर इसे पूरे उल्लास से मनाएं।

भारत में मनाए जाने वाले हर पर्व और उत्सवों का सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक महत्व होता है। यही वजह है कि इन पर्वों से समाज में समरसता, प्रीति और अनुराग का संचार होकर नई ऊर्जा प्रवाहित होती है। रक्षाबंधन, विजय दशमी, दीपावली और होली भारत के सामाजिक ताने-बाने को सुरक्षित रखने के प्राचीनतम चार महोत्सव हैं। इनमें भी होली का स्वरूप सबको एक रंग में रंगने का गहन संदेश देता है, जो सर्वथा विशिष्ट है।

स्वस्थ जीवन का संदेश

होलिकोत्सव मूलत: वैदिक काल से मनाया जा रहा एक प्रकार का सोम यज्ञ है, जिसका आज स्वरूप बदल गया है या यों कहें समाज उसे भूल गया है। वैदिक यज्ञों में सोमयज्ञ का बहुत महत्व बताया गया है, जिसमें अग्नि समिधा से निकलने वाले धूम से अमृततत्व की प्राप्ति की बात कही गई है। यज्ञ से सबसे अधिक वर्षा प्रभावित होती है। वर्षा से अन्न, वनस्पति आदि में रस संचार होता है। यह रस मानव जीवन के लिए अमृतमय हो जाता है। होली के अवसर पर सोमलता से यज्ञ किया जाता था, जो अब प्राय: दुर्लभ हो गई है। कालांतर में सोमलता के अभाव में एरंड की झाड़ियों को होली दहन में प्रयोग किया जाने लगा। अब वह क्रम भी बदल गया लेकिन यदि अब भी लोग अर्जुन वृक्ष की टहनियों को, जो समृद्ध वनों, बागीचों में उपलब्ध रहते हैं अथवा छाल को, जो आयुर्वेद की दुकानों में मिल जाती हैं, थोड़ा सा भी होलिका दहन में प्रयोग करें तो उसका स्वास्थ्य पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ेगा। आयुर्वेद में अर्जुन को हृदय एवं श्वांस तंत्र के लिए बहुत उपयोगी कहा गया है। कीट-पतंग और रोग फैलाने वाले कीटाणुओं को रोकना तथा उत्तम स्वास्थ्य की कामना के साथ जीवन को हास-परिहास से सुसज्जित करना, होलिकोत्सव का महत्व रहा है।

हास-परिहास का अवसर

सोमयाग परपंरा में होली को महाव्रत अनुष्ठान कहा जाता है। यानी, वर्ष भर की सुख-समृद्धि के लिए वर्ष में एक बार किया जाने वाला अनुष्ठान। इसमें यज्ञकर्ता यज्ञ के साथ हास-परिहात और मनो-विनोद करते थे। इसका उद्देश्य जीवन में आनंद और उल्लासपूर्ण वातावरण को प्रकट करना था। वैदिक काल में होली की यज्ञ वेदी के पास गूलर की एक टहनी गाड़ी जाती थी। वस्तुत: गूलर का फल सबसे मीठा फल माना जाता है। इसकी मिठास इतनी होती है कि पकने के कुछ मिनटों बाद ही उसमें कीड़े उत्पन्न होने लगते हैं। इस का भाव यह है कि मिठास को अपने पास संचित न रखकर मनुष्य को उसे तुरंत समाज में वितरित कर देना चाहिए। वस्तुत: यह पर्व मानव जीवन में मिठास उत्पन्न कर उसे तुरंत समाज में प्रसारित कर देने की ओर प्रेरित करता है।

होली का महत्व (Holi Importance)

कहा जाता है कि होली दहन की यज्ञ अग्नि में हिरण्यकश्यपु की बहिन अपने नन्हे भतीजे प्रह्लाद को दग्ध कर देना चाहती थी परंतु नारायण भक्त प्रह्लाद बच गए, होलिका होली में जल गई। तब भगवान नृसिंह अवतार ने हिरण्यकश्यपु को चीर कर यमपुरी पहुंचाया। अत: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान नारायण मानव समाज को यह संदेश दे गए कि आतंकवाद रूपी हिरण्यकश्यपु हर युग में मिल सकता है। राष्टÑभक्त धर्मपरायण प्रत्येक व्यक्ति, आतंकवाद रूपी हिरण्यकश्यपु को समाप्त करने के लिए नर से नरसिंह बने यानी, इसके खात्मे के लिए हर तरह से तैयार रहे। वस्तुत: आज के समाज में यदि होलिकोत्सव के इस संदेश को पूरा समाज समझ ले तो देश से आतंकवाद को तुरंत मिटाया जा सकता है, तभी समाज में सुख-शांति और प्रगति के बीज अंकुरित हो सकते हैं। राष्ट्र में विघटनकारी तत्वों के लिए नृसिंह के नख और राष्ट्र में प्रेम सौहार्द, उल्लास और प्रीति बढ़ाने के लिए राग-रंग और प्रीति के फाग झंकृत करना, इस पर्व का संदेश है। वस्तुत: मानव समाज, परस्पर द्वेष-घृणा और प्रतिशोध को होलिका दहन में दग्ध कर धर्म, जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषा विवाद छोड़कर होली पर एकजुट होकर राष्ट्र के लिए समर्पित होने का संकल्प ले, यही वास्तविक भाव है होली मनाने का। आजकल प्राय: यह देखा जाता है कि इस उत्सव में कुछ लोग हुड़दंग करते हैं, जो सर्वथा अनुचित ही नहीं बल्कि इस पर्व की आत्मा को नष्ट करने का प्रतीक हो जाता है, इससे समाज को बचना और बचाना होगा।

गीत-संगीत का उत्सव

होली मनाने का एक रूप गायकी भी है, जिसमें होली की ऋतु यानी, बसंत के स्वागत में गाए जाने वाले शास्त्रीय राग और रागिनियां आते हैं। होली की गायकी का प्रारंभ प्राय: बसंत पंचमी से ही हो जाता है। आज भी ब्रजमंडल, उत्तराखंड, बिहार के मिथिलांचल, दक्षिण भारत के कई मंडलों में इस गायकी का क्रम बदस्तूर चला आ रहा है, जिसका समापन होली एकादशी से पूर्णिमा तक पांच दिनों की धूम मची होली के साथ किया जाता है। होली की गायकी में शास्त्रीय संगीत का ‘काफी’ थाट सबसे अधिक प्रचलित है। इस थाट में अनेकों राग आते हैं, जिनकी गायन शैली लोगों के मन-मस्तिष्क में प्रीति भरी मादकता भर देती है। राग काफी, •ौरवी, जैजैवंती, हिंडोल, जत चांचर, खम्माज, आ•ोगी, माण, झिंझोटी, बसंत, बहार आदि अनेक ऐसे राग हैं, जो होली के गीतों से गुंफित हैं।

इन रागों से होली प्रकृति के संग एक रंग होने का महोत्सव बन जाता है।

होली गीत (Holi Geet)

‘होली खेलो फागुन ऋतु आय रही

राधानंद किशोर समझाय रही...

बेला भी फूली, चमेली भी फूली, सरसों सरसाय रही

राधानंद कुंवर समझाय रही,’

जैसे भक्ति रंजित श्रंगार के गीतों से फागुन का स्वागत होता है तो-

‘चंचल चपला-चपला सी चमके, बोलत मीठे बैन तिरछी नजर से तीर चलाए, लूटत हिय को चैन काजल कोर नैन’

ऐसे श्रंगारिक राग रंजित गीतों से होली की मादकता शिखर छूने लगती है, इतना ही नहीं भक्ति और बैराग्य से भरपूर राग भी होली को ईश्वर प्राप्ति का सहज आनंद देने लगते हैं जैसे-

‘भव भंजन गुन गाऊं, मैं तो अपने राम को रिझाऊं..

गंगा न जाऊं, यमुना न जाऊं, न कोई तीर्थ जाऊं,

अड़सठ तीर्थ या घर माहीं, उन्हीं में मलमल नहाऊं,’

वस्तुत: होली में धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की सिद्धि के दर्शन होते हैं। हमें गहनता से विचार करने की आवश्यकता है कि कहीं हम अपनी इस महानतम, संपूर्ण आनंददायी उत्सव परंपरा से भटक तो नहीं रहे हैं? आइए धीरे-धीरे ही सही इस प्राचीन एवं महान सामाजिक समरसता के महोत्सव के मूल रूप की ओर लौट चलें और होलिकोत्सव के गहन अर्थ को समझें और उसे दूसरों में भी बांटें।

श्रीकृष्ण की होली

होलिकोत्सव में गीत और नृत्य की प्रधानता होती है। वस्तुत: सामवेद की परंपरा का यह पर्व संगीत प्रधान उत्सव है। शायद इसीलिए भगवान कृष्ण कहते हैं, ‘वेदानां सामवेदोअहम्’ अर्थात, वेदों में मैं सामवेद हूं। कालांतर में इस पर्व में अनेक परिवर्तन आते गए लेकिन द्वापर के अंत में अवतरित योगीराज श्रीकृष्ण द्वारा समस्त समाज को एक रस कर रंगों और गीत संगीत की तरंगों में सराबोर करने का जो क्रम प्रारंभ हुआ, वह आज भी जीवंत रूप में दिखाई देता है। इसीलिए आज होली के आदर्श केंद्र के रूप में व्रजमंडल ही है, उसी की परिधि में सारा देश अपनी-अपनी लोक टोलियों में होलिकोत्सव मनाता है।

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