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Govardhan Puja 2019 : गोवर्धन पूजा कब है, जानें शुभ मुहूर्त, महत्त्व, व्रत विधि और गोवर्धन कथा-आरती

भगवत गीता और भगवत पुराण में गोवर्धन लीला (गोवर्धन पर्वत) का बखान किया गया है, दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है, ऐसे में गोवर्धन पूजा 2019 में कब है, गोवर्धन पूजा शुभ मुहूर्त, गोवर्धन पूजा का महत्व, गोवर्धन पूजा विधि और गोवर्धन कथा-आरती के बारे में जानने से आप गोवर्धन पूजा का विशेष लाभ (Govardhan Puja Benefits) प्राप्त कर सकते हैं। गोवर्धन पूजा पर विशेष रूप से गोवर्धन पर्वत, गाय और बैलों की पूजा की जाती है।

Govardhan Puja 2019 : गोवर्धन पूजा कब है, जानें शुभ मुहूर्त, महत्त्व, व्रत विधि और गोवर्धन कथा-आरतीGovardhan Puja 2019 Date Time When Is Govardhan Puja Subh Muhurat Mahatva Vrat Vidhi Goverthan Katha Aarti

Govardhan Puja : गोवर्धन पूजा कब है २०१९ अगर आप नहीं जानते तो बता दें कि गोवर्धन पूजा 2019 में 28 अक्टूबर 2019 के दिन है। दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। दिवाली 2019 में 27 अक्टूबर की है। गोवर्धन पूजा के दिन गौ माता और गोवर्धन पर्वत की विशेष पूजा की जाती है। द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण (Shri Krishna) ने इंद्र (Indra) के अहंकार तोड़ने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाकर गोकुल वासियों की रक्षा की थी। इसी कारण हर वर्ष गोवर्धन पूजा (Govardhan Puja ) की जाती है। गोवर्धन पूजा का त्योहार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा का पर्व मनाया जाता है। तो आइए जानते हैं गोवर्धन पूजा शुभ मुहूर्त, महत्त्व, पूजा विधि और कथा के बारे में...


गोवर्धन पूजा 2019 तिथि (Govardhan Puja 2019 Tithi)

28 अक्टूबर 2019

गोवर्धन पूजा 2019 शुभ मुहूर्त (Govardhan Puja 2019 Subh Muhurat)

गोवर्धन पूजा मुहूर्त - शाम 3 बजकर 24 मिनट से शाम 5 बजकर 36 तक

प्रतिपदा तिथि प्रारंभ - सुबह 9 बजक 8 मिनट से (28 अक्टूबर 2019)

प्रतिपदा तिथि समाप्त -शाम 6 बजकर 13 मिनट तक (29 अक्टूबर 2019)


गोवर्धन पूजा का महत्त्व (Govardhan Puja Ka Mahatva)

गोवर्धन पूजा को विशेष महत्व दिया गया है। इस दिन गौ माता की पूजा की जाती है। गोवर्धन पर्वत ब्रज में स्थित है। यह एक छोटी सी पहाड़ी है। लेकिन इस पहाड़ी को पर्वतों का राजा माना जाता है। क्योंकि द्वापर युग का सिर्फ एक यही अवशेष ही वर्तमान समय में मौजूद है। यमुना नदी ने तो समय- समय पर अपनी दिशा बदलती रही। लेकिन गोवर्धन पर्वत एक ही स्थान पर आज भी अपने मूलभूत स्थान पर खड़ा है। गोवर्धन पर्वत को भगवान श्री कृष्ण के रूप में ही पूजा जाता है।

पुराणों के अनुसार गोवर्धन पर्वत के महत्त्व को दर्शाते हुए कहा गया है - गोवर्धन पर्वतों के राजा और हरि के प्रिय हैं।इसके समान पृथ्वी और स्वर्ग में दूसरा कोई तीर्थ नहीं है। पुराणों के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने इंद्र के अंहकार को तोड़ा था। जिसके पीछे उनका एक मात्र उद्देश्य ब्रज वासियों की रक्षा और गौ धन को बचाना था। गौ माता की महत्वता को बताने के लिए ही गोवर्धन पूजा की जाती है। क्योंकि गौ माता मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व रखती हैं। गौ माता से प्राप्त चीजों की ही मनुष्य सेवन करता है।


गोवर्धन पूजा विधि (Govardhan Puja Vidhi)

1.गोवर्धन पूजा के दिन सबसे पहले पूजा करने वाले व्यक्ति को स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण करने चाहिए।

2.इसके बाद गाय को गोबर से गोवर्धन की मूर्ति बनाएं। इसके बाद भगवान गिरिराज का स्मरण करते हुए अन्नकूट का भोग लगाएं।

3. इस दिन गाय और बैलों का विशेष पूजन किया जाता है। इसलिए गाय और बैल को स्नान कराकर उनका धूप, दीप, फूल और मालाओं से पूजन करें।

4.इसके बाद उनकी आरती उतारें और उन्हें मिठाई का भोग लगाएं।

5. अंत में सभी को वही मिठाई प्रसाद के रूप में वितरण करें।


गोवर्धन पूजा व्रत की कथा (Govardhan Puja Ki Katha)

पौराणिक कथा के अनुसार द्वापर युग में ब्रज में इंद्र की पूजा की जाती थी। एक बार भी जब इंद्र की पूजा की जा रही थी। उस समय भगवान श्री कृष्ण उस पूजा में पहुंचे और पूजा के बारे में पूछने लगे। तब ब्रजवासियों ने बताया कि यह देवराज इंद्र की पूजा की जा रही है। इस पर भगवान श्री कृष्ण ने सभी नगरवासियों से कहा कि हमें इंद्र की पूजा करके कोई लाभ नही होता। वर्षा करना तो उनका कर्म और दायित्व है और वह सिर्फ अपना कर्म कर रहे हैं। लेकिन गोवर्धन पर्वत हमारी गायों का संरक्षण और भोजन उपलब्ध कराते हैं। जिसकी वजह से वातावरण भी शुद्ध होता है।

इसलिए हमें इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। जिसके बाद सभी ने भगवान श्री कृष्ण की बात मानकर गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी शुरु कर दी। जिससे इंद्र क्रोधित हो उठे और मेघों को आदेश दिया की गोकुल का विनाश के दो।

इसके बाद गोकुल में भारी बारिश होने लगी और गोकुल वासी भयभीत हो उठे। भगवान श्री कृष्ण ने सभी गोकुल वासियों को गोवर्धन पर्वत के संरक्षण में चलने के लिए कहा। जिसके बाद श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका ऊँगली पर उठा लिया और सभी ब्रजवासियों की इंद्र के प्रकोप से रक्षा की।

इंद्र ने अपने पूरे बल का प्रयोग किया लेकिन उनकी एक न चली। इसके बाद जब इंद्र को यह पता चला कि भगवान श्री कृष्ण विष्णु भगवान का ही अवतार हैं तो उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ और वह भगवान श्री कृष्ण से श्रमा मांगने लगे। तब ही से गोवर्धन पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है।

गोवर्धन आरती (Govardhan Aarti) गिरिराज जी की आरती (Giriraj Ji Ki Aarti)

ॐ जय जय जय श्री गिरिराज, जय जय श्री गिरिराज

संकट में तुम रखो, निज भक्तन की लाज

जय जय जय श्री गिरिराज, जय जय श्री गिरिराज

इंद्रादिक सब देवा तुम्हरो ध्यान धरे।

ऋषि मुनि जन यश गामें, ते भवसिंधु तरे॥

ॐ जय जय जय श्री गिरिराज

सुन्दर रूप तुम्हरौ श्याम सिला सोहें।

वन उपवन लखि लखिके ,भक्तन मन मोहें॥

ॐ जय जय जय श्री गिरिराज

मध्य मानसी गंगा, कलि के मल हरनी।

तापै दीप जलावे, उतरे बैतरनी॥

ॐ जय जय जय श्री गिरिराज

नवल अप्सरा कुण्ड सुहाने, दाँये सुखकारी।

बायेँ राधा -कृष्ण कुण्ड है, महापाप हारी॥

ॐ जय जय जय श्री गिरिराज

तुम हो मुक्ति के दाता, कलयुग में स्वामी।

दीनन के हो रक्षक , प्रभु अन्तर्यामी॥

ॐ जय जय जय श्री गिरिराज

हम हैं शरण तुम्हरी, गिरवर गिरधारी।

देवकीनंदन कृपा करो हे भक्तन हितकारी॥

ॐ जय जय जय श्री गिरिराज

जो नर दे परिकम्मा , पूजन पाठ करें।

गावें नित्य आरती , पुनि नहीं जनम धरें॥

ॐ जय जय जय श्री गिरिराज

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