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Diwali 2019 : दिवाली का पर्व हिंदू के साथ सिक्ख, जैन और बौद्ध धर्म के लिए भी है विशेष, जानिए कैसे

दिवाली का पर्व सभी धर्मों के लिए अत्ंयत महत्वपूर्ण है, जिसका कारण सभी धर्मों की अलग- अलग मान्यताएं हैं, इस त्योहार को हिंदू धर्म के साथ-साथ सिक्ख धर्म, जैन धर्म और बौद्ध धर्म के लोग भी मनाते हैं, लेकिन इसका कारण क्या है आइए जानते हैं।

Diwali 2019 : दिवाली का पर्व हिंदू धर्म के अलावा सिक्ख धर्म, जैन धर्म और बौद्ध धर्म के लिए भी है विशेष, जानिए कैसेदिवाली 2019

Diwali 2019 दिवाली का त्योहार अंधकार में प्रकाश को दर्शाता है। यह त्योहार सभी धर्मों के लिए विशेष महत्व रखता है। दिवाली का यह त्योहार (Diwali Festival) न केवल हिंदू धर्म के लोग बल्कि सिक्ख धर्म के लोग,जैन धर्म के लोग और बौद्ध धर्म के लोग भी बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। दिवाली का पर्व इस साल 2019 में 27 अक्टूबर 2019 (27 October 2019) के दिन यानी रविवार को मनाया जाएगा। सभी धर्म के लोग दिवाली का त्योहार अलग- अलग मान्यताओं के कारण मनाते हैं तो आइए जानते हैं। दिवाली का पर्व हिंदू धर्म के अलावा सिक्ख धर्म, जैन धर्म और बौद्ध धर्म के लिए क्यों है विशेष


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हिंदू धर्म के लोग क्यों मनाते हैं दिवाली (Hindu Dharam Ke Log Kyu Manate Hai Diwali)

हिंदू धर्म में दिवाली का त्योहार बड़े बहुत खास माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार दशहरे के दिन जब भगवान राम ने रावण का वध किया था। उसके बाद दिवाली के दिन वह चौदह वर्ष का वनवास समाप्त करके अयोद्धया लौटे थे। अयोद्धया लौटने पर अयोद्धया वासियों ने उनके प्रति श्रद्धा भाव और खुशी जाहिर करते हुए दीप जलाकर भगवान श्री राम, माता सीत और लक्ष्मण जी का स्वागत किया था। इसके अलावा इस दिन भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की पूजा का भी विधान है। माना जाता है कि इस दिन माता लक्ष्मी अपने वाहन उल्लू पर बैठकर पृथ्वीं का भ्रमण करती हैं। इस दिन माता लक्ष्मी अपने भक्तों को आर्शीवाद देती हैं। दिवाली का यह दिन धन से जोड़कर भी देखा जाता है। इसलिए दिवाली का यह दिन हिंदू धर्म के लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है। दिवाली का यह पर्व पांच दिनों तक चलता है। इसकी शुरुआत धनतेरस से ही शुरु हो जाती है और भाई दूज के दिन यह पर्व समाप्त हो जाता है।


सिक्ख धर्म के लोग क्यों मनाते है दिवाली (Sikh Dharam Ke Log Kyu Manate Hai Diwali )

दिवाली का दिन सिक्ख धर्म में अधिक महत्व रखता है। सिक्ख धर्म में दिवाली का त्योहार बांदी छोड़ दिवस के रूप में मनाया जाता है। यानी जिस दिन बंधी रिहा हुए थे। दिवाली का इतिहास व बांदी छोड़ दिवस का इतिहास बिल्कुल अलग है। दिवाली का त्योहार हिंदू धर्म में भगवान श्री राम के अयोद्धया वापस आने की खुशी में मनाया जाता है। उसी प्रकार सिक्खों के छठे गुरु श्री हरगोबिंद जी व 52 हिंदू राजाओं को मुगलो ने ग्वालियर कारागार से 1619 ईसवीं में आजाद किया था। जब गुरु जी रिहा होकर अमृतसर वापस आए तो उनके आने की खुशी में पूरा शहर जगमगा रहा था। उस दिन सिक्खों ने ऐसी दिवाली मनाई जो अमृतसर में पहले कभी भी नहीं मनाई गई थी। इस प्रकार सिक्ख धर्म में बांदी छोड़ दिवस के रूप में दिवाली मनाने की प्रथा शुरु हुई। आज भी बांदी छोड़ दिवस अमरवास की रात्रि में प्रतिवर्ष ग्वालियर के बांदी छोड़ साहिब गुरुद्वारे में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।


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जैन धर्म के लोग क्यों मनाते हैं दिवाली (Jain Dharam Ke Log Kyu Manate Hai Diwali )

जैन धर्म के लोगों के लिए भी दिवाली का अधिक महत्वपूर्ण होता है। इस दिन जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर जी ने बिहार के पावापुरी में निर्वाण प्राप्त किया था। जैन धर्म में पंचांग भी दिवाली के दूसरे दिन से शुरू होता है। दिवाली के दूसरे दिन ही जैन धर्म के नववर्ष की शुरुआत हो जाती है। इस मौके पर भगवान महावीर को निर्वाण लड्डू का महत्व है। जैन श्रद्धालु दिवाली पर पावापुरी में दीप जलाने पहुंचते हैं। जो लोग महावीर जी के निर्वाणी स्थल तक नहीं पहुंच सकते। वे लोग घर पर ही निर्वाण के लड्डू चढ़ाकर दिवाली का त्योहार मनाते हैं। इसलिए दिवाली का यह पर्व जैन धर्म में भी विशेष महत्व रखता है। बिहार के अलावा जो जैन धर्म के जो लोग भारत के अन्य राज्यों में रहते हैं। वह भी महावीर जी के अन्य मंदिरों में जाकर निर्वाण के लड्डू चढ़ाते हैं। जिससे वह महावीर भगवान का आर्शीवाद प्राप्त कर सकें।


बौद्ध धर्म के लोग क्यों मनाते हैं दिवाली (Bodh Dharam Ke Log Kyu Manate Hai Diwali)

बौद्ध धर्म के अनुसार दिवाली के दिन भगवान बुद्ध कपिलवस्तु से लौटे थे। माना जाता है कि जब सिद्धार्थ कपिलवस्तु की सैर से लौटे थे। तो उन्होंने सफर के दौरान उन्होंने एक बूढ़ा आदमी , बिमार व्यक्ति, शव और एक संयासी को देखा था। इसके बाद जब वह घर लौटे तो सांसारिक सुखों से दुखी होकर उन्होंने 29 साल की उम्र में घर छोड़ दिया था। जिसे बौद्ध धर्म में महानिवेशकृमण कहा जाता है। इसके बाद ज्ञान प्राप्त करने के बाद वह भगवान बुद्ध बन गए। भगवान बुद्ध का उद्देश्य अपो दीपो भव : से दिवाली की परंपरा जुड़ी हुई है। जिसे बौद्ध धर्म के लोग बड़े ही धूमधाम से मनाते हैं। इसलिए बौद्ध धर्म में इस दिन को विशेष महत्व दिया जाता है और बौद्ध धर्म के लिए यह दिन विशेष महत्व रखता है।

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