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Budh Purnima 2018: जानिए क्या है बुद्ध के दर्शन की ''चार आर्य आधारशिला''

बुद्ध पूर्णिमा 2018 के अवसर पर जानिए क्या है बुद्ध के दर्शन की ''चार आर्य आधारशिला'' और यही बुद्ध के उपदेश की रीढ़ है। सम्यक् जीविका बहुत स्पष्ट है। जीविका के लिए कोई ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए, जिसमें बुद्ध के उपदेशों के विरुद्ध कार्य करना पड़े। सम्यक स्मृति आध्यात्मिक उन्नति के लिए सतत्ा जागरूकता को कहते हैं।

Budh Purnima 2018: जानिए क्या है बुद्ध के दर्शन की चार आर्य आधारशिला
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Budh Purnima 2018

गौतम बुद्ध ने मानवीय गरिमा और समानता पर जितना जोर दिया है, उतना शायद ही किसी ने दिया होगा। उन्होंने पीड़ित, दुखी समाज को मुक्ति का मार्ग दिखाया। उन्होंने आत्मा, परमात्मा, ईश्वरवाद की परिकल्पनाओं का खंडन किया। इसके साथ-साथ ब्राह्मणवादी कर्मकांड और ऊंच-नीच के भेदभाव को कई सौ वर्षों तक के लिए जड़ से उखाड़ फेंका, इसलिए वह आज भी दुखी, पीड़ित और दलित एवं शोषित समाज के लिए उम्मीद की किरण बने हुए हैं।

उन्होंने दुनिया को बताया-सत्य और धर्म का मार्ग सबके लिए खुला है। वहां किसी के भी साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता है। वह सामाजिक क्रांति के सबसे बड़े अग्रदूत के साथ सदैव याद किए जाएंगे। हम 'बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' का आचरण करते हुए तृष्णा के बंधन को तोड़ने का संकल्प करें, यही उनका मूल संदेश है।

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उनके धर्म में मुनष्य के लिए ही नहीं सभी प्रकार के जीवों के प्रति करुणा का संदेश है। बुद्ध के अधरों पर अंतिम क्षण तक यही शब्द थे कि 'अपनी उन्नति अपने ही प्रयत्न से होगी। स्वयं अपनी मुक्ति प्राप्त करो।' अपने संबंध में बुद्ध कहा करते थे, 'आकाश के समान अनन्त ज्ञान संपन्न मुझ गौतम को यह अवस्था प्राप्त हो गई है।

तुम भी यदि प्राणपण से प्रयत्न करो, तो उस स्थिति को प्राप्त कर सकते हो। बुद्ध ने अपनी सभी कामनाओं पर विजय पा ली थी। उन्हें स्वर्ग जाने की कोई लालसा न थी और न ही ऐश्वर्य की कोई कामना थी। अपने राजपाट और सब प्रकार के सुखों को तिलांजलि दे, इस राजकुमार ने सिंधु सा हृदय लेकर नर-नारी तथा जीव जंतुओं के कल्याण के लिए, आर्यावर्त को सड़कों, गलियों में भ्रमण कर भिक्षावृत्ति से जीवन निर्वाह करते हुए अपने उपदेशों का प्रचार किया।

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उन्होंने जीवन और जगत के यथार्थ का लोगों को बोध कराया। उन्होंने वेदों के दर्शन के सारांश की ही शिक्षा बिना भेदभाव हर किसी को दी, उपदेश सारे संसार के लिए किया, क्योंकि मानव की समता उनके संदेशों में से एक है। सब मनुष्य बराबर हैं। बुद्ध समता के महान उपदेष्टा थे। हर स्त्री-पुरुष को आध्यात्मिकता प्राप्त करने का समान अधिकार है, यह उनकी शिक्षा थी। बुद्ध ने कहा है कि जगत क्षणभंगुर और दुखमय है।

शरीर सारे समय परिवर्तित होता रहता है। इसी प्रकार मन, चेतना भी। जगत के इस महासत्य पर विचार करो कि संसार में चारों ओर दुख ही दुख है। देखो संसार में पदार्पण करता हुआ शिशु भी वेदनापूर्ण रूदन करने लगता है। संसार एक रूदन स्थल है, इसलिए यदि हम बुद्ध के शब्दों को हृदय में स्थान देना चाहते हैं तो हमें संपूर्णतः स्वार्थ रहित होना होगा। जिस मार्ग पर चलकर गौतम बुद्ध ने परम शांति अथवा निर्वाण को प्राप्त किया था उसका नाम है मध्यम वर्ग।

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यह मार्ग दो अंतों को-दो अंतियों को छोड़ देता है। इसलिए यह मध्यम मार्ग कहलाता है। एक अंत है। विलासिता का जीवन व दूसरा अंत है तपस्या के नाम पर शरीर को पीड़ा पहुंचाना। गौतम बुद्ध बचपन से ही बड़े गंभीर स्वभाव के थे। वे जीवन की गंभीर समस्याओं पर विचार करते थे। 29 वर्ष की आयु में राजमहल त्याग कर तपस्वी का वेश धारणकर सत्य की खोज में निकले। छह वर्ष की कठिन तपस्या की। उनका शरीर सूखकर कांटा हो गया।

इस प्रकार वे तपस्या की पराकाष्ठा तक पहुंचे। लेकिन सत्य का आभास भी नहीं मिला। गया में जब वे एक दिन बोधि वृक्ष के नीचे बैठे थे तो उनके मन में विचार उठा कि साधना के लिए शरीर और मन दोनों स्वस्थ होने चाहिए। इस प्रकार वे अपने अनुभव के आधार पर दोनों जातियों को छोड़कर मध्यम मार्ग पर चलने लगे और उन्हें बुद्धत्व की प्राप्ति हुई।

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बुद्ध होने के बाद उन्होंने सबसे पहले अपने ज्ञान का अधिकारी उन्हीं पांच भिक्षुओं को समझा जो कि अनशन त्यागने के कारण पतित समझ उन्हें छोड़ आए थे। पता लगाकर वह उनके आश्रम ऋषि-पतन मृगदाव (सारनाथ, वाराणसी) पहुुंचे। यहां बुद्ध ने कहा- 'भिक्षुओं इन दो अतियों को नहीं सेवन करना चाहिए। एक कामसुख में लिप्त होना और दूसरा शरीर पीड़ा में लगना। इन दोनों अतियों को छोड़कर मैंने मध्यम वर्ग खोज निकाला है जो ज्ञान कराने वाला, शांति देने वाला है।

बुद्ध के दर्शन की चार आर्य आधारशिला

  • चार आर्य सत्य बुद्ध के दर्शन की आधारशिला है।
  • पहला जीवन दुखमय है क्योंकि बीमारी, बुढ़ापा, असंतोष और मृत्यु का भय इसे घेरे रहता है।
  • दूसरा दुख का कारण तृष्णा अथवा संसार से जुड़ना है।
  • तीसरे दुख के नाश का उपाय तृष्णा का निरोध है।
  • चौथा आर्य सत्य इच्छा को नष्ट करने का मार्ग बताता है।

यही बुद्ध के उपदेश की रीढ़ है। सम्यक् जीविका बहुत स्पष्ट है। जीविका के लिए कोई ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए, जिसमें बुद्ध के उपदेशों के विरुद्ध कार्य करना पड़े। सम्यक स्मृति आध्यात्मिक उन्नति के लिए सतत्ा जागरूकता को कहते हैं। सम्य्ाक समाधि आर्य अष्टंागिक मार्ग में सहायक अंतिम बिंदु है।

ऐसे ध्यान में सभी वस्तुओं की अनित्यता का भान होता है और निर्वाण प्राप्त होता है। ध्यान की राह में पंाच रोड़े हैं, जिन्हें हटाकर या कम से कम कमजोर करके ही ध्यान आरम्भ किया जा सकता है। ये हैं- कामुकता, अनिष्ट करने की इच्छा, आलस्य, परेशानी और संशय। बुद्ध ने पंाचों साथियों को और भी बहुत सी बातें बताईं।

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