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Basant Panchmi 2019: विदेशों में भी आराध्य हैं ज्ञान की देवी सरस्वती, जानिए कैसे

मां सरस्वती को अपने देश भारत में ही नहीं विदेशों में भी विद्या की देवी माना गया है। वाग्देवी, भारती, शारदा आदि नामों से आराधना की जाने वाली इस देवी के बारे में माना जाता है ये मूर्ख को भी विद्वान बना सकती हैं। धर्मग्रंथों और पुराणों में इनके रूप-रंग को शुक्लवर्णा और श्वेत वस्त्रधारिणी बताया गया है, जो वीणावादन के लिए तत्पर और श्वेत कमल पुष्प पर आसीन रहती हैं।

Basant Panchmi 2019: विदेशों में भी आराध्य हैं ज्ञान की देवी सरस्वती, जानिए कैसे
मां सरस्वती को अपने देश में ही नहीं विदेशों में भी विद्या की देवी माना गया है। वाग्देवी, भारती, शारदा आदि नामों से आराधना की जाने वाली इस देवी के बारे में माना जाता है ये मूर्ख को भी विद्वान बना सकती हैं। धर्मग्रंथों और पुराणों में इनके रूप-रंग को शुक्लवर्णा और श्वेत वस्त्रधारिणी बताया गया है, जो वीणावादन के लिए तत्पर और श्वेत कमल पुष्प पर आसीन रहती हैं।
माघ पंचमी (जिसे वसंत पंचमी भी कहते हैं) के दिन देवी सरस्वती की आराधना विशेष रूप से की जाती है। आपको यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि देवी सरस्वती की आराधना केवल भारत और नेपाल में ही नहीं बल्कि इंडोनेशिया, बर्मा (म्यांमार), थाइलैंड, जापान और अन्य कई देशों में भी होती है।

म्यांमार

यहां विद्या की देवी सरस्वती को मानने वालों की संख्या बहुत अधिक है। 1084 ई. में बनाया गया एक मंदिर भी यहां मौजूद है। म्यांमार के बौद्ध कलाओं में देवी सरस्वती को ‘थुरथदी’ कहा जाता है। बौद्ध कालीन मूर्तियों में भी इनका स्वरूप देखा जा सकता है।

कंबोडिया

कंबोडिया के अंकोरवाट के मंदिरों में मां सरस्वती की प्रतिमा देखी जा सकती है। इससे यह सिद्ध होता है कि यहां भी सदियों पहले से देवी सरस्वती की पूजा होती आ रही है। कंबोडिया के ये मंदिर 7वीं सदी के हैं। उस समय लिखे गए लेखों में देवी सरस्वती को ब्रह्माजी की पत्नी बताया गया है। जिन्होंने देवी सरस्वती को ‘वागेश्वरी’ नाम से संबोधित किया है।

थाईलैंड

यहां के प्राचीन साहित्य से उल्लेख मिलता है कि देवी सरस्वती ‘बोलने की शक्ति’ देती हैं। थाईलैंड में वैसे तो बौद्ध धर्म काफी पल्लवित है। लेकिन देवी सरस्वती का स्वरूप उन्होंने भारत से ही लिया है। यहां मोर पर विराजमान रूप में मां सरस्वती की पूजा होती है।

इंडोनेशिया

इंडोनेशिया यानी बाली में रहने वाले यहां के अप्रवासी भारतीयों की प्रमुख देवी हैं सरस्वती। यहां के धार्मिक साहित्य में देवी सरस्वती का उल्लेख किया गया है। बाली में होने वाले रंगमंच और नृत्य कला में प्रवीण लोग अपनी कला प्रस्तुत करने से पहले मां सरस्वती की वंदना जरूर करते हैं।

जापान

जापान में श्वेत कमल पुष्प पर विराजित बीवा (एक वाद्ययंत्र) बजाती हुई बुद्धि की देवी बेनजायतेन की भी पूजा-आराधना की जाती है। जापान में बौद्ध धर्म के अलावा शिंतो धर्म के अनुयायी भी बड़ी संख्या में हैं। शिंतो का अर्थ है, ‘कामी यानी सर्वशक्तिमान का मार्ग।’ सर्वशक्तिमान का प्रतिनिधित्व करने वाले देव हैं- आमातेरासु (सूर्य भगवान), सुकुयोमी (चंद्रदेव), फूजिन (पवनदेव), सूईजीन (वरुणदेव) और इजनागी और इजनामी। ये देव हमारे पंचभूतों की तरह हैं। जापान में देवी बेनजायतेन के कई मंदिर हैं, जहां श्रद्धालु प्रतिदिन उनके दर्शन और अर्चना के लिए जाते हैं।
मां सरस्वती की तरह ही बेनजायतेन को यहां संगीत, साहित्य, चित्रकला, नृत्य और अभिनय की देवी माना गया है। इसके अलावा भक्तों में अटूट विश्वास है कि देवी बेनजायतेन उन्हें दीर्घ आयु, अच्छा स्वास्थ्य, प्रसन्नता, धन और विजय का आशीर्वाद देती हैं। देवी बेनजायतेन का वाद्ययंत्र बीवा जापान में अकसर शुभ अवसरों और धार्मिक कार्यक्रमों के दौरान बजाया जाता है।
इसका वादन वहां शुभ भी माना जाता है। बौद्ध धर्म के अनुयायी भी देवी बेनजायतेन की पूजा-अर्चना करते हैं। जापान में देवी बेनजायतेन के तीन प्रमुख मंदिर हैं- इत्सुकुशिमा मंदिर, इनोशिमा मंदिर और होगोन जी मंदिर। कुछ लोगों का मानना है कि बेनजायतेन का पति एक दुष्ट ड्रैगन था जिसे उन्होंने सद्बुद्धि दी थी।
यही वजह है कि देवी को ड्रैगन और सांप प्रिय हैं और उन्हें इनकी दूत संदेशवाहक माना जाता है। मान्यता है कि देवी बेनजायतेन जापानियों की भूकंप से भी रक्षा करती हैं। विशेष रूप से नोशिमा द्वीप के लोगों में यह मत ज्यादा प्रचलित है। कुछ लोग इनकी उत्पत्ति भारतीय देवी सरस्वती से ही मानते हैं।
एक अन्य मान्यता के मुताबिक बेनजायतेन को भाग्य की देवी भी माना जाता है, जो तकारा-ब्यून यानी खजाने के जहाज पर सवारी करती हैं। जापानी नए वर्ष के अवसर पर अपने तकिए के नीचे तकारा-ब्यून की तस्वीर रखकर भी सोते हैं ताकि उन्हें ‘लकी ड्रीम’ यानी सौभाग्य वाले सपने दिखें। इन्हें कहीं-कहीं बेनटेन या बेनजाई तेन्यो के नाम से भी संबोधित किया जाता है।

अन्य देशों में देवी सरस्वती के रूप

इसमें कोई संदेह नहीं है कि ज्ञान की पूजा का महत्व सदियों से है और यह आगे भी रहेगा। यही कारण है कि दुनिया के लगभग हर देश में ज्ञान की देवी और देवताओं की परिकल्पना की गई है। जर्मनी में स्नोत्र को ज्ञान, सदाचार और आत्मनियंत्रण की देवी माना गया है।
वहीं फ्रांस, स्पेन, इंग्लैंड, बेल्जियम, ऑस्ट्रिया सहित कई यूरोपीय देशों में ज्ञान और शिल्प की देवी के रूप में मिनर्वा का स्मरण किया जाता है। उसे कताई-बुनाई, संगीत, चिकित्सा शास्त्र और गणित सहित रोजमर्रा के कार्यों में निपुणता की देवी माना गया है। प्राचीन ग्रीस में एथेंस शहर की संरक्षक देवी एथेना को ज्ञान, कला, साहस, प्रेरणा, सभ्यता, कानून-न्याय, गणित, जीत की देवी माना गया।
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