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उमा-महेश्वर व्रत करने का महत्व, आप भी जानें

हिन्दू धर्म में कई ऐसे अवसर आते हैं जब लोगों को शिव पूजन का सौभाग्य मिलता है। भक्तों द्वारा पूरे सावन माह शिव पूजा की जाती है। और भाद्रपद माह में भी भाद्रपद पूर्णिमा के दिन लोग उमा-महेश्वर यानि की भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करते हैं। वैसे तो लोग गणेश चतुर्थी के दिन से ही शिव परिवार की पूजा भगवान गणेश के साथ करते हैं। लेकिन लोग भाद्रपद मास की पूर्णिमा के दिन भगवान शिव और माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए विशेष व्रत करते हैं। इस व्रत को करने से व्यक्ति को खोया धन, मान प्रतिष्ठा, नौकरी सब वापस मिल जाते हैं। तो आइए आप भी जाने उमा महेश्वर व्रत की कथा और व्रत का महत्व।

उमा-महेश्वर व्रत करने का महत्व, आप भी जानें
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प्रतीकात्मक तस्वीर

हिन्दू धर्म में कई ऐसे अवसर आते हैं जब लोगों को शिव पूजन का सौभाग्य मिलता है। भक्तों द्वारा पूरे सावन माह शिव पूजा की जाती है। और भाद्रपद माह में भी भाद्रपद पूर्णिमा के दिन लोग उमा-महेश्वर यानि की भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करते हैं। वैसे तो लोग गणेश चतुर्थी के दिन से ही शिव परिवार की पूजा भगवान गणेश के साथ करते हैं। लेकिन लोग भाद्रपद मास की पूर्णिमा के दिन भगवान शिव और माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए विशेष व्रत करते हैं। इस व्रत को करने से व्यक्ति को खोया धन, मान प्रतिष्ठा, नौकरी सब वापस मिल जाते हैं। तो आइए आप भी जाने उमा महेश्वर व्रत की कथा और व्रत का महत्व।

उमा-महेश्वर व्रत 2020

उमा-महेश्वर व्रत 02 सितंबर 2020 दिन बुधवार को भाद्रपद पूर्णिमा के दिन किया जाता है।

भाद्रपद पूर्णिमा के दिन यह व्रत किया जाता है। और इस दिन हम लोग भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन करते हैं। और यह व्रत उमा-महेश्वर व्रत के नाम से प्रसिद्ध है। इस दिन भगवान भोलेनाथ का अभिषेक करने के बाद उनकी पूजा की जाती है। और भगवान को फूल-पुष्प इत्यादि अर्पित किए जाते हैं। और भगवान शिव के नाम का स्मरण किया जाता है यानि भगवान का गुणगान और कीर्तन-जागरण किया जाता है। इस दिन रात्रि जागरण करके भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न किया जाता है।

कथा

मत्स्य पुराण के अनुसार एक बार महर्षि दुर्वासा भगवान शिव का दर्शन करके लौट रहे थे, और इस दौरान रास्ते में उनकी भेंट भगवान विष्णु जी से हो गई। भगवान शिव ने दुर्वासा ऋषि को जाते समय एक बिल्बपत्र की माला दी थी। और दुर्वासा ऋषि ने वही बिल्बपत्र की माला भगवान विष्णु को अर्पित कर दी। लेकिन भगवान विष्णु ने वह माला स्वयं ना पहन कर गरूण जी को पहना दी। इसे देखकर दुर्वासा ऋषि भगवान विष्णु जी पर क्रोधित हो गए। और उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दे दिया। और श्राप देते हुए दुर्वासा ऋषि ने कहा कि आपके पास से लक्ष्मी इसी वक्त चलीं जाएंगी। क्योंकि आपने भगवान शंकर का अपमान किया है। इसलिए लक्ष्मी आपके पास से चली जाएंगी। और क्षीर सागर से भी तुम चले जाओगे। और शेषनाग भी तुम्हारी कोई सहायता नहीं कर पाएंगे।

इस श्राप को सुनकर विष्णु भगवान ने महर्षि दुर्वासा से बहुत विनम्र होकर के इस श्राप से मुक्ति का उपाय पूछा। तब दुर्वासा ऋषि ने भगवान विष्णु को बताया कि आप भाद्रपद मास की पूर्णिमा के दिन उमा-महेश्वर व्रत को करें तो आपको इस श्राप से मुक्ति मिल सकती है। तो भगवान श्रीहरि विष्णु ने इस व्रत को किया, और उनको सभी चीजें वापस मिल गई।

शास्त्रों के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि इस उमा महेश्वर व्रत को करने से खोया धन, मान प्रतिष्ठा, नौकरी सब वापस मिल जाते हैं। और व्यक्ति खुशहाल हो जाता है।

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