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आइए जानें मां नवदुर्गा के स्वरूपों की कथा, माता के पूजन से होती हैं मनोकामनाएं पूरी

दुर्गा जी की नौ मुर्तियां है, जिन्हें 'नवदुर्गा' कहते हैं। नवरात्रि में देवी नवदुर्गा की उपासना करना बहुत हितकारी माना जाता है। 'नवदुर्गा' का पूजन और अराधना करने से समस्त दुखों का अंत होता जाता है। नौ दुर्गा कहलाने वाली देवियों के नाम इस प्रकार हैं।

आइए जानें मां नवदुर्गा के स्वरूपों की कथा, माता के पूजन से होती हैं मनोकामनाएं पूरी
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प्रतीकात्मक

दिव्य तेज से युक्त देवी के अद्भुत स्वरूप के दर्शन मात्र से ही मनुष्यों के समस्त पाप धुल जाते हैं और उसे परमपद की प्राप्ति होती है। जो मानव नित्य प्रात: उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर शुद्ध मन और सच्चे ह्दय से देवी की उपासना करता है अथवा नौ देवियों की अमर कथा का श्रवण करता है, उस पर भगवती जगदम्बा प्रसन्न होकर मनवांछित फल प्रदान करती हैं।

धन प्रदान करने वाली, शत्रुओं का विनाश करने वाली, दैत्यों का संहार करने वाली माता समय-समय पर अलग-अलग स्वरूपों में अवतरित हुईं, जो अलग-अलग नामों से विख्यात हुई। श्री दुर्गा जी की नौ मुर्तियां है, जिन्हें 'नवदुर्गा' कहते हैं। नवरात्रि में देवी नवदुर्गा की उपासना करना बहुत हितकारी माना जाता है। 'नवदुर्गा' का पूजन और अराधना करने से समस्त दुखों का अंत होता जाता है। नौ दुर्गा कहलाने वाली देवियों के नाम इस प्रकार हैं।

(1) शैलपुत्री, (2) ब्रह्म चारिणी, (3) चन्द्रघंटा, (4) कुष्मांडा, (5) स्कन्दमाता, (6) कात्यायनी देवी, (7) कालरात्रि, (8) महागौरी और (9) सिद्धिदात्री।

मां जगदम्बे के स्परूप को ह्दय में धारण करने तथा मन को एकाग्र करके शक्तिस्वरूपा माता के अनेक रूपों में धरती से लेकर पाताल तक, सजीव से लेकर निर्जीव तक, कण-कण में विद्यमान मातेश्वरी के अनेक रूपों का गुणगान करें। नौ नामों से जग विख्यात नौ देवियोंकी अलग-अलग रूपों में अराधना करने से प्राप्त होने वाले फलों का संक्षिप्त उल्लेख-

शैलपुत्री

पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में उत्पन्न होने से देवी जगदमबा शैलपुत्री कहलायीं। दृढ़ संकल्प शक्ति से युक्त शैलपुत्री की अराधना करने से इच्छाशक्ति में दृढ़ता का आविर्भाव होता है ओर वाणी अपने लक्ष्य को निश्चित रूप से प्राप्त करता है किन्तु इच्छा शक्ति की दृढ़ता में अहंकार का मिश्रण कदापि न हो।

ब्रह्मचारिणी

ब्रह्मा जी के तेज से उत्पन्न होने के कारण ब्रह्मचारिणी नाम से विख्यात हुई। माता ब्रह्मचारिणी की उपासना ब्रह्म मंत्र द्वारा करने से अत्यन्त प्रसन्न होती हैं और अपनी कृपा दृष्टि से उसका भली प्रकार से कल्याण करती हैं। सदैव रुद्राक्षधारण करने वाली ब्रह्मचारिणी माता को बारम्बार नमस्कार है।

चन्द्रघण्टा

चन्द्रमा के समान शीतल ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाली जग वन्दनीय माता चन्द्रघण्टा अपने भक्तों के प्रति सदैव विनयशील रहती हैं। भक्तों को सदैव पुत्र की दृष्टि से निहारने वाली माता चन्द्रघण्टा के चरणों की वन्दना करने से आत्मा को शान्ति प्राप्त होती है। क्रोध का नाश होता है और ज्ञान के प्रकाश की अमर ज्योति के स्फुटित होने से ह्दय का अंधकार दूर होता है। जो भी प्राणी सच्चे मन से माता के चरणों का ध्यान करता है उसे अनेकों प्रकार की कठिनाईयों से मुक्ति मिलती है। काच्चीपुरम (कर्नाटक) में स्थित माता चन्द्रघण्टा के मंदिर में जो भी मनुष्य अपनी मुरादें लेकर जाता है। मैया उसकी मुरादों को पूर्ण कर सुख समृद्घि प्रदान करती हैं।

कुष्माण्डा

त्रिविध तापों के निवारण हेतु माता कुष्माण्डा जी की पूजा अर्चना की जाती है। वैदिक, दैविक और भौतिक यह तीनों ताप (दु:ख) प्राणी की विवेकशीलता को नष्ट करने के साथ अत्यंत दु:खी करते हैं। जो मनुष्य पूर्ण श्रद्धा एवम भक्ति से माता केचरणों का ध्यान करते हुए विधि विधान से पूजन एवम जाप करता है उसे परम सुख एवम शान्ति प्रदान होती है और इस लोक में यश प्राप्त करके परलोक में स्वर्ग का अधिकारी होता है। कुष्माण्डा देवी का बसेरा भीमा पर्वत पर है।

स्कन्दमाता

महामूर्ख, विवेकहीन, समाज से तिरस्कृत मनुष्यों को स्कन्दमाता सदैव अपने चरणों में स्थान देती हैं। मैया के चरणों में जो भी प्राणी एक बार भक्तिपूर्वक अपना मस्तक रख दे उसे दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। स्कन्दमाता की कृपादृष्टि हो जाने से महा मूढ़ कालीदास महाज्ञानी कालिदास कहलाये और कुमार सम्भव, मेघदूतम, अभिज्ञान शाकुन्तलम और रघुवंश महाकाव्य की रचना करके विशिष्ट यश मान प्राप्त किये।

कत्यायिनी देवी

कत्यायिनी देवी देवी की कृपा से जब तक प्राप्त नहीं होती तब तक शिक्षण कार्य कदापि सम्पादित (पूर्ण) नहीं हो सकता। शोधकार्य इनका प्रमुख गुण है जिसका आज के वैज्ञानिक युग में अत्याधिक महत्व है। माता कत्यायिनी देवीदेवी वैद्यनाथ नामक स्थान पर प्रकट होकर सारे संसार में अपनी कृपा रूपी प्रसाद से प्राणियों की मनोकामनाएं पूर्ण कर रही हैं। जो प्राणी सच्चे ह्दय से माता की उपासना करता है उसके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है। सत्य तो यह है कि माता कभी अपने पुत्रों का त्याग नहींकरती बल्कि पुत्र ही उनके दूर हो जाते हैं। जो उनके निकट आकर मैया के चरणों से प्रेम करता है, मां उसे अपने चरणों से उठाकर स्नेहवश ह्दय से लगाकर अपनी ममतामयी दृष्टि डालकर निहाल कर देती है।

कालरात्रि

संसार के अन्धकार को नष्ट करके ज्ञान रूप ज्योति का अविर्भाव करती हैं। जब प्राणी के मन का अंधकार नष्ट हो जाता है तो स्वत: ही उसके मन में माता के प्रति प्रेम उत्पन्न हो जाता है। ज्ञान के प्रकाश फैलने से अज्ञान रूपी तम दूर भाग जाता हैजो माता कालरात्रि की देवी की कृपा के बिना कदापि संभव नहीं है तथा जो माता की उपासना सच्चे मन से करता है उसे काल का भय नहीं होता। भय विनाशिनी, शत्रु विमोचनी मैया का सिद्धपीठ कलकत्ता में है जहां प्रतिदिन दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु जाकर मैया केचरणों में शीश नवाते हैं उनकी मुरादें पूर्ण होती हैं।

महागौरी

नारी शक्ति के रूप में पूज्यनीय महागौरी के रूप में आठवीं मूर्ति के रूप में स्थापित है। भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए पर्णकुटी में रहकर कठिन तपस्या की और भगवान शिव को प्राप्त की। महागौरी का सिद्घपीठ स्थान हरिद्वार के निकट कनखल नामक स्थान पर है जहां सदैव भक्तों की भीड़ लगी रहती है। शिव अर्धागिनी महागौरी का स्वरूप गौर वर्ण है। नेत्रों से पुत्रों (सांसरिक प्राणियों के लिए) के लिए सदैव अमृत रूपी प्रेम बरसता है। जो प्राणी उस प्रेम को प्राप्त करने के लिए दरबार तकपहुंचता है और मैया के चरणों का ध्यान करता है उसे भौतिक सुखों की प्राप्ति तो होती ही है परलोक में भी वह उत्तम स्थान प्राप्त करता है।

सिद्धिदात्री

समस्त सिद्धियों को प्रदान करने में माता दुर्गा की नवी मूर्ति सिद्धिदात्री के रूप में जग प्रसिद्ध हैं। हिमाचल नंदापर्वत पर माता सिद्धिदात्री देवी विराजमान हैं। उनकी कृपा से संसार की समस्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं।

देवी के उपरोक्त वर्णित नव रूपों को नवदुर्गा कहते हैं, जिनकी विधि पूर्वक अराधना-उपासना करने से प्राणियों का कल्याण होता है और सभी अभिलाषाएं पूर्ण होती हैं।

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