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Shankaracharya Jayanti 2021: आज आदि गुरु शंकराचार्य के जन्मदिवस पर जानें उनके जन्म और मठों की कथा

  • वैशाख माह के शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि को आदि गुरु शंकराचार्य की जयंती (Aadi Guru Shankaracharya Jayanti) मनायी जाती है।
  • आदि गुरु शंकराचार्य का जन्म नंबूदरी ब्राह्राण परिवार में हुआ था।
  • आदि गुरु शंकराचार्य बाल्यकाल से ही बहुत प्रतिभाशाली थे।

Shankaracharya Jayanti 2021: आज आदि गुरु शंकराचार्य के जन्मदिवस पर जानें उनके जन्म और मठों की कथा
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Shankaracharya Jayanti) मनायी जाती है। ऐसी मान्यता है कि वैशाख शुक्ल पंचमी के दिन भगवान शिव (Lord Shiva) के अवतार आदि शंकराचार्य का जन्म हुआ था। आदि शंकराचार्य का जन्म लगभग 1200 वर्ष पूर्व कोचीन (Cochin)के पास कालटी नामक गांव में नंबूदरी ब्राह्राण परिवार में हुआ था। ऐसी मान्यता है कि, इसी ब्राह्मण कुल के ब्राह्मण बद्रीनाथ मंदिर (Badrinath Temple) में रावल होते हैं और ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य की गद्दी पर नम्बूदरी ब्राह्मण ही बैठते हैं। आदि गुरु शंकराचार्य बाल्यकाल से ही बहुत प्रतिभाशाली थे। उनके जन्म के कुछ साल बाद ही उनके पिता परलोकगामी हो गए। ऐसी मान्यता है कि आदि गुरु शंकराचार्य ने कम आयु में वेदों को कंठस्थ कर लिया था। तो आइए जानते हैं आदि गुरु शंकराचार्य के जन्म से जुड़ी कथा के बारे में।

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आदि गुरु शंकराचार्य के जन्म की कथा

आदि गुरु शंकराचार्य भगवान शिव के साक्षात अवतार थे और ये ब्राह्मण परिवार में जन्में थे। आदि गुरु शंकराचार्य को सांसारिक जीवन से कोई मोह नहीं था और उन्हें गीता, भागवत, वेद, शास्त्रों का स्वत: ही ज्ञान था। आदि गुरु शंकराचार्य ने अपने ज्ञान को पूरी दुनिया में फैलाया।

ऐसी मान्यता है कि उनके माता-पिता जोकि एक ब्राह्राण थे, उनके विवाह के पश्चात कई सालों बाद भी कोई संतान नहीं हुई। संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने भगवान शंकर की आराधना की। उनकी कठिन तपस्या से खुश होकर भगवान शंकर ने सपने में उनको दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। इसके बाद ब्राह्राण दंपति ने भगवान शंकर से ऐसी संतान की कामना की जो दीर्घायु भी हो और उसकी प्रसिद्धि दूर दूर तक फैले। तब भगवान शिव ने कहा कि या तो तुम्हारी संतान दीर्घायु हो सकती है या फिर सर्वज्ञ। जो दीर्घायु होगा वो सर्वज्ञ नहीं होगा और अगर सर्वज्ञ संतान चाहते हो तो वह दीर्घायु नहीं होगी।

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तब ब्राह्राण दंपति ने वरदान के रूप में दीर्घायु की बजाय सर्वज्ञ संतान की कामना की। वरदान देने के बाद भगवान शिव ने ब्राह्राण दंपति के यहां संतान रूप में जन्म लिया। वरदान के कारण ब्राह्राण दंपति ने पुत्र का नाम शंकर रखा। शंकराचार्य बचपन से प्रतिभा सम्पन्न बालक थे। जब वह मात्र तीन साल के थे तब उनके पिता का देहांत हो गया। तीन साल की उम्र में ही उन्हें मलयालम भाषा का ज्ञान प्राप्त कर लिया था।

आदि गुरु शंकराचार्य ने की इन मठों की स्थापना

वेदान्त मठ

वेदांत मठ को वेदान्त ज्ञानमठ भी कहा जाता है जोकि, सबसे पहला मठ था और इसे , श्रंगेरी रामेश्वर अर्थात् दक्षिण भारत मे, स्थापित किया गया।

गोवर्धन मठ

गोवर्धन मठ जोकि, दूसरा मठ था जिसे जगन्नाथपुरी अर्थात् पूर्वी भारत मे, स्थापित किया गया।

शारदा मठ

इस मठ को शारदा या कलिका मठ भी कहा जाता है जोकि, तीसरा मठ था जिसे, द्वारकाधीश अर्थात् पश्चिम भारत मे, स्थापित किया गया।

ज्योतिपीठ मठ

ज्योतिपीठ मठ जिसे बदरिकाश्रम भी कहा जाता है जोकि, चौथा और अंतिम मठ था जिसे, बद्रीनाथ अर्थात् उत्तर भारत मे, स्थापित किया गया।

ऐसे हुआ वेदों का ज्ञान

आदि गुरु शंकराचार्य को अल्पायु में ही वेदों का पूरा ज्ञान था और 12 वर्ष की उम्र में उन्होंने सभी शास्त्रों का अध्ययन कर लिया था। 16 वर्ष की उम्र में वह 100 से भी अधिक ग्रंथों की रचना कर चुके थे। बाद में माता की आज्ञा से वैराग्य धारण कर लिया था। मात्र 32 साल की उम्र में केदारनाथ में उन्होंने समाधि ले ली। आदि शंकराचार्य ने हिन्दू धर्म का प्रचार-प्रसार के लिए देश के चारों कोनों में मठों की स्थापना की थी जिसे आज शंकराचार्य पीठ कहा जाता है।

(Disclaimer: इस स्टोरी में दी गई सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं। Haribhoomi.com इनकी पुष्टि नहीं करता है। इन तथ्यों को अमल में लाने से पहले संबधित विशेषज्ञ से संपर्क करें)

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