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गायत्री की महिमा आप भी जानें

सनातन हिन्दूधर्मशास्त्रों में गायत्री की महिमा ऋषियों-महर्षियों ने अपने-अपने हिसाब से बताई है। गायत्री मनुष्य को संसार रूपी सागर से तारने के लिए मंत्र रुपी नौका है। जो व्यक्ति को अनायास ही इस दुख रूपी संसार सागर से पार ले जाती है। तो आइए जानते हैं कि हमारे ऋषि-मुनियों ने गायत्री के महिमा किस प्रकार बताई है।

गायत्री की महिमा आप भी जानें
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सनातन हिन्दूधर्मशास्त्रों में गायत्री की महिमा ऋषियों-महर्षियों ने अपने-अपने हिसाब से बताई है। गायत्री मनुष्य को संसार रूपी सागर से तारने के लिए मंत्र रुपी नौका है। जो व्यक्ति को अनायास ही इस दुख रूपी संसार सागर से पार ले जाती है। तो आइए जानते हैं कि हमारे ऋषि-मुनियों ने गायत्री के महिमा किस प्रकार बताई है।

भगवान मनु महाराज ने मनुस्मृति में कहा है जो मनुष्य नियमित रुप से लगातार तीन वर्ष तक निरंतर गायत्री जप करता है, वह मनुष्य ईश्वर को प्राप्त करता है।

वहीं अत्री मुनि ने कहा है कि गायत्री आत्मा का परम शोधन करने वाली है। गायत्री के प्रताप से कठिन दोष और दुर्गुणों क परिमार्जन हो जाता है।

पारासर ऋषि के अनुसार भक्तिपूर्वक गायत्री का जप करने वाला मनुष्य मुक्त होकर पवित्र बन जाता है।

ऋषि दयानंद ने कहा है कि जो जिज्ञासु गायत्री मंत्र का प्रेम और नियमपूर्वक उच्चारण करते हैं, उनके लिए गायत्री संसार सागर से तरने की नाव और आत्म प्राप्ति की सड़क है।

महर्षि विश्वामित्र ने कहा था कि गायत्री के समान चारों वेदों में कोई मंत्र नहीं है।

शौनक ऋषि ने गायत्री की व्याख्या करते हुए कहा था कि अन्य कोई उपासना करें अथवा ना करें, केवल गायत्री के जप से ही द्विज जीवन मुक्त हो जाता है।

नारद जी ने गायत्री के विषय में कहा है कि गायत्री भक्ति का ही स्वरूप है। जहां भक्ति रूपी गायत्री है वहां श्रीनारायण का निवास होने में कोई संदेह नहीं है। जगद्गुरु शंकराचार्य ने कहा कि गायत्री आदि मंत्र है। गायत्री का अवतार दुरितों को नष्ट करने और ऋत के अभिवर्धन के लिए हुआ है।

भरद्वाज ऋषि के अनुसार अनुचित काम करने वालों के दुर्गुण गायत्री के कारण छूट जाते हैं।

शंख ऋषि ने कहा है कि नरक रूपी समुद्र में गिरते हुए को हाथ पकड़कर बचाने वाली गायत्री ही है।

चरक ऋषि ने कहा है कि जो व्यक्ति ब्रह्मचर्य पूर्वक गायत्री की उपासना करता है और आँवले के ताजे फलों का सेवन करता है वह व्यक्ति दीर्घजीवी होता है।

महर्षि व्यास के अनुसार गंगा शरीर के पापों को निर्मल करती है और गायत्री रूपी ब्रह्म गंगा से आत्मा पवित्र होती है।

वशिष्ठ ऋषि का कहना था कि मंदमति, कुमार्गगामी और अस्थिर मति भी गायत्री के प्रभाव से उच्च पद को प्राप्त करते हैं। फिर सदगति होना निश्चित है।

योगीराज याज्ञवल्क्य का कहना है कि गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं, केशव से श्रेष्ठ कोई देव नहीं और गायत्री से श्रेष्ठ मंत्र ना हुआ, न ही आगे होगा।

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