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Dussehra 2020 Date October : जानिए क्यों अपराजिता पूजन के बिना अधूरा माना जाता है दशहरे का त्योहार

Dussehra 2020 Date October : दशहरे का त्योहार 25 अक्टूबर 2020 (Dussehra Festival 25 October 2020) को मनाया जाएगा। इस दिन रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण को पुतले फेंके जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस दिन अपराजिता पूजन (Aprajita Pujan) को विशेष महत्व दिया जाता है और अपराजिता पूजन के बिना दशहरे का त्योहार भी अधूरा माना जाता है।

Dussehra 2020 Date October : जानिए क्यों अपराजिता पूजन के बिना अधूरा माना जाता है दशहरे का त्योहार
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Dussehra 2020 Date October : जानिए क्यों अपराजिता पूजन के बिना अधूरा माना जाता है दशहरे का त्योहार

Dussehra 2020 Date October : दशहरे (Dussehra) के दिन भगवान राम (Lord Rama) ने अहंकारी रावण का वध किया था और धरती को पाप मुक्त किया था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान राम ने भी रावण से युद्ध करने से पहले अपराजिता पूजन किया था। जिसकी वजह से ही उन्हें विजय प्राप्त हुई थी तो चलिए जानते हैं क्या है अपराजिता पूजन। जिसके बिना अधूरा माना जाता है विजयदशमी का त्योहार

जानिए क्या है अपराजिता पूजन (Kya Hai Aprajita Pujan)

दशहरे का त्योहार उत्तर भारत में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। शारदीय नवरात्रि संपन्न होने के उपरांत यह पर्व मनाया जाता है। शास्त्रों में दशहरे का असली नाम विजयदशमी बताया गया है। जिसे अपराजिता पूजा भी कहते हैं। अपराजिता देवी सकल सिद्धियों की प्रदात्री साश्रात माता दुर्गा का ही अवतार हैं। भगवान श्री राम ने माता अपराजिता का पूजन करके ही रावण से युद्ध करने के लिए विजयदशमी को प्रस्थान किया था।

महार्षि वेद व्यास जी ने माता अपराजिता को आदि काल की श्रेष्ठ फल देने वाली देवताओं द्वारा पूजित देवी बताया है। मान्यता है कि अपराजिता पूजा करने से कभी भी असफलता का सामना नहीं करना पड़ता। हमेशा जीत हासिल होती है। विजयदशमी के दिन अपराजिता पूजन का विशेष महत्व है। क्योंकि आश्विन शुक्ल पक्ष दशमी तिथि में शाम को तारा उदय होने के समय को विजया काल माना गया है।

इसी कारण से इस तिथि को विजयादशमी कहते हैं।मान्यता है कि इस समय पर किया गया कोई भी कार्य सफल होता है। ज्योषियों के अनुसार इस दिन अपराजिता स्रोत का पाठ करना बहुत शुभ माना जाता है। अपराजिता के नीले फूल से अपराजिता पूजन करने से अपराजित रहने का वरदान प्राप्त होता है। अपराजिता पूजन के बाद कलाई पर अपराजिता की लता बांधी जाती है। अपराजिता पूजन के बाद मां अपने बच्चों की कलाई पर अपराजिता की बेल बांधती है और उनके सदैव विजय रहने की कामना करती हैं।

ज्योतिषियों के अनुसार माता अपराजिता की पूजा का समय दोपहर के तत्काल बाद का होता है। दोपहर से संध्या काल के बीच में कभी भी माता अपराजिता की पूजा कर यात्रा भी प्रारंभ की जा सकती है। यात्रा पर जाते समय माता अपराजिता की स्तुति अवश्य करनी चाहिए। जिससे यात्रा में कोई भी विघ्न न हो।

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