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नई ऊर्जा, ताकत और आस्था का केंद्र है राजगीर

sameer choudhary | UPDATED Aug 28 2016 3:47PM IST
नई दिल्ली. बिहार के नालंदा जिले में स्थित राजगीर अपनी धार्मिक आस्थाओं के साथ भौगोलिक स्थिति के कारण शक्ति का रहस्यमयी केंद्र भी माना जाता है। यह जैन और बौद्ध धर्म के अनुयायियों का प्रमुख तीर्थस्थल के रूप में विख्यात है। यहां की खासियतों के बारे में बता रहे हैं लेखक।
 
राजगीर का पुराना शहर हरी घाटी पर फैला हुआ है और उसे असंख्य पेड़ों भरी पहाड़ियां घेरे हुए हैं। इस सुंदर नजारे से भी महत्वपूर्ण शांति का वह अजीब अहसास था, जो आपको एक अलग ही दुनिया में ले जाता है और ऐसा प्रतीत होता है, जैसे आपमें एक नई ऊर्जा और ताकत आ गई है। मैक्सिको में रहस्यवादी ऐसी जगहों को ‘पॉवर स्पॉट्स’ कहते हैं। जो इन कहानियों में यकीन करते हैं, उनका कहना है कि संभवत: यहां पर चुंबकीय, विद्युतीय या फिर दैविक शक्ति है, जो हमारे शरीर के बायो-इलेक्ट्रिक नेटवर्क से मिलकर हममें अच्छे और स्वस्थ होने का अहसास कराती है। इस किस्म की आस्था दुनियाभर में लगभग सभी लोगों में मौजूद है, इसलिए इसे यूं ही नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
 
इस प्रकार के टेल्यूरिक बलों पर प्रतिक्रिया के विज्ञान को चीनी लोग फेंगशुई कहते हैं। भारत में हम इसे वास्तु कहते हैं। इसमें कितनी सच्चाई है या नहीं लेकिन इतना कहा जा सकता है कि इस प्रकार की जगह हर किस्म के धार्मिक आस्थाओं वाले लोगों को आकर्षित करती है और इसलिए यहां पर अलग अलग प्रकार के धर्मस्थल मौजूद होते हैं। राजगीर में भी यही है। पहाड़ियों से घिरे हुए मैदान में ऐसा प्रतीत होता है, जैसे एक गैरजरूरी गोलाकार संरचना नींव पर उभर आई है। इसे पत्थर की छत से ढंक दिया गया है। सीढ़ियां चढ़कर जब मैं ऊपर गया, यह देखने के लिए कि वह क्या है, जो एक कुआं सा प्रतीत हो रहा था। यद्यपि एक तख्ती लग हुई थी कि यह सुरक्षित स्मारक है, लेकिन अंदर कुछ नहीं था। एक स्थानीय किसान ने मुझे बताया, ‘हर कोई कहता है कि यह एक प्राचीन सर्प मंदिर है, वह जगह जहां वेदों से पहले शक्तिशाली नाग देवताओं की पूजा की जाती थी।’

ऐतिहासिक महत्ता
भारतीय धार्मिक परंपरा की जड़ें अधिक गहरी और विस्तृत हैं, उनसे भी ज्यादा जो आर्यों से जोड़ी जाती हैं। बाल गंगाधर तिलक के अनुसार आर्य भारत में बाहर से आए थे। उनके आगमन से पहले, जैनों के अनुसार, उनका धर्म हमारे देश में पहले से ही स्थापित हो चुका था। उनका मानना है कि महान तीर्थंकर महावीर 24 तीर्थकरों में से आखिरी थे, न कि पहले जैसा कि अकसर माना जाता है। इस ऐतिहासिक शहर से संबंध होने के कारण राजगीर आज भी जैन धर्मावलंबियों के लिए प्रमुख तीर्थस्थल है और उनके मंदिर पांचों पहाड़ियों पर मौजूद हैं। भारत की प्राचीन सर्वग्राही धार्मिक परंपरा अपने अंदर अन्य आस्थाओं को न सिर्फ समा लेती है बल्कि उन्हें अपना हिस्सा बना लेती है। 
 
मौजूद हैं कई कुंड
राजगीर के ब्रह्मकुंड में हमने देखा कि लोग गर्म चश्मे में स्नान कर रहे थे, जोकि पृथ्वी के अंदर की गहराई से निकल रहा है। राजगीर में जो भी गर्म चश्मा है, उसके साथ दैविकता और उपचार करने की क्षमता की कहानियां जुड़ी हुई हैं। इनमें मुख्य गर्म चश्मा धर्मकुंड है, जिसके बारे में कहा जाता है कि गठिया बाए और जोड़ों का दर्द इसमें स्नान करने से समाप्त हो जाता है। सूर्यकुंड में स्नान करने से त्वचा की बीमारियों का उपचार होता है। पास की विपुला पहाड़ी पर एक अन्य गर्म चश्मा है, जिसे मखदूमकुंड कहते हैं। यह एक मुस्लिम सूफी के नाम पर है, मखदूम साहब, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने 13वीं शताब्दी में राजगीर के जंगलों में 12 वर्ष गुजारे। 
 
धार्मिक मान्यताओं का संगम
ब्रह्मकुंड के पास ही विष्णु, लक्ष्मी और संतोषी देवी के मंदिर भी हैं। एक काली मंदिर भी है। दिलचस्प बात यह है कि हिंदू मंदिरों का यह कॉम्प्लेक्स एक मस्जिद की दीवार से जुड़ा हुआ है। सभी धर्मों को स्वीकार करना भारतीय धार्मिक परंपरा का अटूट और आवश्यक हिस्सा है। भक्ति आंदोलन ने ही इस्लाम में सूफीज्म या तसव्वुफ के लिए मार्ग प्रशस्त किया। भक्ति आंदोलन ने ही नए युग में ईसाईयों में आध्यात्म की नींव रखी। लेकिन आस्था को तारीफ से नहीं बांध जा सकता।
 
लोगों को आध्यात्मिक अनुभव सभी युगों में हुए हैं और कभी-कभी उन्हें बहुत सी यातनाओं का सामना भी करना पड़ा है, अगर उनके अनुभव स्वीकृत आस्थाओं के अनुरूप न थे। जब ऐसे लोगों के आध्यात्मिक अनुभव से बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हो जाते हैं तो फिर इतिहास उन्हें याद रखता है। इतिहासकार मानते हैं कि महावीर और गौतमबुद्ध समकालीन थे। तथ्य यह है कि एक आम आदमी तीर्थंकरों और बुद्ध की प्रतिमाओं में, उनकी अहिंसा दर्शन में अंतर ही नहीं कर पाता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इन दोनों ही महान धार्मिक शख्सियतों ने अपनी महत्वपूर्ण शिक्षाएं राजगीर में ही दी थीं। 
 
अद्भुत शांति स्तूप
रत्नागिरी पहाड़ी की जड़ में मैं चेयर-लिफ्ट में बैठा और चोटी पर पहुंच गया। यहां पर जापानी बौद्ध लोगों ने एक बहुत ही खूबसूरत विश्व शांति स्तूप का निर्माण कराया है, जिसमें बुद्ध की चार सुनहरी प्रतिमाएं हैं। राजगीर में लंबे प्रवास के दौरान बुद्ध ने इसी चोटी की गुफा में ध्यान लगाया था। विशाल सफेद स्तूप शांति का एहसास कराता है और इससे राजगीर की घाटी की खूबसूरती में चार चांद लग जाते हैं। एक भिक्षु पाम के बने पंखे से अपने आपको ठंडक पहुंचाते हुए बोला, ‘यह बुद्ध की शांति से भरी हुई जगह है, क्या आपको ऐसा नहीं लगता?’ उसकी बातें सुनकर मेरे होंठों पर मुस्कान आ गई। बहरहाल, सूफी संत और अन्य धार्मिक किस्म के लोग राजगीर जैसी ही विशिष्ट जगहों की ही तलाश करते हैं। यह संभव है कि गौतम बुद्ध को राजगीर की आंतरिक शांति का अहसास हुआ हो और वह इस प्राकृतिक शक्ति स्थल पर इसी वजह से आए हों। 
 
कुल मिलाकर तथ्य यह है कि बिहार में राजगीर एक ऐसी जगह है, जो सभी धर्मों को एक साथ जोड़ती है और यह संदेश देती है कि सब लोग भाईचारे के साथ आपस में मिल-जुलकर रह सकते हैं। राजगीर वास्तव में आध्यात्मक बुलंदियों को स्पर्श करने की एक बहुत ही शानदार जगह है। आप चाहे जिस भी धर्म के हों आपको राजगीर में निश्चित तौर पर शांति का अहसास और दैविकता से जुड़ने का अवसर मिलेगा।
 
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