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हिंदी को गर्व से अपनाएं

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Apr 20 2017 5:28AM IST
हिंदी को गर्व से अपनाएं

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अाधिकारिक भाषाओं को लेकर बनी समिति की उस सिफारिश को स्वीकार कर लिया है जिसमें कहा गया है कि अगर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री समेत मंत्री और अधिकारी हिंदी बोल और पढ़ सकते हैं तो उन्हें हिंदी में ही भाषण देना चाहिए।

इस समिति ने हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिए राज्यों और केंद्र से विचार-विमर्श के बाद छह साल पहले 117 सिफारिशें की थी। खबर है कि इन सभी सिफारिशों पर अब अमल शुरू हो जाएगा। दुर्भाग्य की बात है कि इन सिफारिशों को लागू करने में 6 वर्ष का समय लग गया। 

हिंदी राष्ट्र भाषा है और करीब सभी भारतवासी टूटी फूटी ही सही हिंदी बोल और समझ लेते हैं। कुछ वर्ष पहले तक दक्षिण भारत में हिंदी का तगड़ा विरोध हो रहा था, परंतु अब तो उन राज्यों मे ंभी लोग हिंदी का स्वागत करने लगे हैं।

हिंदी को लोकप्रिय बनाने में हिंदी सिनेमा और टीवी चैनलों का बहुत बड़ा योगदान है। दुर्भाग्य की बात यह है कि अंग्रेजी बोलने वाले अफसर अपने उन सहयोगियों को हीन दृष्टि से देखते हैं जो हिंदी में बात करते रहते हैं। 

इन नौकरशाहों के मन में यह भावना कूट कूटकर भरी हुई है कि आईएएस, आईएफएस या आईपीएस बन जाने के बाद उनका सरोकार मातृभाषा से एकदम नहीं है औरों पर अपना रुतबा जमाने के लिए वे अंग्रेजी में ही बोलते हैं और फाइलों पर टिप्पणी भी अंग्रेजी में ही करते हैं।

इस संदर्भ में कुछ दिलचस्प घटनाओं का जिक्र करना जरूरी है। वर्षों पहले जब मैं आठवीं लोकसभा का सदस्य था तो ममता बनर्जी, सुनील दत्त और मैं लोकसभा में एक ही बंेच पर बैठते थे। ममता बनर्जी हिंदी में बोलना चाहती थी, परंतु उन्हें डर होता था कि टूटी फूटी हिंदी बोलने पर लोग उनका मजाक उड़ाएंगे। 

मैंने उनसे कहा था कि आप कलकत्ता में कालीघाट में रहती हैं, जहां बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग भरे हुए हैं। उन लोगों से बातचीत भी तो टूटी फूटी हिंदी में ही करती होंगी, इसलिए यदि हिम्मत कर आप लोकसभा में टूटी फूटी हिंदी में ही भाषण दें तो मैंने संसद सदस्यों का एक ग्रुप तैयार कर लिया है जो आपके भाषण पर तालियां बजाएगा।

मेरे आग्रह पर ममता बनर्जी ने टूटी फूटी हिंदी में भाषण दिया जिसका लोकसभा के सभी सदस्यों ने ताली बजाकर स्वागत किया। दिल्ली से निकलने वाले हिंदी अखबारोंं ने उन्हें ‘हिंदी की बिंदी' कहा और उनके भाषण का स्वागत किया। इससे उत्साहित होकर ममता बनर्जी तब से आज तक हिंदी में ही भाषण देती हैं। हम लोगों की सीट के पीछे अमिताभ बच्चन बैठते थे।

वे लोकसभा में हिंदी मे सशक्त भाषण देते थे और हर भाषण में अपने पिता हरिवंशराय बच्चन की कविताओं को उद्वृत करते थे जिसका स्वागत सभी सदस्य करते थे। हमारी ही सीट पर सुनील दत्त बैठते थे। पहली बार जब उन्होंने मेरठ के दंगों के बारे में भाषण शुरू किया तो वे अंग्रेजी में बोलने लगे। मैंने धीरे से उनके कान में कहा कि वे हिंदी में बोलें जिसका लोग भरपूर स्वागत करेंगे। 

मेरे आग्रह पर उन्होंने हिंदी में भाषण दिया जिसका पूरे सदन ने करतल स्वर से स्वागत किया और देश के सभी समाचारपत्रों ने उनके भाषण को मुखपृष्ठ पर प्रकाशित किया। उसके बाद सुनील दत्त जब भी भाषण देने के लिए खड़े होते थे, वे हिंदी में ही भाषण देते थे। उन दिनों लोकसभा में एक अत्यन्त ही लोकप्रिय फिल्मी नायिका थी ‘वैजन्ती माला' । पहली बार जब वह भाषण देने के लिए खड़ी हुई तो अग्रंेजी में बोलना शुरू किया।

उन दिनों मुंगेर के एक प्रखर सांसद स्वर्गीय डीपी यादव ने खड़े होकर कहा मैडम, आप तो सभी फिल्मों में गाने हिंदी में ही गाती हैं फिर यहां अंग्रेजी में भाषण क्यों देती हैं।इस पर वैजन्ती माला ने कहा कि वह तो प्लेबैक सॉन्ग होता हैे। मैं तो केवल होठ हिलाती हूं। डीपी यादव ने फिर खड़े होकर कहा कि फिल्मों में डायलाग तो आप हिंदी में ही बोलती हैं, देवदास फिल्म में आपके सारे डायलाग हिंदी में ही थे।

इस पर वैजन्ती झेंप गई और अपना भाषण हिंदी में शुरू कर दिया। वैजन्ती माला लोकसभा में हर विषय पर बढ़ चढ़कर हिंदी में भाषण देती थी और लोग बड़े चाव से उनका भाषण सुनते थे। उनका हर भाषण हिंदी में ही होता था। 

1992 में जब स्वर्गीय नरसिंह राव और स्वर्गीय शंकर दयाल शर्मा ने ‘लुक ईस्ट' विदेश नीति के तहत मुझे कुछ दक्षिण एशियाई देशों में भारत का राजदूत नियुक्त किया था तो मुझे यह देखकर घोर आश्चर्य होता था कि हर दूतावास में भारतीय कर्मचारी आपस में अंग्रेजी में ही बोलते थे।

इनमें से अधिकतर कर्मचारी उत्तर भारत के थे। मैंने उन्हें समझाया कि जब आप विदेशियों से बात करें तो बेशक अंग्रेजी में करें, परंतु आपस में बातचीत तो हिंदी में ही होनी चाहिए। जब एक दूसरे के घर पर पार्टियां हों तो उसमें परिवार के सदस्यों से भी यह अनुरोध कर दें कि वे आपस में हिंदी में ही बात करें। 

संयोग से मेरी बात का असर हुआ और जिस जिस देश के राजदूतावास में मैं गया मैंने प्रयास किया कि वहां हिंदी का बोलबाला हो। यही नहीं, हर दूतावास में प्रति सप्ताह डिप्लोमेटिक बैग से भारत के गिने चुने अखबार आते हैं। मैंने विदेश मंत्रालय से आग्रह कर हिंदी के समाचारपत्रों को भी मंगाना शुरू कर दिया। अपने अनुभव से मैंने पाया कि प्रतिवर्ष ढेर सारी हिंदी की पुस्तकें दूतावासों को भेजी जाती हैं।

दूतावास का अधिकतर स्टाफ उन पुस्तकों के प्रति उदासीन रहते हैं। मैंने स्टाफ से आग्रह किया कि वे स्वयं भी इन पुस्तकों को पढ़ें और अपने परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करें। मैंने यह भी आदेश दिया कि इन सभी देशों में भारतीय मूल के हजारों लोग रह रहे हैं। 

इन पुस्तकों को उदारतापूर्वक इन लोगों में वितरित किया जो इन्हें पढ़कर वापस कर देंगे। इससे अनायास ही हिंदी की सेवा होगी। मुझे एक और घटना की याद अनायास ही आ रही है। मेरे एक मित्र जो अमेरिका में बस गये थे, एक बार अपने बच्चों के साथ भारत आए थे। वे अपने बच्चों को भारत के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल खासकर हरिद्वार और इलाहाबाद दिखाना चाहते थे।

उनके दो बच्चे बीच में ही ट्रेन से अचानक उतर गये। उस समय पति-पत्नी कंपार्टमेंट में सोए थे। गाड़ी चल पड़ी और वे अनजान स्टेशन पर अजनबी बन कर रहे गए। वे न तो हिंदी बोल सकते थ्ो और न समझ सकते थे। 

प्रायः एक महीने के कठिन परिश्रम से और विभिन्न राज्य सरकारांे की पुलिस के सहयोग से इन बच्चों को खोजा गया। उसके बाद मेरे मित्र ने इस कटु सत्य को समझ लिया कि यदि भारत बच्चों को लाना है तो उसके पहले घर में ही हिंदी में बोलचाल आवश्यक है। यह संतोष का विषय है कि आज भारत के सभी राज्यों में हिंदी के समाचारपत्र प्रकाशित होते हैं।

गांव देहात में छोटे-छोटे गावों में ये अखबार हर सुबह आसानी से मिल जाते हैं। हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिए आवश्यकता इस बात की है कि क्लिष्ट हिंदी को छोड़कर उसकी जगह बोलचाल की हिंदी का चलन हो। कुल मिलाकर यह तो मानना ही होगा कि हिंदी और हिंदी भाषा-भाषियों का भविष्य उज्ज्वल है।

 
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-Tags:#President Pranab Mukherjee#Mamta Banerjee#Lok Sabha#Vaijanti Mala
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