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मंगलवार, मई 30, 2017  
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पड़ोसियों की पोल खोलता एक व्यंग्य 'आज बहोत ठंड है'

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पड़ोसी ‘सी-सी’ करते, हाथ बगल में दाबे आए। मैं रजाई में दुबका था। उनके मुंह से मुश्किल से चार शब्द निकले, ‘यार बड़ी ठंड है।’ कहकर उन्होंने जिस अंदाज में मेरी रजाई पर दृष्टिपात किया, रजाई सहम गई, मैं कांप गया, कहीं वे मेरी रजाई ही न उतार ले भागें। मैंने भीतर से कसकर पकड़ ली।
 
सी सी सी...आज बहोत ठंड है! कहते हुए उसने ठेले से चार मूंगफली उठाई और मूंगफली फोड़कर ठंड से मुकाबला करने लगा। वह अभी ठंड से निपटा भी नहीं था कि चौराहे पर ड्यूटी कर रहा पुलिस वाला आ धमका, 'आज बड़ी कातिल ठंड है', बोलकर उसने एक मुट्ठी मूंगफली उठाकर जेब में डाल ली। वह शायद ठंड से भिड़ंत करने के मूड में था। ठेले वाले को भी लगा, वाकई बड़ी ठंड है। वह यह सोचकर डर गया कि ठंड ऐसे ही बढ़ती रही, तो कहीं कोई मुठभेड़ के इरादे से ना आ धमके!
ठंड में ठंड की सूचना महज सूचना नहीं होती, वॉर्निंग भी होती है, रिक्वेस्ट भी, धमकी भी और चैलेंज भी। सबकी अपनी-अपनी ठंड है और आग की तलब है। ठंड के बहाने आग उधार मांग ली। बीड़ी मांगकर बुझी आग सुलगा ली।
 
कोट मांग लिया। मूंगफली उठा ली। गजक चख ली। पकौड़ों की फरमाइश कर दी। अदरक वाली चाय का जिम्मा डाल दिया। काम न करने का ठोस बहाना मिल गया। टरकाने का ब्रह्मास्त्र चला दिया। सटकर अलाव ताप रहे लोगों के बीच जबरन घुसपैठ कर डाली। ठंड की आग गठबंधन की सत्ता की तरह होती है, घेरे में फंसकर जगह बन जाती है, हाथ बढ़ाने ले गर्माहट हासिल हो जाती है। बस-ट्रेन में दो की सीट चार लोग शेयर कर लेते हैं। रजाई तक में अतिरिक्त संभावना निकल आती है। दफ्तर में छोटे से काम के लिए भी जाओ, तो बाबू कहता है, ‘आज बड़ी गजब ठंड है, जेब से हाथ निकलें, तो काम हो।’ मतलब साफ है, वह चाय आदि का तलबगार है, उसे गर्माहट चाहिए। दो बार यही बात दोहरा दे, तो यह जेब गर्म करने का इशारा होता है।
 
आज सुबह-सुबह मुझे भी लगा, ठंड बहुत है। पड़ोसी सी-सी करते, हाथ बगल में दाबे आए। मैं रजाई में दुबका था। उनके मुंह से मुश्किल से चार शब्द निकले, ‘यार बड़ी ठंड है।’ कहकर उन्होंने जिस अंदाज में मेरी रजाई पर दृष्टिपात किया, रजाई सहम गई, मैं कांप गया, कहीं वे मेरी रजाई ही न उतार ले भागें। मैंने भीतर से कसकर पकड़ ली। फिर उनकी दृष्टिजल्द ही श्रीनगर के तापमान पर जा टिकी, वहां से होते हुए दिल्ली आ पहुंची। जल्द ही दृष्टि की सुई हैंगर पर टंगे मेरे इकलौते कोट पर टिक गई। बोले, ‘मुझे कहीं शादी में जाना है, आज आपके कोट को ठंड दूर करने का अवसर देना चाहता हूं।’ कोट ने कातर दृष्टि से मेरी ओर देखा। प्रत्युत्तर में मैंने उससे भी ज्यादा कातरता से उसे देखा। रजाई बची, तो कोट गया।
 
कुछ लोगों के लिए ठंड वरदान की तरह होती है। इसके नाम पर मनचाही करने की आजादी हासिल कर लेते हैं। ऐसे लोग ऐसे मौसम में दूसरों के यहां चाय, पकौड़े, गाजर-मूंग का हलवा, केसर कड़ाही दूध, गजक, मूंगफली का आनंद उठाने की कला खूब जानते हैं। ठंड बोलते ही सामने वाला सन्निपात में आ जाता है। इनकी ठंड दूर करने की जिम्मेदारी अब उसी की हो लेती है। जब भी कोई घर आकर कहता है, 'आज बड़ी ठंड है' तो यह अदरक वाली चाय की फरमाइश होती है। यही वाक्य दो-चार बार दोहरा दें, तो चाय के साथ पकौड़े अनिवार्य हो जाते हैं।
 
इन दिनों ठंड की खबरों के साथ ही महंगाई को पाला मार गया है, उसकी चर्चा खत्म। किसी भी विचारधारा से ठंड अब ज्यादा असहिष्णु है। हर वार्तालाप की भूमिका और उपसंहार ठंड है। फोन पर होने वाले वार्तालाप में हर दो वाक्य ‘और सुनाइए ठंड कैसी है' पुल के जरिए जुड़े रहते हैं। यह पुल हटा दो, तो बात का सिलसिला खत्म! बेसहारा वाक्य धराशायी हो जाते हैं।
 
आजकल मंत्री-नेताओं के पास काम के लिए जाओ, एप्लीकेशन दो, तो काफी देर तक खामोशी पसरी रहती है, फिर ठंड से भी ज्यादा ठंडे स्वर में कहते हैं, ‘आज बड़ी ठंड है।’ दरअसल, यह काम न होने का साफ-साफ मैसेज है। इतना कहकर वे दरवाजे की तरफ ताकने लगते हैं, जिसका सांकेतिक अर्थ होता है-गेट आउट! वैसे इसे उनका एकदम विनम्र तरीका समझाना चाहिए, वरना मंत्री होने के नाते वे गार्ड से धक्के मारकर भी बाहर निकलवा सकते हैं।
 
वाकई ठंड विकट है। हर तरफ निरंतर महसूस हो रही है। ऐसे ही एक मंत्री के यहां से बड़े विनम्र तरीके से ‘गेट आउट' होकर मैं बाहर निकला ही था कि सामने पार्क में काफी मात्रा में प्रेमी गुच्छ दिखे। मैं पुष्प गुच्छ देखने के बहाने उन्हें निहारने लगा। यहां ठंड की रंगत अलग ही थी। एक प्रेमी जोड़ा मेरे सामने की बेंच पर बैठा था। काफी देर से उनमें शांति छाई थी। प्रेमी उत्सुक था, प्रेमिका रुष्ट प्रतीत हो रही थी। अचानक प्रेमी आइसक्रीम ले आया, फिर आइसक्रीम देने के बहाने पास सटते हुए मनुहार भरे अंदाज में बोला, ‘आज बड़ी ठंड है!’ सुनते ही प्रेमिका ने कनखियों से उसकी तरफ देखा, फिर मुस्कुरा दी।
मैंने देखा, ठंड में सब कुछ जमता ही नहीं, पिघलता भी है!
 
 
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