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हैप्पी न्यू इयर 2018: सिर्फ बदले ही नहीं कुछ संवरे भी जिंदगी

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Jan 2 2018 7:49PM IST
हैप्पी न्यू इयर 2018: सिर्फ बदले ही नहीं कुछ संवरे भी जिंदगी

वैसे तो जीवन में आने वाला हर पल नया होता है। पल-पल होने वाले बदलाव जुड़कर ही जीवन में बड़े परिवर्तन लाते हैं। लेकिन फिर भी वर्षांत और नव वर्ष के संधिकाल में हम अतीत का आकलन करते और भविष्य की योजनाएं बनाते हैं, इस उम्मीद के साथ कि आने वाले वर्ष में सब कुछ मनचाहा हो जाएगा। लेकिन आने वाले वर्ष में जीवन बदलने के साथ संवरे भी इसके लिए पहल हमें ही करनी होगी।

हालांकि तारीखों का जीवन में कोई खास अर्थ नहीं होता है। हर दिन एक नई तारीख होती है। वह आती है और गुजर जाती है। लेकिन फिर भी तारीखें महत्वपूर्ण होती हैं। कोई तारीख इसलिए अहम होती है कि उस दिन आपका या आपके परिवार के किसी सदस्य का जन्म हुआ, तो कोई तारीख इसलिए महत्वपूर्ण है कि उस दिन आपका विवाह हुआ। 15 अगस्त इसलिए देश याद रखता है कि इस दिन हमें आजादी मिली थी।

लेकिन अगर ये आजादी 15 की जगह 20 अगस्त को मिली होती तो 15 अगस्त एक सामान्य तारीख ही होती, कोई उसे याद नहीं रखता। अर्थात किसी तारीख विशेष को इतिहास बनने में उस दिन हुई घटना अहम होती है। अन्यथा सप्ताह बीतता है, महीना बीतता है और अगला साल आवाज देकर कहता है, लो मैं आ गया। वर्ष का गुजरना और नए वर्ष का आगमन वास्तव में एक खगोलीय घटना है।

माना जाता है कि पृथ्वी अपनी कक्षा में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी कर लेती है तो साल बीत जाता है और नया साल आ जाता है। इस दौरान छह ऋतुएं बीत जाती हैं, 365 दिन और रातें गुजर जाती हैं... हम लाखों पल तमाम तरह के काम करते हुए बिता देते हैं। और यह भी एक सहज प्रक्रिया का ही हिस्सा बनता जा रहा है कि हम हर नए साल का स्वागत उम्मीद, ऊर्जा और उमंग से करते हैं। हम सोचते हैं कि आने वाला साल हम सबके लिए और अधिक बेहतर साबित होगा।

लेकिन समय का चक्र इस बात की प्रतीक्षा नहीं करता कि आप कुछ नया करेंगे, उसे तो गुजर ही जाना है। इतिहास, समाज और घर-परिवार भी उन्हें ही याद रखता है, जो कुछ विशेष कर पाते हंै। यह नियम हर व्यक्ति से लेकर जीवन और समाज तक पर लागू होता है। जिस तरह देश-समाज और दुनिया में हर वर्ष बहुत कुछ अच्छा या बुरा होता है, उसी तरह व्यक्ति के जीवन में भी दुखों और सुखों का आना-जाना लगा रहता है।

गीता में कृष्ण ने कहा है कि परिवर्तन संसार का नियम है, हम इसे चाहकर भी रोक नहीं सकते। लेकिन आने वाले साल में हम कुछ ऐसा करके अपने लिए इसे स्थायी मूल्य का साल बना सकते हैं। बेशक आप साल के अंत में अपनी असफलताओं का लेखा-जोखा करें, लेकिन उससे भी ज्यादा यह जरूरी है कि आप कुछ नया सोचें और करें। यह नया क्या हो सकता है? इस नए वर्ष का स्वागत कुछ ऐसे संकल्पों से हो सकता है, जो हमारी पहचान को पुख्ता करे और हमें जीवन की ऊंचाइयों पर ले जाए।

वास्तविक दुनिया में करें कुछ काम

वर्चुअल दुनिया एक भ्रामक दुनिया है। वो ऐसी दुनिया है, जो हमारे सुख-दुख में साझीदार नहीं है। यह दुनिया जैसी दिखाई दे रही है, वैसी है नहीं। सोशल मीडिया बेशक हमारे लिए एक ऐसा मंच बन रहा है, जहां हम स्वयं को अभिव्यक्त कर पाते हैं। इसलिए भी बेहतर ढंग से अभिव्यक्त कर पाते हैं, क्योंकि यहां हमें किसी का डर नहीं होता है। लेकिन यही डर है, जो हमें आगे ले जाता है।

जब तक हम इस दुनिया से बाहर निकलकर लोगों के सामने खुद को अभिव्यक्त करना नहीं सीखेंगे, तब तक किसी भी क्षेत्र में हम सफलता अर्जित नहीं कर सकते। इसलिए तकनीक को अपने लिए इस्तेमाल करें तकनीक के द्वारा इस्तेमाल की वस्तु न बनें। गए साल हमने तकनीक का भरपूर प्रयोग किया।

लेकिन थोड़ा ठिठक कर सोचेंगे तो पाएंगे कि यह तकनीक और वर्चुअल दुनिया एक हद तक हमें वास्तविक दुनिया से दूर ले जा रही है। हम अपनों से ही दूर हो रहे हैं। तो अगर हम सप्ताह में एक दिन भी ऐसा निकाल लेते हैं, जब हम लोगों से सीधे संवाद करते हैं हैं तो यही बात हमारे व्यक्तित्व को निरंतर मजबूत बनाएगी।

ज्ञान बढ़ाने के लिए आगे आएं

कहते हैं ज्ञान से बड़ी दुनिया में कोई ताकत नहीं है। अगर इस नए साल के लिए हम यह संकल्प लेते हैं कि खुद को अधिक से अधिक अपडेट करेंगे। नई-नई चीजों के बारे में पढ़ेंगे और हर संभव माध्यमों से जानेंगे तो हम देश दुनिया, रिश्ते-नाते, राजनीति, साहित्य के जानकार हो सकते हैं। यह भी दिलचस्प बात है कि ज्ञान अर्जित करने का इकलौता साधन किताबें पढ़ना नहीं है।

हम ऐतिहासिक स्थलों की सैर के जरिए, लोगों से बातचीत के जरिए और टेलीविजन पर अच्छे कार्यक्रमों के जरिए खुद को अपडेट और जागरूक बना सकते हैं। अगर नए साल में हम इस संकल्प पर अमल करते हैं तो यह केवल आने वाले साल में ही नहीं यह ज्ञान और जागरूकता हमारे साथ हमेशा रहेगी।

प्रकृति से जुड़ें

प्रकृति के बीच रहते हुए इंसान को सबसे अधिक खुशी मिलती है। प्राकृतिक सौंदर्य, हरियाली, नदियां, झरने, पहाड़ देखना भला कौन नहीं चाहता। लेकिन इन्हें देखने का अर्थ सिर्फ देखकर लौट आना ही नहीं होना चाहिए। हम सब जानते हैं कि आज पूरी दुनिया किस तरह जलवायु परिवर्तन के संकट से गुजर रही है। कहा जा रहा है कि यदि इसी तरह प्रकृति का दोहन होता रहा तो एक दिन पृथ्वी नामक इस ग्रह पर जीवन का नामो-निशान नहीं बचेगा।

आज तमाम देशों की सरकारें और संगठन वन्य जीव, नदियों, वनों और जैव विविधता को संरक्षण के लिए आगे आ रहे हैं। लेकिन दुनिया के तमाम देशों द्वारा चलाए जा रहे अभियान हम सबकी भागीदारी के बिना अधूरे हैं। तो इस नए साल पर हम भी प्रकृति को बचाने के लिए कोई भी छोटा-सा काम शुरू कर सकते हैं।

मसलन, बागवानी की शुरुआत कर सकते हैं, वृक्षों को कटने से रोकने के लिए पहल कर सकते हैं, नए वृक्षों को लगा सकते हैं। रोजाना के स्तर पर हमारा यह छोटा-सा काम साल भर में अहम काम बन जाएगा। यह काम प्रकृति के संरक्षण को तो बल देगा ही हमको नई पहचान भी दे सकता है। 

अपनी जिम्मेदारी निभाएं

हर इंसान की अपने घर-परिवार के प्रति एक जिम्मेदारी होती है। अगर आप घर के मुखिया हैं तो यह जिम्मेदारी केवल घर की आर्थिक जरूरतें पूरी करने तक ही सीमित नहीं होती है बल्कि हमें अपने घर-परिवार के लिए उचित समय भी देना होगा। संभव है, हमारी व्यस्तताएं हमको ऐसा करने से रोकती हों, लेकिन सप्ताह में, पंद्रह दिन में या महीने में केवल एक दिन हम अपने परिवार के लिए अवश्य निकालें। इस दिन हम सब साथ घूमने जाएं, बैठें-बतियाएं।

परिवार के साथ बिताया गया एक पूरा दिन हमें रिफ्रेश कर देगा। इसी तरह हम समाज के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभा सकते हैं। अगर हमारे घर में कोई मेड काम करती है तो हम उसके बच्चों को पढ़ा सकते हैं। अगर हर व्यक्ति सिर्फ एक बच्चे को पढ़ाने की जिम्मेदारी उठा लेगा तो सोच भी नहीं सकते कि एक साल में कितने बच्चे पढ़ने लायक हो सकते हैं। यह छोटा-सा कदम आपको जितनी खुशी देगा, उतनी खुशी आपको किसी और काम से नहीं मिल सकती। इस काम से हमारे भीतर यह बोध भी पैदा होगा कि हम अपने समाज के लिए कुछ कर रहे हैं। 

नए वर्ष को दें नए अर्थ

नए वर्ष का अपने अंदाज में हम स्वागत जरूर करें। पार्टी करें, डांस करें, कहीं घूमने जाएं, जो भी हमको पसंद है, वो करें। लेकिन ऐसा न हो कि हम रात को जश्न मनाएं और सुबह भूल जाएं कि नया साल शुरू हो गया है। वरना समय अपनी गति से फिर से चलता रहेगा, बीतता रहेगा। हमको पता भी नहीं चलेगा और अगला साल भी खत्म हो जाएगा। कुछ काम जरूर ऐसे सोचें, जो हमको इस साल करने हैं।

उन्हें निरंतर करते रहें। एक साल में 365 दिन होते हैं। अगर हम अपने सोचे गए काम को रोज आधा घंटा भी देते हैं तो भी हमको पूरे साल में 182 घंटे और तीस मिनट का समय मिलेगा। इतने समय में कोई भी बड़ा काम किया जा सकता है। हम चाहें तो डायरी लिख सकते हैं, कहानियां, कविताएं लिख सकते हैं, पेंटिंग्स बना सकते हैं, कोई नई कला सीख सकते हैं।

अगर हमारी इन सबमें रुचि न हो तो इनके अलावा भी अपनी रुचि का ही कोई अन्य शौक पूरा कर सकते हैं। और जब साल खत्म होगा तो हम पाएंगे कि हमने एक नई विधा सीख ली है। तब हमको अगला साल खत्म होने पर सबसे ज्यादा खुशी होगी और उसके आगे आने वाले साल का स्वागत करते समय बेहद उत्साह और उमंग से भरे होंगे। इसका अहसास करने के लिए पहल हमें ही करनी होगी। 

लेकिन अगर इनमें से हम कुछ भी नया नहीं कर पाते तो बस साल बीत जाएगा, तारीखें बदलती रहेंगे, और हम अगले साल भी खुद को वहीं पाएंगे जहां हम आज हैं। सुपरिचित लेखक-पत्रकार प्रियदर्शन ने अपनी एक कविता में साल के आने और बीत जाने को बेहद खूबसूरत अंदाज में व्यक्त किया है। पहले तो उन्होंने लिखा है कि किस तरह जनवरी से लेकर नवंबर तक के महीने बीतते हैं। फिर उन्होंने दिसंबर के बारे में कुछ यूं लिखा है- 

और दिसंबर तो बस आता है नए साल का दरवाजा खोलने के लिए 

बची-खुची छुट्टियां लेने का वक्त और खुद से किए वायदों को भूल नए वायदे करने का।

कि पहली बार महसूस होता है कि अरे, निकल गया यह साल तो 

लेकिन साथ में उतरता है यह बोझ भी 

कि चलो भले बीता कोरा का कोरा 

लेकिन इसके बाद तो आ रहा है नया साल 

जिसमें हम बांध सकेंगे नए सिरे से मुट्ठियां 

और खुद को दे सकेंगे तसल्ली 

कि बाकी हैं अभी कई बरस हमारे लिए।

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