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भारतीय राजनीति का ध्रुवतारा- भारत रत्न अटल बिहारी बाजपेयी

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Dec 25 2017 3:07AM IST
भारतीय राजनीति का ध्रुवतारा- भारत रत्न अटल बिहारी बाजपेयी

अटल बिहारी बाजपेयी एक कवि, एक राजनेता, एक राष्ट्रभक्त, ऐसा व्यक्तित्व जिसका सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र और मानवता की सेवा के लिये रहा जो राजनीति की रपटीली राहोें पर चलकर भी फिसले नहीं।

अपने तो अपने विरोधियों के दिल में भी उनके लिये सदैव सम्मान रहा है और रहेगा। जिनके नाम में अटल भी हैं और विहारी भी है जो व्यक्तिगत जीवन में फूल से कोमल रहे हैं तो राष्ट्रीय हितों के लिये बज्र से कठोर।

अटल जी का जन्म 25 दिसम्बर 1924 को ग्वालियर में श्रीकृष्ण बिहारी वाजपेयी जी के घर में हुआ, एक शिक्षक के घर में जब नन्हें बालक की किलकारी गूॅंजी होगी तब कौन सोच सकता होगा कि एक दिन यह बालक अपनी वाणी के सम्मोहन से विश्व की राजनीति को भी प्रभावित करेगा।

अटल जी का पैतृक गांव बटेश्वर जिसे बृज की काशी भी कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार त्रेतायुग में शत्रुध्न ने बटेश्वर की स्थापना की बटेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के पितामह सूरसेन की राजधानी भी रही है इसी बटेश्वर की गलियों में वचपन में धमाचौकड़ी मचाने बाला ‘‘अटल्ला’’ एक दिन अमेरिका जैसी महाशक्ति को भी झुका देगा यह उस समय कौन कल्पना कर सकता होगा।

अटल जी के पिताजी श्रीकृष्ण बिहारी वाजपेयी भारतीय दर्शन शास्त्र के अध्यापक एवं विद्वान थे, वह एक अच्छे अध्यापक तो थे ही कविताओं के साथ–साथ उन्हें गीता, भागवत, रामायण और महाभारत आदि ग्रन्थ मुखाग्र थे। वह आर्यकुमार सभा के सक्रिय कार्यकर्ता थे और ग्वालियर में उनकी प्रतिष्ठा थी।

अटल जी जब पाँचवी कक्षा में पढ़ते थे उस समय उन्हें भाषण देने का पहला अवसर मिला लेकिन घबराहट में वे भाषण न दे सके एक और अवसर पर भी उनकी यही स्थिति रही, उसके बाद उन्होंने रटकर भाषण देने का विचार त्याग दिया। उनकी मां ने उन्हें ‘‘निर्भय बनो–निर्भय रहो’’ की सीख दी, उसी पर उन्होंने चलना तय किया और श्रेष्ठ वक्ता बन गये।

अटल जी जब नवमी कक्षा में पढ़ते थे तब उन्होंने ‘‘ताजमहल’’ पर कविता लिखी जिसमें उन्होंने ‘‘ताजमहल’’ को हिन्दू कारीगरों के रक्त पर खडा़ महल बताया था।

‘‘यमुना की धार विकल, कल–कल, छल–छल प्रतिपल ।।

जब रोया हिन्दुस्तान सकल, तब बन पाया यह ताजमहल।।

मैंट्रिक पास होने के पश्चात अटल जी ने 1941 से 1945 तक तत्कालीन विक्टोरिया कॉलेज (अब महारानी लक्ष्मीबाई महाविद्यालय) में अध्ययन किया। वह छात्रसंघ के महासचिव भी चुने गये।

गरीब छात्रें का शुल्क माफ कराना, उन्हें कहाँ पुस्तकें उपलब्ध कराना, छात्रवृत्ति दिलवाना तथा छात्रों की अन्य अनेक समस्यायें सुलझाने के काम अटल जी ने किये जिससे उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी।

द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण उन दिनों मिट्टी का तेल मिलना कठिन हो गया था एवं छात्रों को पढ़ाई करने में काफी परेशानी होने लगी थी, अटल जी ने छात्रसंघ की ओर से ग्वालियर के एक तत्कालीन शासकीय अधिकारी से भेंटकर छात्रों के लिये मिट्टी के तेल का विशेष कोटा मंजूर करवाया जिससे वह छात्रों में वह बेहद लोकप्रिय हो गये तथा छात्रों ने मिटटी के तेल का एक लैंप उन्हें भेंट किया।

अटल जी की व्यापक सोच उनके सहपठियों के साथ संवाद में मिलती थी। छात्र साथियों के बीच महानता पर चर्चा करते हुये अटल जी ने कहा ’’विजयी शक्ति को ही महान कहना गलत है, हार के बाद भी महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान को हम महान कहते हैं। बड़प्पन और महानता क्या केवल प्रसिद्धि और यश मिलने से ही सावित होती है।

बिहारी बड़ा लेखक, बड़ा खिलाडी, बड़ा अभिनेता और बड़ा विजेता ही केवल बड़े होते हैं क्या बिहारी मनुष्य छोटा हो या बडा सवाल हार जीत का नहीं ध्येय का होता है देखा यह जाना चाहिये कि कोई व्यक्ति दूसरों के प्रति कितना उदार है, कितना संवेदनशील है और उसकी अपनी अवधारणायें कितनी स्पष्ट है।

एम.ए. पास करने के पश्चात अटल जी रा.स्वं. सेवक संघ के प्रचारक बने और उन्हें लखनऊ के पास संडीला नामक स्थान पर भेजा गया दिल और दिमाग में निरंतर राष्ट्रचिंतन एक ही ध्येय जय–जय भारत। शाखा कार्य से कभी फुर्सत मिली तो या तो काव्य पाठ या, काव्य रचना का काम चलता।

1947 में संघ की विचारधारा को लोगों तक पहुंचाने के लिये ‘‘राष्ट्रधर्म’’ मासिक पत्रिका को प्रारंभ किया गया पंडित दीनदयाल उपाध्याय उसके मार्गदर्शक थे अटल जी प्रथम संपादक बने।

पं. जवाहरलाल नेहरू की नीतियों से असहमत होकर तात्कालीन सरकार के उद्योगमंत्री डॉ0 श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने सरकार से इस्तीफा दे दिया एवं रा. स्वयं सेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलबलकर ‘‘श्री गुरू जी’’ से मंत्रणा कर एक राष्ट्रवादी दल ‘‘जनसंघ’’ की स्थापना की उनके सहयोग के लिये संघ के पं. दीनदयाल उपाध्याय सुदंरसिंह भंडारी, नानाजी देशमुख कुशाभाऊ ठाकरे एवं अटल बिहारी वाजपेयी को जनसंघ के कार्य के लिये भेजा गया।

जब कश्मीर में परमिट सिस्टम के विरोध में डॉ. मुखर्जी ने आंदोलन किया तब अटल जी एक पत्रकार के रूप में उनके साथ थे बिना परमिट के कश्मीर सीमा के प्रवेश करते ही डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को गिरफ्तार कर लिया गया।

डॉ. मुखर्जी ने गिरफ्तार होते ही कहा ‘‘अटल, जाओ’’ जाकर देश से कह दो मैेंने बिना परमिट कश्मीर में प्रवेश कर लिया है एक देश में दो विधान अब नहीं चलेंगें।’’ दुर्भाग्य से कश्मीर की जेल में डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी की मृत्यु हो गयी जनसंघ की जिम्मेदारी पं. दीनदयाल उपाध्याय एवं उनके साथियों के कंधो पर आ पड़ी जिसे उन्होंने प्राणोप्रण से निभाया।

सन् 1953 में श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित के सोवियत संघ के राजदूत बन जाने के कारण रिक्त हुई सीट पर अटल जी को मध्यावधि चुनाव के लिये उम्मीदवार चुना गया केवल 1 माह में 150 से अधिक सभाओं को सम्बोधित कर अटल जी ने काफी ख्याति अर्जित की हालांकि यह चुनाव कॉग्रेस ने जीता पर नवोदित दल जनसंघ के प्रत्याशी अटल जी दूसरे स्थान पर रहे।

सन् 1957 बलरामपुर लोकसभा सीट से अटल जी सांसद चुने गये, संसद में उनकी उपस्थिति गजब की थी, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री की भारत यात्र के दौरान पं. जवाहर लाल नेहरू ने उनसे अटल का परिचय कराते हुये कहा था यह विपक्ष का युवा नेता हमेशा मेरी आलोचना करता है पर इसमें मुझे भारत के उज्जवल भविष्य की झलक मिलती है।

सातवे दशक में भारतीय जनसंघ का प्रभाव हर क्षेत्र में बढ रहा था परन्तु इसी दशक में पार्टी पर भीषण बज्राघात हुआ पं. दीनदयाल उपाध्याय जी की रहस्मयी परिस्थितयों में मृत्यु हो गई, पार्टी ने अटल जी को अध्यक्ष बनाने का फैसला किया श्रद्धांजलि भाषण में अटल जी ने कहा ‘‘दीनदयाल जी ने जो ज्योति जलाई है उसे हम ज्वाला कर देंगे’’। इस उद्बोधन ने कार्यकताओं को नई स्फूर्ति दी।

अटल जी ने वैचारिक मतभेदों को कभी राष्ट्रीय हितों पर हावी नहीं होने दिया भारत पाकिस्तान युद्ध के समय भारत सरकार की भूमिका एवं पृथक बांग्लादेश निर्माण में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की दृढ़ इच्छा शक्ति की प्रशंसा करते हुये उन्हें दुर्गा तक कहा। जब देश पर आपातकाल थोपा गया तब ‘‘कैदी कविराय’’ अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं ने लोक जागरण का कार्य किया।

आपातकाल समाप्ति के पश्चात बनी सरकार में अटल जी को विदेश मंत्रलय जैसा महत्वपूर्ण मंत्रलय मिला अटल जी की दूरदर्शिता ने उस समय विदेशों के साथ भारत के रिश्ते बेहद मजबूत हुये।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसकी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विचारधारा से अटल जी का समर्पण सदैव अटूट रहा जब जनतापार्टी के अंदर दोहरी सदस्यता का मुद्दा उठा तो जनतापार्टी की संसदीय बोर्ड की बैठक में अटल जी फट पड़े ’’हम जनतापार्टी में केवल तीन वर्ष पहले आये हैं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हमारा रिश्ता बचपन से है और आप चाहते है कि हम संघ से नाता तोड़ लें आपको मालूम है आप क्या कह रहे हैं बिहारी।

अंतत: दोहरी सदस्यता के मुददे पर संघ समर्थक लोग जनता पार्टी से अलग हुये एवं 06 अप्रैल 1980 को भारतीय जनतापार्टी बनी इसके अध्यक्ष के रूप में कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुये अटल जी ने कहा ‘‘भजापा का अध्यक्ष कोई अलंकार की वस्तु नहीं है।

ये पद नहीं दायित्व है, प्रतिष्ठा नहीं परीक्षा है, ये सम्मान नहीं चुनौती है, मुझे भरोसा है कि आपके सहयोग से देश की जनता के समर्थन से मैं इस जिम्मेदारी को ठीक तरह से निभा सकूंगा।’’

अटल जी ने कहा जिन परिस्थितियों में भारतीय जनता पार्टी का निर्माण हुआ मैं उसमें जाना नही चाहता, देश की राजनीति को अगर नैतिक मूल्यों पर चलाने का संकल्प किसी ने किया है और जो लोग उस संकल्प को कार्य में परिणित करने की शक्ति रखते हैं वो भाजपा के मंच पर इकट्ठे हो गये।

अटल जी ने कहा भारतीय जनता पार्टी जयप्रकाश के सपनों को पूरा करने के लिये बनी है जनता पार्टी टूट गई लेकिन हम जयप्रकाश के सपनों को टूटनें नहीं देंगेे। जयप्रकाश नारायण किसी व्यक्ति का नाम नहीं है जयप्रकाश कुछ आर्दशोंं का नाम है।

कुछ मूल्यों का नाम है जयप्रकाश का पूरा जीवन उनकी साधना और उनका संघर्ष, कुछ मूल्यों के साथ उनकी प्रतिबद्धता ये हमारी विरासत के अंग है। मैंने जयप्रकाश जी के अधूरे काम को पूरा करने का व्रत लिया है, हम राजनीति को कुछ मूल्यों पर आधारित करना चाहते हैं राजनीति केवल कुर्सी का खेल नहीं रहना चाहिये।

अटल जी ने आगे कहा भाजपा मुठभेड़ की राजनीति नहीं चाहती लेकिन अगर मुठभेड हमारे ऊपर थोपी गई तो हम उससे कतरायेंगे भी नहीं हमने गांधीवाद समाजवाद को निष्ठा के रूप में स्वीकार किया है इसके आधार पर हम भावी भारत का निर्माण करना चाहते है, हमने संप्रदाय निरपेक्षता को भी स्वीकार किया है।

अटल जी ने कहा भाजपा राजनीति में राजनीतिक दलों में, राजनेताओं में, जनता के खोये हुये विश्वास को पुन: स्थापित करने के लिये जमीन से जुडी राजनीति करेगी जोडतोड की राजनीति का कोई भविष्य नहीं है पैसा और प्रतिष्ठा के पीछे पागल होने वालों के लिये हमारे यहंा कोई जगह नही है।

अटल जी ने कडे शब्दों में कहा ‘‘जिन्हें आत्मसम्मान का अभाव हो वे दिल्ली के दरबार में जाकर मुजरे झाडे हम तो एक हाथ में भारत का संविधान और दूसरे में एकता का निशान लेकर मैदान में कूदेंगें।

भाषण के आखिरी चरण में अटल जी ने कहा ‘‘हम छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन और संघर्ष से प्रेरणा लेंगे सामाजिक समता का विगुल बजाने वाले महात्मा फुले हमारे पथ प्रदर्शक होंगे। भारत के पश्चिमी घाट को मंडित करने वाले महासागर के किनारे खडे होकर मैं यह भविष्यवाणी करने का साहस करता हॅू ’’अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा कमल खिलेगा।’’

सन् 1996 में पहली बार केवल 13 दिन के लिये प्रधानमंंत्री बनने के बाद में तथा सन् 1999 में मात्र 1 वोट से सरकार गिर जाने जैसी दुखद स्थिति में अटल जी न तो स्वयं विचलित हुये न पार्टी के सदस्यों को हार के कारण से दुखी होने दिया।

उन क्षणों में अटल जी उदास अवश्य थे पर हताश नहीं। यह तभी संभव है जब व्यक्ति में आत्मबल हो और अपने आप पर पूर्ण विश्वास हो। पहली बार भारत के आम जनमानस ने इस दर्द को महसूस किया एक रिक्शा या हाथ ठेला चलाने वाला व्यक्ति भी अटल जी जैसे योग्य व्यक्ति की सरकार इस तरह गिरना पसंद नहीं कर रहा था।

पर अटल जी ने कहा ‘‘अपने अल्पमत को बहुमत में बदलने के लिये मैंने कोई गलत काम नहीं किया सदस्यों की खरीद फरोख्त का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। सत्ता की चादर को मैंने 13 दिन बाद वेदाग रख दिया।’’ इसके लिये विरोधी नेताओं ने भी सदन में अटल जी की प्रशंसा की। सरकार गिरी किन्तु अटल जी ने हार नहीं मानी उनके भाव तो यही थे।

‘‘हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा

काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूॅ

गीत नया गाता हूूं ................................।।

सन् 1998 में अटल जी का भारत का प्रधानमंत्री बनना यह भारत की राजनीति में परिवर्तन का निर्णायक दौर था, अटल जी गैर काँग्रेसी पृष्ठ–भूमि से भारत के पहले प्रधान मंत्री थे भारत के ख्याति नाम सांसद प्रखर विदेशमंत्री के रूप में दुनियाँ उनको पहले ही पहचान चुकी थी।

अपने प्रधानमंत्रित्व को एवं भारत की अंतराष्ट्रीय स्थिति को अटल जी ने नया ओज प्रदान किया। परमाणु परीक्षणों का कठिन निर्णय उन्होंने जिस त्वरित एवं कुशल ढंग से किया उसने विश्व पटल पर भारत की छवि को एकदम रूपांतरित कर दिया।

भारत को एक नया व्यक्तित्व प्राप्त हो गया दुनिया ने इस संदेश को भली प्रकार से समझा। रूस से मित्रता खोये बिना हम न केवल अमेरिका को मित्र बना सके बरन अमेरिका भारत की मित्रता पाने को लालायित हो उठा इसी वर्ष अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत की यात्रा एवं अटल विहारी वाजपेयी की अमेरिका यात्रा ने दोनों देशों के रिश्तों में और मजबूती का काम किया।

पोखरण विस्फोट के पश्चात अटल जी ने कहा था ‘‘हममें से हर एक का मस्तक उस दिन उन्नत हुआ, सीना चौड़ा हुआ क्योंकि उस दिन पोखरण में केवल अणु ऊर्जा का ही नहीं राष्ट्र ऊर्जा का भी प्रकटीकरण हुआ था।’’

अपने शब्द बाणों से विरोधियों के छक्के छुड़ा देना अटल जी की विशेषता रही है एक सभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी पर तंज कसते हुये अटल जी ने कहा ‘‘प्रधानमंत्री जी कहती हैं, अटल विहारी दोनों हाथ उठा–उठा कर भाषण देता है, अब बताओ भला भाषण तो हाथ उठाकर ही दिया जाता है दोनों पैर उठाकर भाषण दिया जा सकता है क्या बिहारी’’

सन् 1998 के विधानसभा चुनाव में अनपेक्षित नतीजों के बाद अपनी दूसरी पारी शुरू करते हुये मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी से भेंट करने दिल्ली गये अटल जी ने पूछा ‘‘यह करामात कैसे कर डाली ? दिग्विजय सिंह ने मजाक में कहा’’ सब प्याज की करामात है’’ अटल जी ने नहले पर दहला मारते हुये कहा ’’प्याज तो ठीक है, परंतु तुमने भी कहीं लहसुन अवश्य मिलाया होगा।

हिन्दुत्व के प्रति अटल जी के विचार अत्यंत व्यापक हैं, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जिस हिन्दुत्व की कल्पना करता है वे उसी के अनन्य अनुयायी हैं। उनकी युवावस्था में रचित ‘‘हिन्दू तन–मन, हिन्दू जीवन, रग–रग हिन्दू मेरा परिचय’’ कविता में हिन्दुत्व के बारे में जो उदात्त भाव मुखरित हुये हैं वे आज भी मार्गदर्शक व प्रेरणादायी हैं।

हिन्दुत्व के विचार को संकुचित बताकर इस पर कट्टरपंथी होने का अरोप लगाने वालों के लिये यह कविता मुॅह तोड उत्तर है, इस कविता में अभिव्यक्त हिन्दुत्व, भारतीयत्व ही नहीं मानवता का पर्याय है।

‘‘दुनियाँ के वीराने पथ पर, जब–जब नर ने खाई ठोकर

दो आंसू शेष बचा पाया, जब–जब मानस सब कुछ खोकर

मैं आया तभी द्रवित होकर, मैं आया ज्ञानदीप लेकर

भूला भटका मानव पथ पर, चल निकला सोते से जगकर

पथ के आघातों से थककर, जो बैठ गया आधे पथ पर

उस नर को राह दिखाना ही, मेरा सदैव का दृढ़ निश्चय

हिन्दू तनमन–हिन्दू जीवन, रग–रग हिन्दू मेरा परिचय।।’’

समाज का नेतृत्व करने वाले नेताओं में विभिन्न प्रकार के गुण होते हैं कोई अच्छा वक्ता होता है, कोई कुशल संगठनकर्ता होता है कोई विचारक, विधिवेत्ता या अच्छा प्रशासन कर्ता ही होता है परन्तु यह सभी गुण जिस व्यक्ति में हैं वह है श्री अटल विहारी वाजपेयी।

देश के किसी भी राजनैतिक दल के किसी भी राजनेता से अगर कोई सवाल पूछता कि उन्हें अटल जी कैसे लगते हैं तो सर्वदलीय भाव से एक ही उत्तर मिलेगा कि अटल जी जैसा कोई नहीं।

अपने व्यवहार अपने कर्तव्य से अटल जी ने देश वासियों के दिल पर राज किया, राष्ट्र के प्रति उनके समर्पण के लिये सन् 1992 में ‘‘पदमविभूषण’’ तथा सन् 1994 में सर्वश्रेष्ठ सांसद का सम्मान मिला।

राष्ट्र के लिये उनकी उत्कृष्ट सेवा के लिये 2015 में देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया जिसके वह वास्तविक अधिकारी थे। भारत माता भी अपने सपूत को सम्मानित होते देखकर गौरवान्वित महसूस कर रही होगी।

राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के विचार को हृदयागम कर अटल जी ने सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र की सेवा में समर्पित कर दिया सफलता के शिखर पर पहुॅचकर भी उनके पैर जमीं पर रहे।

अटल जी कहते थे ‘‘लाखों स्वयं सेवकों के परिश्रम, समर्पण, कष्ट सहने, त्याग से आज के दिन देखने को मिले हैं, जो आज हमारे साथ नहीं हैं उन सबको अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हॅू और जो स्वयंसेवक साथ हैं उन्हें मैं यह आश्वासन देता हूॅ कि मुझसे ऐसा कोई कार्य नहीं होगा जिससे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की धवल कीर्ति पर कोई कलंक लग सके।

भारतीय राजनीति के शिखर पर पहुँचने तथा विश्व के लोकप्रिय नेता बनने के पश्चात भी अटल जी का सम्पर्क सदैव जमीन से जुडा रहा है, हर कार्यकर्ता को लगता है कि वह अटल जी के नजदीक है, अटल जी का नाम आते ही हर किसी के भी मुँह से यही निकलता है ‘‘अपने–अटल जी’’।

आभार - सुरेन्द्र शर्मा (भाजपा प्रदेश कार्यसमिति )

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