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गांघी जयंती 2017: गांधी की झाड़ू मोदी के हाथ

कुमार प्रशांत | UPDATED Oct 2 2017 3:40PM IST
गांघी जयंती 2017: गांधी की झाड़ू मोदी के हाथ

सफाई की बात इन दिनों इतनी जोर-जोर से देश में चल रही है कि साफ-साफ शक हो रहा है कि सफाई के नाम पर कहीं हमें तो साफ मूर्ख नहीं बनाया जा रहा है! इस सरकार को या अौर भी साफ कहूं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बात का श्रेय देना ही होगा कि स्वच्छता को उन्होंने एक मुद्दा बना दिया! प्रधानमंत्री झाडू ले कर निकले तो सत्ताभीरू हमारा उच्च वर्ग भी झाडू ले कर खड़ा हो गया।

सारे मंत्रियों को भी लगा कि उद्घाटन करते हुए फोटो खिंचाने की ही तरह ही, झाडू ले कर फोटो खिंचवाना भी मंत्रालय का एक काम है; अौर उद्घाटन कर के भूल जाना जैसे सत्ताधर्म है वैसे ही फोटो खिंचवा कर झाडू फेंक देना भी सत्ता-चरित्र है। लेकिन परेशानी यह पैदा हो गई कि प्रधानमंत्री ने इस खेल का झाडू महात्मा गांधी से ले लिया; इधर उन्होंने लिया अौर उधर महात्मा गांधी ने अपना झाडू चलाना शुरू कर दिया!

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प्रधानमंत्री ने यह काम तो बड़ा किया कि देश की सफाई को राजनीति का सवाल बना दिया! हमारा देश सच में इतनी गंदगी समेट कर जीता है कि दम घुट जाए! वी.एस. नायपॉल ने तो लिखा ही दिया न भारत एक विस्तीर्ण खुला शौचस्थल है अौर हम रोज-ब-रोज उन खबरों द्वारा नायपॉल को सही साबित करते चलते हैं जो बताती हैं कि मेनहोल की सफाई में करने उसमें उतरे इतने मजदूरों ने जहरीली गैस की चपेट में अा कर दम तोड़ दिया।

अभी जब मैं यह सब लिख रहा हूं, खबर बता रही है कि राजधानी दिल्ली के सबसे निकट की बस्ती गुड़गांव में मेनहोल की सफाई के लिए उसमें उतरे 3 सफाईकर्मचारियों ने जहरीली गैस से अवश हो कर दम तोड़ दिया अौर चौथा अस्पताल में अत्यंत नाजुक हालत में है। यही अखबार बता रहा है कि देश की अौद्योगिक राजधानी मुंबई के एलफिंस्टन रोड स्टेशन के गंदे-टूटे-संकरे 150 साल पुराने पुल पर मचाई गई भगदड़ में 23 लोग कुचल कर मरे हैं।

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अौर घायल सभी अस्पतालों में हैं अौर यही अखबार यह भी बता रहा है कि देश में यहां-वहां उस दिन बलात्कार की कितनी ही घटनाएं हुई हैं। सड़कों पर बिखरी दृश्य गंदगी अौर हमारी व्यवस्थाजन्य गंदगी अौर हमारे मन-प्राणों में बसी गंदगी को साथ जोड़ लें तो खुद से ही घिन अाने लगेगी; अौर तब हम यह समझ सकेंगे कि महात्मा गांधी ने देवालय अौर शौचालय की सफाई को देवत्व से क्यों जोड़ा था।

दरअसल में गांधी के देवता किसी देवालय में (उसका नाम मंदिर-मस्जिद-चर्च-नामघर-अातशबहेराम-गुरुद्वारा जैसा कुछ भी हो !) बसते ही नहीं थे। कहीं देखा है ऐसा फोटो कि किसी देवालय में बैठकर गांधी पूजा-अर्चना कर रहे हों कि ध्यान लगा रहे हैं कि शस्त्र-पूजा कर रहे हैं ? गांधी के देवता उनके भीतर बसते थे अौर वे स्वंय हर इंसान के भीतर बसे देवता के अाराधक थे। जब मन मंदिर हो तब वह मन जिस तन में रहता है, उसे कितना पवित्र रखने की जरूरत है,

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यह जीएसटी की जटिलता की तुलना में, कहीं अासानी से समझा जा सकता है। गांधी का नाम बार-बार ले कर, अपनी हर बात से उन्हें जोड़ कर प्रधानमंत्री खामख्वाह खुद के लिए भी अौर अपने सहयोगियों के लिए भी मुसीबत पैदा कर लेते हैं। गांधी का झाडू बहुत खतरनाक था, अौर अाज भी है। वे अपने पास अाने वाले हर व्यक्ति के हाथ में झाडू पकड़ा देते थे अौर उसे शौचालय का रास्ता दिखला देते थे।

फिर वह किसी भी जाति-धर्म-संप्रदाय का हो; कि अवर्ण हो कि सवर्ण; कि जवाहरलाल नेहरू हों कि जमनालाल बजाज! हां, ऐसी सफाई-सेना की अगली कतार में वे खुद खड़े रहते थे। अपने जीवन के जिस पहले कांग्रेस अधिवेशन में वे शामिल हुए वहां सबसे पहले उनकी नजर गई नेताअों की लकदक के पीछे छिपी गंदगी पर! लिखा है उन्होंने कि अधिवेशन-स्थल पर लोगों के लिए जो शौचालय बनाए गये थे।

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उनकी हालत ऐसी थी कि भीतर जाने के लिए पांव धरने की जगह नहीं थी तो मोहनदास करमचंद गांधी ने व्यवस्थापकों के पास खुद जा कर सफाई कर्मचारी का काम मांगा अौर सफाई में जुट गए। फिर तो हालत ऐसी बनी कि लोग इंतजार करते रहते थे कि दक्षिण अफ्रीका से अाया यह नीम-पागल कब शौचालय से निकले कि हम जाएं! गांधी जाने से पहले अौर निकले से पहले सारी अौर पूरी सफाई करते थे।

अौर जब गांधी कांग्रेस के भीतर पहुंचे तो यह सफाई यहां तक पहुंची कि कांग्रेस की भाषा भी साफ हुई, कपड़े भी साफ हुए, कांग्रेसी होने का मतलब भी साफ हुअा! सफाई कर्मकांड नहीं है; राजनीतिक चालबाजी का हथियार नहीं है; दूसरों को दिखाने अौर फोटो खिंचवाने की बेईमानी नहीं है। सफाई मन:स्थिति है जो तन-मन-धन की सफाई के बगैर चैन पा ही नहीं सकती है।

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प्रधानमंत्री का छेड़ा स्वच्छता अभियान इसलिए असर पैदा नहीं कर पा रहा है कि यह 2 अक्टूबर अौर 20 जनवरी को भय व अादेश से यहां-वहां चलता है लेकिन यह अाज तक पता नहीं चला है कि स्वच्छता-संकल्प के बाद से प्रधानमंत्री से ले कर सचिन तेंदुलकर तक के घर से एक नौकर या एक चपरासी कम हुअा है या नहीं, क्योंकि प्रधानमंत्री अब अपनी केबिन खुद ही साफ कर लेते हैं अौर सचिन बांदरा की गलियां साफ करते हों कि न करते हों, अपना कमरा तो खुद ही बुहारते हैं।

स्वच्छता की यह समझ गांधी वाली है। अाप वह चश्मा देखिए न जो प्रधानमंत्री के इस अभियान का प्रतीक-चिन्ह बनाया गया है - चश्मा गांधी का है. उस चश्मे की एक कांच पर ‘स्वच्छ' लिखा है अौर दूसरी पर ‘भारत'। जिधर भारत है उधर ‘स्वच्छता' नहीं है, जिधर ‘स्वच्छ' है उधर ‘भारत' नहीं है! यह सच्चाई की स्वीकारोक्ति है तब तो कुछ कहना नहीं है अन्यथा यह पूछा व समझा ही जाना चाहिए कि इन दोनों के बीच इतनी दूरी क्यों है ? यह अास्था व रणनीति की दूरी है।

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शौचालयों के अंधाधुंध निर्माण की सच्चाई का अाकलन पिछले दिनों प्राय: हर चैनल पर दिखाया गया! सारा शौचालय-अभियान अरबों रुपए के घोटाले में बदल गया है। तंत्र भ्रष्ट हो, लगातार भ्रष्ट बनाया जा रहा हो तो उसके द्वारा किया काम स्वच्छ कैसे हो सकता है ? गांधी का झाड़ू इसलिए ही इतना खतरनाक था कि बाजवक्त उससे सभी पिटे हैं।

नमक सत्याग्रह शुरू करने से पहले तत्कालीन वाइसराय को लिखे पत्र में सीधा ही पूछा उन्होंने कि अापके अपने वेतन में अौर इस देश के अादमी की अौसत कमाई में कितने का फर्क है, इसका हिसाब लगाएं अाप! अौर फिर हिसाब भी लगा कर समझाया कि ब्रिटेन का प्रधानमंत्री अपने देश को जितना लूटता है, उससे कई-कई गुना ज्यादा अाप हमें लूट रहे हैं!

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गांधी का झाडू चलेगा तो अाज के तमाम जन-प्रतिनिधियों से पूछेगा ही न कि अाप भी यह हिसाब लगाएं अौर हमें बताएं कि करोड़ों की बढ़ती बेरोजगारी, सदा-सर्वदा असुरक्षा में जीती लड़कियां अौर राष्ट्रीय स्तर पर अात्महत्या करते किसानों-मजदूरों के इस देश में अपनी सेवा की कितनी कीमत वसूल रहे हैं अाप ?

मन की, हेतु की अौर अाकांक्षाअों की सफाई होगी, वहां हमारा अात्मप्रेरित झाडू चलेगा अौर चलता रहेगा तब ही, अौर केवल तब ही देश के शहर-नगर-गांव-मुहल्ले भी साफ होने लगेंगे, साफ रहने लगेंगे। सफाई मन की जरूरी है! वहां गंदगी का साम्राज्य फैला हुअा है।

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