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व्यंग्य: रेड लाइट पर लाल हुआ चौधरी, जानिए फिर क्या हुआ

सुलतान भारती | UPDATED Jul 16 2017 4:08PM IST
व्यंग्य: रेड लाइट पर लाल हुआ चौधरी, जानिए फिर क्या हुआ

चौथी बार मैं खुद रेड लाइट अपनी सकूटर कुदा कर पार कर गया। अगड़े रेड लाइट पै भी पुड़िस वाड़े ना दिखे, बस मैं उसे भी छलांग मार के पार कर ग्या। अभी मैं पचास गज आगे लिकड़ हा, अक-अचानक एक पेड़ के पीछे ते दौड़कर एक पुड़िस वाला सकूटर के ठीक सामणे आ लिया। मैं गिरते गिरते बचा।

मैं जल्दी से उठ बैठा। घड़ी  देखी-रात के बारह बजे थे। किसी ने दरवाजा जोर से खटखटाया था। मैं घबरा कर सोचने लगा-कौन हो सकता है? चोर तो नहीं हो सकता क्योंकि एक लेखक का घर चोर के लिए किसी काम का नहीं होता। जीएसटी भी आ चुका है। भूकंप अकसर रात में ही आता है, यह कौन सा भूकंप है, जिसमें मेरी ही कुंडी खटखटा रही है।

तभी बाहर से चौधरी की गरजती आवाज सुनाई पड़ी-‘कितै सो गयौ उपले बेच कै? उठता है या मैं दरवाजा भैंस ते खुलवाऊं?’ मैंने जल्दी से दरवाजा खोल दिया। चौधरी अंदर आया और कुलर के ठीक सामने बेड खींच कर लेटता हुआ बोला, ‘के हो रहो दिल्ली में, कती रामराज आ लिया सड़कन पै।’ ‘क्या हुआ? फिर कोई भैंस अनशन पर बैठ गई?’

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‘तेरे धौरे बाइक है ना?’ ‘पर इतनी रात में..?’ चौधरी ने आंख तरेरी, ‘थारे दिल कौ साइज खुशी की तर्या घणा छोटा सै। मुसीबत अर मंहगाई की तर्या बड़ा कर इसे, फेर समझाऊं तन्ने।’ ‘पर हुआ क्या है?’

‘कल मोय करोलबाग जाणा हा। मैं घर ते दो बजे लिकड़ा-अर-चार बजे पौंच्या? इब बता, बीच में मैं कूण सी पंचात में बैठा हा?’ मैंने माथा पीट लिया। एक तो वह मेरी बेड पर फैल कर लेट चुका था, दूसरे मैं नींद का बोझ उठाए अपने ही घर में असहाय खड़ा था। और अब मुझे ही बताना था कि आठ किलोमीटर जाने में उसे दो घंटे क्यों लगे। कमरे की इकलौती कुर्सी पर बैठता हुआ मैं बोला, ‘पैदल तो नहीं गए थे?’ ‘ना! सकूटर है मेरे धौरे, अर-अभी तो म्हारा सकूटर इतनो दमदार सै-अक-तमै तो डिक्की में डाल कै दिल्ली ते मेरठ पैदल लिकड़ जाऊं सूं।’

‘फिर आठ किलोमीटर में दो घंटा कैसे लगा?’

‘उरे कू सुण भारती! तन्ने तो पतो है-अक-दिल्ली ते मेरठ मैं अपणे सकूटर ते जाऊ सूं। दिल्ली में सकूटर ते कम ही लिकड़ सूं। पर आज मति मारी गई जो लिकड़ा। कनॉट प्लेस ते आग्गे  लिकड़ते ही गोल मार्केट कौ रेड लाइट आ-गी। सिग्नल लाल हो चुका हो, मैं रुक ग्या, पर इब सोचूं-क्यों रुक ग्या।’ ‘सिगनल के हिसाब से रुकना और चलना सुरक्षा के लिए जरूरी है और यह एक अच्छे नागरिक की पहचान भी है।’ 

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‘मन्ने सबै नागरिक का केले ठेका ले रख्या सै के?’ चौधरी भड़क गया, ‘खोपड़ी कती उलट-गी भारती।  रेड लाइट तो पुड़िस कौ बगैर विधवा बण ज्या कती।’ ‘पुलिस वाले कहां थे?’ 

‘पुड़िस नै परे कर भारती! पर म्हारे सामणे लोग ऐसे लिकड़ रहे थे जैसे लालबत्ती देखकर रुके तो गरीबी रेखा वाड़ा गेहूं छूट ज्यागा। रेड लाइट पै लोग दनादन लिकड़े सूं। पुड़िस वाड़ा गायब-बस रावण राज शुरू। घणा बुरा तजुर्बा आज लिकाड़ा मन्ने। दो सौ रुपया लुट गया सो अलग।’

‘तुम्हें लूट ले कोई! असंभव!!’ ‘बीच में भैंस की तर्या मत रंभा। उतै रेड लाइट पै जब मैं रुक्या सामणे एक बाइक बाड़ा हा। उस बावली पूंछ कू लिकड़ने की घणी जल्दी थी। बार बार एक्सीलीटर ऐंठ रहो। आखिरकार मैं बोल्या, ‘चोरी करके भागा है के?’ जवाब देने के चक्कर में वाकौ बाइक ही बंद हो गई। मन्ने भी सकूटर कू बंद कर दयी। मेरे पीछे खड़े बाइक वाड़े के पास हैल्मेट भी ना था, पर वह रेड लाइट पे गाड़ी लिकाड़ ले गयौ।’

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‘यह तो कानून का उल्लंघन है।’ ‘सायकड़ वालन कू जरूरत ही ना थी सुरक्षा या कानून की। वा ना तो ग्रीन लाइट में रुक रहे थे-ना रेड लाइट में। पैदल वाड़े तो यमराज के फूफा लिकड़े। चलती ट्रेफिक में आड़े तिरछे ऐसे सड़क पार कर रहे थे, जैसे अगर ग्रीन सिग्नल के लिए रुके तो उन पर डबल जीएसटी लग जाएगा।’ 

‘जिस रेड लाइट पर भी ट्रेफिक पुलिस नहीं होती, वहां लोग ऐसे ही खतरों से खेलते हैं। दिल्ली में हर आदमी को जल्दी होती है, इसलिए कानून और ‘काया’ दोनों कुचले जाते हैं। पर तुम कैसे लुटे भाई!’ ‘तीसरी बार ट्रेफिक सिग्नल हरा हुआ तो मैंने लिकड़ने के लिए सकूटर स्टार्ट किया। इतने में एक पढ़ी लिखी पैंट वाड़ी मैडम सामने आ-गी, जो अपणी तरफ की रेड लाइट तोड़ कै सड़क पार कर रही थी।-मैं गुस्से में चिल्लाया-बीमा हो ग्या के? वा गुस्से में अंग्रेजी चबाणे लगी।

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मन्ने पूछ लई-बृद्धा आश्रम छोड़ द्यूं तमैं?’ ‘फिर क्या हुआ?’ ‘बहुत बुरा हुआ! चौथी बार मैं खुद रेड लाइट अपनी सकूटर कुदा कर पार कर गया। अगड़े रेड लाइट पै भी पुड़िस वाड़े ना दिखे, बस मैं उसे भी छलांग मार के पार कर ग्या। अभी मैं पचास गज आगे लिकड़ हा, अक-अचानक एक पेड़ के पीछे ते दौड़कर एक पुड़िस वाला सकूटर के ठीक सामणे आ लिया। मैं गिरते गिरते बचा। उसने एक साथ आधा दर्जन कागज मांग लिए।

मैं बोल्या-ताऊ! इतने कागज साथ रखणे पै तो टायर भी फट ज्यागा। सौ रुपए पकड़ अर खतम कर टंटे ने-। वा गरम हो लिया-सबै पुड़िस कू एक तराजू में मत नै तोल। रेड लाइट जंप कर्या सै-चालान कटेगो। मैं बोल्या-घणी लूट मचा रखी है तन्ने, पीछे रेड लाइट पै रावण राज लागू सै अर इतै चौराहा छोड़ पेड़ कौ नीचे तबेला चला रहो। जनता कू भैंस समझ कर दुहना बंद कर वरना जनता तमैं कैशलेस कर देगी।’ ‘आखिरकार हुआ क्या?’

‘उसका अफसर आ लिया-अर-मोय दो सौ रुपया देकर खिसकना पड़ा। तब ते नू सोच रहो-अक-कद समझेगी म्हारी पब्ड़िक-अक-ट्रेफिक के नियम, हैल्मेट, पूरे कागजात अर लाल-हरी बत्ती म्हारी सुरक्षा कौ खातर से। भले पुड़िस वाड़ा पेड़ कौ पाछे हो या आगे-इब आगे ते हट ले भारती! अर अंदर जा कर सो जा। काली मत कर रात नैं।’ मैंने माथा पीट लिया, चौधरी आराम से खर्राटे लेने लगा था।

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