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जानिए भारत में कैसा है स्वास्थ्य का हाल

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Apr 18 2017 4:00PM IST
जानिए भारत में कैसा है स्वास्थ्य का हाल

भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र में बहुत सारी अनियमितताएं हैं। जनसंख्या के अनुपात में अस्पतालों की कमी है, मौजूद अस्पतालों में सुविधाओं का अभाव है, सरकारी अस्पतालों में दवाओं की किल्लत है, देशभर में डॉक्टरों की कमी है, आदि-आदि, लेकिन सबसे बड़ी समस्या है सस्ते इलाज का नहीं होना। 

देश की करीब 40 फीसदी आबादी ऐसी है जो महंगे इलाज अफोर्ड नहीं कर सकती है। ऐसे लोंगों के बीमार पड़ने व उसका इलाज कराने का मतलब है कि बड़े आर्थिक भंवर में फंस जाना। देश के कई हिस्सों में देखा जाता है कि गरीबों को इलाज के लिए अपनी मामूली जमीन-जायदाद तक बेचनी पड़ती है। 

वे कर्ज के ऐसे जाल में फंस जाते हैं कि उनकी प्रगति रुक जाती है और अधिकांश समय वे दरिद्रता चक्र में घिर जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश में चिकित्सा जगत के इस दारूण हालात से वाकिफ हैं। उन्होंने सूरत में एक अस्पताल के उद्घाटन के मौके पर सस्ते इलाज के लिए कानून बनाने की बात कह कर करोड़ों गरीबों के लिए उम्मीद जगाई है। 

सस्ते इलाज की आकांक्षा केवल गरीबों की ही नहीं रहती है बल्कि मध्यवर्ग भी चाहते हैं कि उन्हें चिकित्सा पर कम से कम खर्च करना पड़े। दरअसल, स्वास्थ्य क्षेत्र में जारी अनियमितताओं को दूर करने के लिए कई स्तर पर सुधार किए जाने की आवश्यकता है। संयोग से आजादी के बाद से ही सरकारों ने स्वास्थ्य क्षेत्र को खुले बाजार के हवाले छोड़ दिया है। 

जिसके कारण इस क्षेत्र में उस स्तर की पारदर्शिता नहीं आ पाई, जिसकी जरूरत थी। सरकारी लापरवाही के चलते स्वास्थ्य क्षेत्र व्यापार बन कर रह गया, जबकि यह सम्मानजनक सेवा का पेशा है। जिस देश में डॉक्टरों को भगवान का दर्जा प्राप्त हो, वहां सरकारी उदासीनता के चलते फार्मा कंपनियों और चिकित्सकों के बीच साठगांठ इतनी मजबूत हो गई है कि शायद ही कोई हो, जो इससे बच पाता हो।

गरीबों के लिए तो यह साठगांठ चक्की की तरह है, जिसमें वे पिसते रहते हैं। इसलिए देश में इलाज का सस्ता होना जरूरी है। यूं तो स्वास्थ्य क्षेत्र राज्य सरकारों का विषय है, लेकिन इसमें केंद्र की पहल से नई उम्मीद जगेगी। सरकारी स्वास्थ्य क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार पर भी लगाम लगाने की जरूरत है। मोदी सरकार को चाहिए कि वह चिकित्सा क्षेत्र में माजूद कचरे को भी साफ करे। 

हालांकि मोदी जब से पीएम बने हैं, स्वास्थ्य क्षेत्र में भी सुधार लाने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी सरकार ने करीब सात सौ जीवन रक्षक दवाओं के दाम तय किए हैं, दिल के इलाज में काम आने वाले स्टेंट के दाम कम किए हैं, नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति लेकर आई है। प्रधानमंत्री ने डॉक्टरों से जेनरिक दवा लिखने की अपील की है। यह स्वागत योग्य है, कारण कि जेनरिक दवाएं सस्ती होती हैं। इससे मरीजों को इलाज का खर्च कम आएगा। 

सस्ते इलाज के लिए कोई भी पहल स्वागत योग्य कदम होगा। लेकिन बड़ी बात यह है कि मोदी सरकार को स्वास्थ्य क्षेत्र को रेगुलेट करने के लिए एक राष्ट्रीय नियामक का गठन करना चाहिए, जो केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन काम करे। यह नियामक देश भर में सरकारी और निजी अस्पतालों व फार्मा क्षेत्र के लिए मानदंड तय करे। 

राज्यों को भी इसके अधीन लाया जाय। फीस से लेकर दवाओं के दाम तक राष्ट्रीय नियामक ही तय करे। ऐसा करने से सस्ते इलाज का सपना तेजी से पूरा होगा। देश की प्रगति के लिए जरूरी है कि शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र पूर्णत: या तो सरकार के अधीन हो या सरकार से रेगुलेटेड हो। शिक्षा व चिकित्सा जगत से निजी मनमानी को खत्म करना तत्काल जरूरी है।

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40 percent population can not afford expensive cure in india

-Tags:#Narendra Modi
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