भोपाल

हरिभूमि की खबर का असर, शिक्षक-अधीक्षक मामले में मुख्य सचिव का तबादला

By कविता जोशी | Feb 03, 2017 |
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नई दिल्ली. मध्य-प्रदेश के अनुसूचित जाति कल्याण विभाग द्वारा इस वर्ग के बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के साथ किए जा रहे खिलवाड़ के मामले में प्रदेश सरकार ने तुरंत कार्रवाई करते हुए विभाग के मुख्य सचिव अशोक शाह का बृहस्पतिवार रात को तबादला कर दिया है। मप्र प्रशासन ने यह कार्रवाई यहां राष्ट्रीय बाल अधिकार एवं संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) द्वारा मामले पर संज्ञान लिए जाने के बाद शुरू की गई कार्रवाई के बाद की है। मामले पर बाल आयोग ने बीते दो फरवरी को मप्र के मुख्य सचिव (अनुसूचित जाति कल्याण विभाग) अशोक शाह को समन भेज कर तलब किया था। लेकिन उन्होंने मप्र में चल रहे विधानसभा सत्र का हवाला देते हुए आयोग के समक्ष पेश होने में असमर्थता जताई और विभाग द्वारा संचालित ज्ञानोदय आवासीय विद्यालय की आयुक्त दीपाली रस्तोगी को आयोग के समक्ष पेशी के लिए मंजूरी मांगी थी। इस पर आयोग ने अपनी स्वीकृति दे दी थी। यहां बता दें कि इस मामले पर सबसे पहले हरिभूमि ने अपने 26 जनवरी के अंक में ‘जब शिक्षक  बन जाएंगे अधीक्षक तो बच्चों को पढ़ाएगा कौन?’ शीर्षक से एक खबर को प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया था। इसके बाद ही मप्र प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी का तबादला हुआ है। अशोक शाह की जगह पर 1995 बैच के आईएएस अधिकारी प्रभांशु कमल को मुख्य सचिव के पद पर नियुक्त किया गया है।
 
दुबारा समन भेजेगा आयोग 
एनसीपीसीआर के विश्वसनीय सूत्रों ने हरिभूमि को बताया कि आयोग द्वारा भेजे गए समन में पूछे गए प्रश्नों का जवाब देने के लिए दो फरवरी को मप्र के ज्ञानोदय आवासीय विद्यालय की आयुक्त श्रीमती दीपाली रस्तोगी एनसीपीसीआर के समक्ष पेश हुई। इसमें उन्होंने जो जानकारी दी उससे आयोग संतुष्ट नहीं है और अब वो जल्द ही विभाग को दुबारा समन भेजने की तैयारी कर रहा है। आयोग का कहना है कि आयुक्त कमीशन की कार्रवाई में शामिल नहीं हुई और जरूरी कार्य का हवाला देकर चली गई। आयोग ने अपने समन में मप्र में अधीक्षक के पद, उसकी योग्यता, ड्यूटी और शिक्षक की ड्यूटी के बारे में जानकारी मांगी थी। सूत्रों ने कहा कि आयुक्त ने जो जानकारी दी वो तथ्यात्मक रूप से भी संतोषजनक नहीं थी। इसके अलावा सूत्रों से पता चला कि आयुक्त ने आयोग के अधिकारियों के साथ अपनी पेशी के दौरान दुर्व्यवहार किया और दबाव डालने की भी कोशिश की। हालांकि एनसीपीसीआर से जब इस संबंध में हरिभूमि ने प्रश्न पूछे तो उन्होंने कोई जानकारी होने से इंकार कर दिया। 
 
ये था पूरा मामला 
मप्र. के संबंधित विभाग द्वारा ज्ञानोदय आवासीय विद्यालयों के कुल करीब 16 शिक्षकों को 2016 में शैक्षणिक सत्र के बीच से बच्चों को पढ़ाने के काम से हटाकर इन विद्यालयों के छात्रावास में अधीक्षक के रूप में नियुक्त कर दिया गया था। इन विद्यालयों में सूबे के अनुसूचित जाति-जनजाति के बच्चों को शिक्षा दी जाती है। मप्र में ऐसे कुल करीब 55 विद्यालय चल रहे हैं। शिक्षकों के तबादले से नाराज कुछ छात्रों ने मामले की शिकायत एनसीपीसीआर से करते हुए कहा था कि बिना शिक्षकों के उन्हें पढ़ाएगा कौन? इस पर संज्ञान लेते हुए आयोग ने यह समूची कार्रवाई की है। 
 
आयुक्त का पक्ष 
इस संबंध में जब हरिभूमि ने आयुक्त दीपाली रस्तोगी का पक्ष जानने की कोशिश की तो पहले उन्होंने फोन उठाने के बाद आवाज साफ न आने की बात कहकर फोन काट दिया। इसके बाद मोबाइल से भेजे गए मैसेज में पूछे गए प्रश्नों का भी उन्होंने पूरा जवाब नहीं दिया। केवल इतना ही कहा कि हमने पूरी जानकारी दी है और मैं आयोग के समक्ष पेशी के लिए दो फरवरी को ठीक सुबह साढ़े ग्यारह बजे पहुंच गई थी। इसके अलावा इसमें मेरे पास और कुछ बताने के लिए नहीं है। 
 
आयोग का तर्क 
एनसीपीसीआर के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने कहा कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग शिक्षा का अधिकार कानून 2009 की धारा 31 में बताए गए अपने दायित्व का निर्वहन ‘कमीशन फॉर प्रोटेक्शन आॅफ चाइल्ड राइट्स एक्ट 2005’ (सीपीसीआर) में प्रदत शाक्तियों का प्रयोग करते हुए इस प्रकार की कार्रवाई करता है। किसी स्थानांतरण या पदस्थापना आयोग का विषय नहीं है। अधिकारी विधि द्वारा स्थापित नियमों का पालन करते हुए बच्चों के अधिकार संरक्षित रखें। यह आयोग का आग्रह है।
 
 
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