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डोकलाम विवादः 5 कारण, जिसकी वजह से चीन ने टेके भारत के सामने घुटने

अदिति पांडेय, टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Aug 28 2017 1:58PM IST
डोकलाम विवादः 5 कारण, जिसकी वजह से चीन ने टेके भारत के सामने घुटने

चीन और भारत के बीच डोकलाम विवाद को लेकर 2 महीनों से तनातनी जारी है। डोकलाम विवाद को लेकर अब दोनों देशों ने एक अहम फैसला लिया है। विदेश मंत्रालय की ओर से जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक दोनों देश डोकलाम से अपनी-अपनी सेना हटाएंगे। हालांकि चीनी मीडिया ने कहा कि भारत अपनी सेना डोकलाम से हटा रहा है। इसका अर्थ ये निकाला जा रहा है कि चीन की ओर से इसे लेकर अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया।

 
विदेश मंत्रालय ने कहा कि डोकलाम विवाद को लेकर दोनों देशों में कई हफ्तों से बातचीत जारी थी और इसमें भारत ने चीन के सामने अपनी चिंताओं और हितों को रखा जिसके बाद चीन ने ये फैसला लिया। चीन के बारे में एक बात कही जाती है कि ये चालें चलता यानी इसके पीछे से खंजर मारने की आदत है। आइए आपको बताते हैं कि डोकलाम विवाद के नरम पड़ने की क्या वजहें हो सकती हैं-
 
1. अजीत डोभाल का ब्रिक्स बैठक में जाना- भारत के राष्ट्रिय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने ब्रिक्स बैठक में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की जिसके बाद माना जा रहा था कि डोकलाम विवाद को लेकर कोई निष्कर्ष नहीं निकला लेकिन माना जा रहा है की चीन के सेना वापस हटाने के फैसले की वजह अजीत डोभाल का जिनपिंग के सामने भारत को हितों को रखना भी है जिसके बाद दोनों देश एक दूसरे को समझने लगे।
 
 
2. बिजनेस- चीनी कंपनियां जैसे वीवो और ओप्पो को भारत में करीब 30 फीसदी का घाटा हुआ जिसके बाद इनके कर्मचारियों को चीन वापस लौटना पड़ा। इन कंपनियों का कहना है कि डोकलाम विवाद के बाद भारत के लोगों की मानसिकता चीन विरोधी हो गई है जिससे हमें घाटा हुआ है। माना जा रहा है कि बिजनेस में लगातार घाटे के चलते चीन को अपना फैसला बदलना पड़ा और डोकलाम विवाद में नरमी बरतनी पड़ी।
 
3.अन्य देशों ने दिया भारत का साथ- अमेरिका और जापान जैसे बड़े देशों ने डोकलाम विवाद पर भारत का साथ दिया जिसके बाद चीन को बड़ा झटका लगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन को डोकलाम विवाद पर चेताया था और कहा था कि चीन और भारत दोनों देशों को मिलकर इस मुद्दे पर बात करनी चाहिए। इसके साथ ही जापान ने भी डोकलाम मुद्दे पर भारत का हाथ थामा और जापान के ज़्यादातर अख़बारों ने यही कहा है कि मसले को बल से नहीं, बातचीत से निपटाना चाहिए। इसी क्रम में रूस भी भारत के समर्थन में आगे आया था।

 
4. चीन को आई 1967 की याद- डोकलाम विवाद पर नरमी बरतने की एक वजह यह भी हो सकती है कि चीन को 1967 के युद्ध की याद आ गई हो जिसमें भारत द्वारा चीन के 400 सैनिक मारे गए थे। रणनीतिक स्थिति वाले नाथू ला दर्रे में हुई उस भिड़ंत की कहानी हमारे सैनिकों की जांबाजी की मिसाल है।1967 के टकराव के दौरान भारत की 2 ग्रेनेडियर्स बटालियन के जिम्मे नाथू ला की सुरक्षा जिम्मेदारी थी। नाथू ला दर्रे पर सैन्य गश्त के दौरान दोनों देशों के सैनिकों के बीच अक्सर धक्का मुक्की होते रहती थी।
 
11 सितंबर 1967 को धक्कामुक्की की एक घटना का संज्ञान लेते हुए नाथू ला से सेबु ला के बीच में तार बिछाने का फैसला लिया गया। जब बाड़बंदी का कार्य शुरू हुआ तो चीनी सैनिकों ने विरोध किया। इसके बाद चीनी सैनिक तुरंत अपने बंकर में लौट आए। कुछ देर बाद चीनियों ने मेडियम मशीन गनों से गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। प्रारंभ में भारतीय सैनिकों को नुकसान उठाना पड़ा।
 
प्रथम 10 मिनट में 70 सैनिक मारे गए। लेकिन इसके बाद भारत की ओर से जो जवाबी हमला हुआ, उसमें चीन का इरादा चकनाचूर हो गया। सेबू ला एवं कैमल्स बैक से अपनी मजबूत रणनीतिक स्थिति का लाभ उठाते हुए भारत ने जमकर आर्टिलरी पावर का प्रदर्शन किया। कई चीनी बंकर ध्वस्त हो गए और खुद चीनी आकलन के अनुसार भारतीय सेना के हाथों उनके 400 से ज्यादा जवान मारे गए। भारत की ओर से लगातार तीन दिनों तक दिन रात फायरिंग जारी रही। हालांकि भारत चीन को सबक सिखा चुका था।
 
5. भूटान ने भी दिया भारत का साथ- डोकलाम विवाद पर भूटान ने भी भारत का साथ दिया था। भूटान ने माना था कि चीन द्वारा सड़क निर्माँण अवैध है और भारत जो कर रहा है सही कर रहा है। भूटान ने भी इस मुद्दे पर भारत का समर्थन किया था जिसके बाद चीन को करारा झटका लगा।
 
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