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पीएम मोदी ने बहादुर शाह जफर की मजार पर चढ़ाए फूल, भारत रवाना

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Sep 7 2017 12:02PM IST
पीएम मोदी ने बहादुर शाह जफर की मजार पर चढ़ाए फूल, भारत रवाना

पीएम मोदी म्यांमार की आज आखिरी दिन की यात्रा के दौरान सुबह बहादुर शाह जफर की मजार पर गए, पीएम ने मजार पर फूल चढ़ाने के साथ इत्र भी छिड़का है। इससे पहले वे यांगून में शावेदगांव पगोडा और कालीबाड़ी मंदिर की में पहुंचकर पूजा की थी। मजार का दौरा करने के बाद पीएम मोदी दिल्ली रवाना हो गए हैं।

बता दें कि म्यांमार की यात्रा करने वाले लोग भारत के आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर की दरगाह अधिकतर जाते हैं। भारत के पूर्व पीएम मनमोहन सिंह साल 2012 में म्यांमार यात्रा के दौरान बहादुर शाह जफर की दरगाह पर गए थे।

मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर का जन्म 24 अक्टूबर 1775 में हुआ था। उनके पिता अकबर शाह द्वितीय और मां लालबाई थीं। अकबर शाह की मृत्यु की बाद दिल्ली की सल्तनत बेहद कमजोर हो गई थी।

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इसके बाद जफर को 18 सितंबर, 1837 में मुगल सल्तनत का बादशाह बनाया गया। सौंदर्यानुरागी बहादुर शाह जफर का शासनकाल आते-आते वैसे भी दिल्ली सल्तनत के पास राज करने के लिए सिर्फ दिल्ली यानी शाहजहांबाद ही बचा रह गया था।

आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर की मौत 7 नवंबर 1862 में बर्मा 'अब म्यांमार' की तत्कालीन राजधानी रंगून 'अब यांगून' की एक जेल में हुई थी। लेकिन उनकी दरगाह 132 साल बाद 1994 में बनी।

ब्रिटिश चार दशक से हिंदुस्तान पर राज करने वाले मुगलों के आखिरी बादशाह के अंतिम संस्कार को ज्यादा ताम-झाम नहीं देना चाहते थे। वैसे भी बर्मा के मुस्लिमों के लिए यह किसी बादशाह की मौत नहीं बल्कि एक आम मौत भर थी। उस समय जफर के अंतिम संस्कार की देखरेख कर रहे ब्रिटिश अधिकारी डेविस ने भी लिखा है कि जफर को दफनाते वक्त कोई 100 लोग वहां मौजूद थे और यह वैसी ही भीड़ थी, जैसे घुड़दौड़ देखने वाली या सदर बाजार घूमने वाली।

बहादुर शाह को रंगून में शावेदगांव पगोडा के नजदीक दफनाया गया। उनके दफन स्थल को अब बहादुर शाह जफर दरगाह के नाम से जाना जाता है। आज भी कोई देशप्रेमी व्यक्ति जब तत्कालीन बर्मा 'म्यंमार' की यात्रा करता है तो वह जफर की दरगाह पर जाकर उन्हें श्रद्धांजलि देना नहीं भूलता। इस दरगाह की एक-एक ईंट में आखिरी बादशाह की जिंदगी के इतिहास की महक आती है।

लोगों के दिल में उनके लिए कितना सम्मान था उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत में कई जगह सड़कों का नाम उनके नाम पर रखा गया है। वहीं बांग्लादेश के ओल्ड ढाका शहर स्थित विक्टोरिया पार्क का नाम बदलकर बहादुर शाह जफर पार्क कर दिया गया है।

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बता दें कि जफर की दरगाह में महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग प्रार्थना करने की जगह बनी है। ब्रिटिश शासन में दिल्ली की गद्दी पर बैठे बहादुर शाह जफर नाममात्र के बादशाह थे।

बहादुर शाह जफर सिर्फ एक देशभक्त मुगल बादशाह ही नहीं बल्कि उर्दू के मशहूर कवि भी थे। उनकी कितनी ही नज्मों पर फिल्मी गाने बने। उनकी दरगाह दुनिया की मशहूर और एतिहासिक दरगाहों में गिनी जाती है।

1857 के विद्रोह ने जफर को बनाया आजादी की सिपाही

1857 में जब हिंदुस्तान की आजादी की चिंगारी भड़की तो सभी विद्रोही सैनिकों और राजा-महाराजाओं ने उन्हें हिंदुस्तान का सम्राट माना और उनके नेतृत्व में अंग्रेजों की ईंट से ईंट बजा दी। अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय सैनिकों की बगावत को देख बहादुर शाह जफर का भी गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने अंग्रेजों को हिंदुस्तान से खदेड़ने का आह्वान कर डाला।

भारतीयों ने दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में अंग्रेजों को कड़ी शिकस्त दी। लेकिन 82 वर्ष के बूढ़े शाह जफर अंततः जंग हार गए और अपने जीवन के आखिरी वर्ष उन्हें अंग्रेजों की कैद में गुजारने पड़े। बहादुर शाह जफर की गिरफ्तारी मुगल साम्राज्य के अंत के रूप में सामने आई। 400 साल से भी ज्यादा का चला मुगल साम्राज्य अब खत्म हो चुका था।

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pm modi to visit the dargah of mughal emperor bahadur shah zafar

-Tags:#PM Modi#Myanmar#Mughal Emperor Bahadur Shah Zafar
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