साहि‍त्‍य

पढ़िए एक गुदगुदाता व्यंग्य- 'ओजोन परत में छेद'

By कृष्ण प्रताप सिंह | Dec 09, 2016 |
hindi
लोगों ने देखा कि जैसे ही भाई जी का मुंह खुला, उनकी वासनाएं एक के बाद एक बाहर आने लगीं। श्रोताओं ने उनका करतल ध्वनि से स्वागत किया तो उन्होंने अपनी भाषणकला के बेहिसाब उत्सर्जन से ऐसा समां बांधा कि श्रोताओं में से अनेक दूसरी तरह के उत्सर्जनों के तलबगार होकर सभागार से बाहर चले गए।
 
भाई जी पहले तो बहुत देर तक अंदर ही अंदर कसमसाते रहे, फिर आजिज हो जाने जैसे भाव से कुछ झुंझलाते और कुछ तिलमिलाते हुए से बार्इं ओर अपने बगल बैठे श्रोता से बोले, ‘कितना हास्यास्पद विषय है! पता नहीं किस मूर्ख ने गोष्ठी के लिए इसका चुनाव किया! कोई समझदार इस पर बोले भी तो क्या बोले?’ अलबत्ता, यों खीझते हुए भी उन्होंने शिष्टाचार का दामन नहीं छोड़ा और अपनी आवाज बेहद नीची रखी। इतनी कि वह किसी भी हालत में मंच तक न पहुंच पाए। उनके बगल में ही दाहिनी ओर बैठा मैं भी उसे मुश्किल से ही सुन और समझ सका। 
 
लेकिन जब वे अपने शब्द उस श्रोता के कान में उढ़ेल रहे थे, उनकी मुखमुद्रा कुछ ऐसी थी कि जैसे उढ़ेलने में तनिक भी देर हो जाती तो उन्हें उलटियां आनी शुरू हो जातीं। तभी गोष्ठी के संचालक ने माइक पर उनका नाम पुकारा। अचानक आमंत्रण पाकर वे हड़बड़ाए से उठे, खिसक कर अस्त-व्यस्त हो गए दुग्ध धवल शॉल को फिर से कंधे पर व्यवस्थित किया और डायस की ओर चल पड़े। ताज्जुब कि वहां तक पहुंचते-पहुंचते उनकी मुखमुद्रा पूरी तरह बदल गई थी। दूसरे शब्दों में कहें तो भाई जी का चोला ऐसा मगन हो चला था कि उन्होंने सपनीली मुसकान के साथ श्रोताओं पर उड़ती हुई-सी नजर डाली तो कई को उनके सफेद झक शॉल के बसंती होने का भ्रम होने लगा। 
 
किस्साकोताह, तब तक कैमरे चमकने लगे थे और भाई जी गवारा नहीं कर सकते थे कि उनके चेहरे का वह स्थायी भाव अखबारों में छपकर आम हो जाए, जिसे उनके विरोधी उनकी मनहूसियत कहते हैं और चेले गरिमामय गंभीरता का नाम देकर हर हाल में आदरणीय बनाए रखने की कोशिशें करते रहते हैं। लेकिन यह क्या? लोगों ने देखा कि जैसे ही भाई जी का मुंह खुला, उनकी वासनाएं एक के बाद एक बाहर आने लगीं। ये वासनाएं पहले उन्हें उनकी प्रतिभा के उत्सर्जनस्थल पर ले गर्इं फिर वहां से उठाकर ज्ञान के उत्सर्जनस्थल पहुंचा आर्इं। खैर, श्रोताओं ने उनका करतल ध्वनि से स्वागत किया तो उन्होंने अपनी भाषणकला के बेहिसाब उत्सर्जन से ऐसा समां बांधा कि श्रोताओं में से अनेक दूसरी तरह के उत्सर्जनों के तलबगार होकर सभागार से बाहर चले गए। 
 
लेकिन भाई जी ने इससे एकदम अप्रभावित रहकर ऐलान कर दिया कि जब तक उनकी ज्ञानसाधना का एक भी जिज्ञासु वहां रहेगा, वे अपने उत्सर्जनों से उसे उपकृत करते रहेंगे। सच कहता हूं, आखिरी वाक्य बोलकर वे डायस से उतरे तो वे तो थे ही, मैं भी था। हां, मैं तो जिज्ञासु का जिज्ञासु ही रह गया था, लेकिन वे पिपासु में बदल गए थे। किसी मुग्धा नायिका की तरह पूछने लगे-कैसा बोला मैं? मन हुआ कि कह दूं-विषय के साथ पूरा तालमेल बैठाकर। जितना हास्यास्पद वह था, उतने ही हास्यास्पद ढंग से। लेकिन फिर मन बदल गया। कहा, ‘यह क्या पूछने लगे आप? अचानक क्या हो गया आपको? डायस पर जाने से पहले तक तो आप चंगे और भले थे!’ 
 
सुनते ही वे भड़क उठे, ‘भला तो मैं अभी भी उतना ही हूं, लेकिन भोला कतई नहीं हूं। समझ रहा हूं कि तुम मेरे वक्तव्य को मिली व्यापक सराहना पचा नहीं पा रहे। ईर्ष्या से भर गए हो।’  मैंने कहा, ‘भाई जी! गलती मेरी नहीं है। डायस पर आपकी दहाड़ से हमारे आकाश की ओजोन परत में आज जितना बड़ा छेद हुआ है, उसे देखते तो खुद आप भी अपने प्रति ईर्ष्या से भर जाते।’ सुनकर भाई जी फूले नहीं समाए। गुनगुनाने लगे, ‘जंगल-जंगल बात चली है, पता चला है!’ 
 
मैं समझ गया कि अब वे सारे विषय और वासनाएं भूलकर ठिठोलियों के मूड में आ गए हैं और चाहते हैं कि उन्हें गुनगुनाते सुनकर मैं टोकूं और पूछूं कि भाई मेरे! क्या पता चला है? लेकिन पूछता तो पहले वे, जैसी कि उनकी पुरानी आदत है, अपनी अहमियत जताने अथवा मुझे सताने के लिए ‘जाओ, नहीं बताता’ की मुद्रा ओढ़ लेते। इसलिए मैं पूछने के बजाय उन्हीं के सुर में सुर मिलाकर गुनगुनाने लगा, ‘चढ्डी पहन के फूल खिला है, फूल खिला है।’ 
 
सुनकर उनका मूड बिगड़ गया। कहने लगे, ‘हद हो गई! जंगलों तक में लोग अब जंगली नहीं रह गए लेकिन जनाब हैं कि महानगर में रहकर भी अपनी जंगली आदतों से पीछा नहीं छुड़ा पा रहे। उलटे उन पर इस कदर फिदा हैं कि सारी लाज-शरम बिसराकर चढ्डी पहने घूम रहे हैं! तिस पर वहम ऐसा कि जनाब को लगता है कि फूल जैसे खिल रहे हैं।
मैं आश्वस्त हो गया कि अब कुछ भी पूछने की जरूरत नहीं पड़ेगी और उनके दिलो-दिमाग में जो कुछ भी चल रहा है, सब बिना पूछे उगल देंगे। 
 
सचमुच ऐसा ही हुआ। वे शुरू हो गए, ‘अभी कुछ महीने पहले तक जंगल के लोग अपने राजा के खिलाफ बहुत आंदोलित थे। करते भी क्या, कभी महंगाई की डायन कहर ढाने लगती थी और कभी भ्रष्टाचार का राक्षस काट खाने दौड़ पड़ता था। तिस पर कालेधन का पहाड़ था कि जहां भी उसका मन होता, रास्ता रोककर खड़ा हो जाता। लोग राजा के पास इनकी शिकायतें ले जाते तो वह अनसुनी कर देता या झूठा दिलासा देकर विदा कर देता।’  घोर ताज्जुब! इस जंगल के लोगों की समस्याएं तो एकदम भारतवासियों जैसी थीं! सो, बरबस मेरे मुंह से निकला, ‘फिर क्या हुआ?’ उन्होंने बताया, ‘आजिज आकर लोगों ने राजा के खिलाफ विद्रोह कर दिया। उसको गद्दी से उतार दिया और दूसरा चुन लिया!’
 
मैंने चौंककर पूछा, ‘क्या जंगल में लोकतंत्र था और चुनाव होते थे?’ मेरे सवाल सुनकर भाई जी चिढ़ गए। धिक्कारते हुए से बोले, ‘एकदम से बुद्धि से पैदल हो गए हो क्या? लोकतंत्र होता तो राजा नहीं होता। मंत्री होते उसकी जगह। खैर, लोकतंत्र की छोड़ो। आगे का हाल सुनो। कुछ दिन तो जंगल में मंगल रहा, फिर पता चला कि नए राजा को घूमने-फिरने का बहुत शौक है। उसने तख्तोताज संभालते ही यात्राओं का सिलसिला सा शुरू कर दिया। एक दिन किसी यात्रा से लौटा, लोगों ने उसके सामने समस्याएं रखनी शुरू कीं और किसी भी तरह टलने को तैयार नहीं हुए तो झिड़ककर कह दिया, ‘तुम लोग बहुत गंदे हो। पहले साफ-सुथरे रहना सीख जाओ। फिर बाकी बातें करेंगे।’ 
 
इतना बताकर भाई जी चुप हो गए। मैंने पूछा, ‘फिर?’ तो वे चिढ़ गए, ‘फिर क्या, अब जंगल में जो भी कोई समस्या उठाता है, नए राजा के समर्थक यह कहकर उसका मुंह बंद देते हैं कि राजा ने जंगल में मंगल करके सारी दुनिया में उसका नाम रौशन कर दिया, मगर नाशुक्रों का पेट है कि अभी भी नहीं भरा।’ उनकी बात सुनकर मुझे फिर से वे छेद याद आने लगे, जो उन्होंने थोड़ी ही देर पहले हमारे आकाश की ओजोन परत में किए थे। 
 
 
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