साहि‍त्‍य

देश की सच्चाई दर्शता एक व्यंग्य 'कहां खो गया गणतंत्र'

By सुरजीत सिंह | Jan 25, 2017 |
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वह मैली-कुचैली, फटी-पुरानी कंबल को कसकर पकड़ते हुए, अनजान भय से भयाक्रांत होते हुए, कांपती आवाज में बोला, ‘बाल-बच्चों की कसम साब, मैं रात भर इधर ही था, नहीं देखा। इसने देखा होगा।’ यह कहते हुए उसने पास में लेटे व्यक्ति की ओर इशारा कर दिया। वह अधलेटा आदमी सर्दी से इतना नहीं कांपा, जितना इस भय से कांप उठा कि कहीं, गणतंत्र को देखकर, मुकरने के जुर्म में उसको रात को ही मिली एकमात्र कंबल न छीन ली जाए, उसने ‘ना’ में सिर हिला दिया!
 
 
रिहर्सल शुरू हो गई। गणतंत्र आ गया! सुबह-सुबह चौराहे पर मलिन बालक-बालिकाओं को तिरंगे की झंडियां बेचते देख, सहसा यकीन करने का मन करता है। ‘गणतंत्र आ गया?’ मैंने उनसे जानना चाहा। ‘अभी बोहनी नहीं हुई है साब।’ वे सर्द आवाज में बोले। एकाएक लगा, जैसे गणतंत्र ‘बोहनी’ के इंतजार में अटका हुआ है। तस्दीक करने के लिए मैंने फुटपाथ पर ठंड में गठरी बने पड़े आदमी से पूछा, ‘तो तुमने देखा है गणतंत्र को?’ वह मैली-कुचैली, फटी-पुरानी कंबल को कसकर पकड़ते हुए, अनजान भय से भयाक्रांत होते हुए, कांपती आवाज में बोला, ‘बाल-बच्चों की कसम साब, मैं रात भर इधर ही था, नहीं देखा। इसने देखा होगा।’ यह कहते हुए उसने पास में लेटे व्यक्ति की ओर इशारा कर दिया। वह अधलेटा आदमी सर्दी से इतना नहीं कांपा, जितना इस भय से कांप उठा कि कहीं, गणतंत्र को देखकर, मुकरने के जुर्म में उसको रात को ही मिली एकमात्र कंबल न छीन ली जाए, उसने ‘ना’ में सिर हिला दिया! मुझे लगा, गणतंत्र अभी कंबल से ही नहीं निकला है। एक गरीब आदमी से पूछा, ‘क्या तुमको गणतंत्र मिला है?’
 
 
‘नहीं जी, इस बार भी बीपीएल लिस्ट में नाम नहीं चढ़ा।’ कहते हुए वह मायूस हो गया। बड़ा संकट है, बीपीएल लिस्ट में नाम नहीं, चढ़े तो ‘गणतंत्र’ मिले। मुझे अगले जवाब का अनुमान हो चला, सरकार तो घोषणा करती रहती है, लेकिन जैसे राशन का गेहूं, चावल, केरोसिन दाब कर बैठे हैं, वैसे ही किसी ने गणतंत्र भी दाब लिया होगा! गरीब तक कहां पहुंचता है, बीच रास्ते ही मार्केट में ब्लैक हो जाता है। कुछ लोगों ने चौकन्ने होते हुए मुझे बताया, ‘श्रीमान जी, गणतंत्र के बारे में ज्यादा पूछताछ ना करें यहां, वरना अभी झांकी निकल जाएगी आपकी। यहां नेताजी की मर्जी के बगैर गणतंत्र तो क्या, परिंदा भी पर नहीं मार सकता। पिछले साल कुछ लोगों ने हिम्मत कर दबी जुबान से गणतंत्र की मांग उठाई थी, नेता जी के लोग उन्हें गणतंत्र देने के बहाने उठा ले गए, तब से उनका ‘गणतंत्र’, ‘भूगोल’ सब बदला हुआ है, अब वे लोग गणतंत्र का नाम लेते ही ‘गुलामी’ के दिनों को अच्छा बताने लगते हैं। अब नेता जी के लोग आकर पूछते हैं-और किसी को चाहिए गणतंत्र, तो लोग सहम जाते हैं।’
 
सच तो यही है कि गणतंत्र की उम्मीद तो हम सबने की थी! बड़े जोर-शोर से दिवास्वप्न भी दिखाए गए थे कि ‘तुम हमें अपना ‘गण’ दो, हम तुम्हें एक जबर्दस्त ‘तंत्र’ देंगे। एक सशक्त गणतंत्र देंगे।’ आजादी की अलसभोर थी, पब्लिक उत्साह से सराबोर थी, आंख मूंदकर अपना सारा ‘गण’ उन्हें सौंप दिया। जिन्हें सौंपा, वे बदले में तंत्र देने की बजाय ‘गण’ पर ही लद गए। तब से लोग ‘तंत्र’ को ढो रहे हैं। बड़ी उम्मीद से दीवार पर टंगे कैलेंडर को निहारते हैं। जिसे गणतंत्र समझते हैं, वह महज 26 जनवरी निकलती है।
 
कहते हैं, अब हर साल छब्बीस जनवरी को गणतंत्र राजपथ पर आता है। इस समय आधे से ज्यादा भारत सर्दी में ठिठुरता है। शीतलहर के मारे लोग घरों में दुबके रहते हैं। ऊपर से कोहरे, पाले की मार! ठिठुरते, कांपते, सिकुड़े, सिमटे शरीरों में इतनी हलचल भी नहीं होती कि वे उसे देखने की चेष्टा कर सकें। हर तरफ नैराश्य का कोहरा फैला दिखता है। गणतंत्र राजपथ पर टहलकर चला जाता है।
 
 
बाकी लोगों की तरह मैं भी हर साल उम्मीद से होता हूं कि राजपथ पर उसकी झलक भर दिख जाए। नजरें गड़ाता हूं कि शायद झांकियों में वह सब दिखेगा, जो हमारे लिए अपेक्षित था। लेकिन किसान की झांकी में किसान फसल काट रहा है कि फंदा बुन रहा है, नैराश्य में डूबा आसमान में बादल तक रहा है कि लटकने के लिए ऊंचाई नाप रहा है-दृश्यता शून्य से तय करना मुश्किल हो जाता है। आंखें फाड़कर देखने की कोशिश करता हूं, अहा, कश्मीर की झांकी में स्वर्गिक अनुभूति हो जाए!
 
लेकिन घाटी में ये रंग-बिरंगे फूल खिले हैं कि स्वर्ग की सारी कायनात आतंक से लहूलुहान है, यह समझ नहीं आता। 
लोकतंत्र को परिपक्व रूप में दिखाने वाली सदन की झांकी भी दिखती है। भीतर नेताओं का बहिष्कार, हो-हुल्लड़, वॉक आउट, दोषारोपण की धमा-चौकड़ी है। गोया सारा देश पूरी सज-धज के साथ झांकी में दिख रहा है, लेकिन कोहरे का फायदा उठाकर नेता, अधिकारी, बाबू, अपराधी जिसको जहां से मौका मिलता है, उसे कुतरने में लगे हैं। यहां, वहां से भ्रष्टाचार, आतंकवाद, जातीय संघर्ष, क्षेत्रीय वैमनस्यता की लपटें उठ रही हैं। लेकिन मंचासीन लोग केवल तालियां बजा रहे हैं। 
 
इन सबके बीच पब्लिक की हालत जाड़े की सर्द सुबह में घाट पर खड़े उस व्यक्ति की तरह है, जिसके लिए गणतंत्र वह तौलिया है, जिसे किनारे रख,  यों ही पानी में डुबकी लगाई, तौलिया गायब! वह बरसों से उघड़े, गीले बदन खड़ा ठिठुर रहा है। यह स्थाई मुद्रा है। जो भी आता है, उसी से खोए तौलिए की उम्मीद लगा लेता है। लेकिन उस तौलिए से तो कुछ ‘नग्न’ किस्म के लोग अपनी नंगई ढांपे खड़े हैं!
 
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