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तीन तलाक: विशेषज्ञों ने बताया सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कैसे आएगा बड़ा बदलाव

कविता जोशी/नई दिल्ली | UPDATED Aug 23 2017 9:54AM IST
तीन तलाक: विशेषज्ञों ने बताया सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कैसे आएगा बड़ा बदलाव

तीन तलाक के मामले पर मंगलवार को देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा सुनाए गए फैसले का विधि और संविधान विशेषज्ञों ने स्वागत किया है। उनका कहना है यह सीधे-सीधे शीर्ष न्यायालय का केंद्र सरकार को निर्देश है कि वह छह महीने के भीतर इस मामले पर संसद की मुहर के साथ एक कानून बनाए।

लेकिन कानून बनने की प्रक्रिया के दौरान कोई भी यह न समझे कि कोर्ट के हिसाब से तीन तलाक केवल छह महीने तक के लिए ही अवैध है और इसके बाद इसे वैध माना जाएगा। क्योंकि कोर्ट ने अपने फैसले में इस बाबत केंद्र को 6 महीने की समयसीमा को बढ़ाने का अधिकार भी दिया है।

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इसका अर्थ साफ है कि सरकार द्वारा कानून बनने तक भारत में तीन तलाक को अवैध ही माना जाएगा। इस दौरान कोई भी व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का उल्लंधन नहीं कर सकेगा। यह जानकारी कोर्ट का फैसला आने के बाद विधि और संविधान विशेषज्ञों से हरिभूमि की बातचीत में सामने आई है।   

कानून बनने तक रहेगा अवैध

सर्वोच्च न्यायालय में महिलाओं से जुड़े कई मामलों की पैरवी कर चुकी वरिष्ठ अधिवक्ता कमलेश जैन ने हरिभूमि से बातचीत में कहा कि शीर्ष न्यायालय का यह फैसला निश्चित रूप से ऐतिहासिक है। क्योंकि कोर्ट की पांच जजों की बेंच में से तीन ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया है।

केवल दो जजों ने इसे संवैधानिक माना है। यह फैसला मुस्लिम समाज की महिलाओं के लिए सौ फीसदी राहत से कम नहीं है। जिसका उन्हें लंबे समय से बेसब्री से इंतजार था। कोर्ट ने अपने फैसले में छह महीने के अंदर सरकार को इस बाबत कानून बनाने का निर्देश दिया है।

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लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि छह महीने के बाद अगर कोई मुस्लिम समाज का व्यक्ति अपनी पत्नी को तीन तलाक देता है। तो वह वैध माना जाएगा। जब तक सरकार इस पर कानून नहीं बना लेती। तब तक इसे अवैध ही माना जाएगा।

पूर्ववर्ती सरकार के समय में शाह बानो मामले में भी कोर्ट ने कानून बनाने का आदेश दिया था। लेकिन तत्कालीन सरकार के ढुलमुल रूख के चलते यह ठंडे बस्ते में चला गया था।    

जैन ने कहा कि कानून की भाषा में यह कुछ समय पहले कार्यस्थल पर महिलाओं के शारिरिक शोषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रहे केस जैसा है। इसमें भी न्यायालय ने शुरूआत में केंद्र को कानून बनाने के निर्देश ही दिए थे। जबकि कानून का निर्माण इसके करीब 15 साल बाद हुआ था।

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लेकिन तब तक निर्देश ही समाज में कानून के रूप में स्थापित रहे और किसी ने भी उनका उल्लंधन नहीं किया। तीन तलाक में भी ऐसा ही होगा। दूसरे शब्दों में कहूं तो इस निर्णय द्वारा कोर्ट ने केंद्र की मंशा पर एक प्रकार से मुहर लगा दी है।

क्योंकि मोदी सरकार भी तीन तलाक पर कानून बनाए जाने के पक्ष में है और अब उसे शीर्ष अदालत का ग्रीन सिग्नल मिल गया है। 

आपत्ति नहीं कर पाएंगे मुल्ला-मौलवी

तीन तलाक के मामले पर सुप्रीम कोर्ट में मुख्य पक्षकार व अधिवक्ता फराह फैज ने कोर्ट के फैसले पर बेहद खुशी जताते हुए कहा कि हमने जो मांग की थी। उसे कोर्ट ने अपने फैसले में शामिल किया है।

अब इस पर सरकार को कानून बनाने के लिए एक दिशा मिल गई है। इसके बाद मुल्ला मौलवी भी कोई आपत्ति नहीं कर सकते हैं। अब तीन तलाक असंवैधानिक घोषित हो गया है।

कोर्ट ने इसे निरस्त कर दिया है। कोर्ट के फैसले की एक खास बात यह भी है कि अगर केंद्र सरकार चाहे तो 6 महीने की अवधि आगे बढ़ा भी सकती है। यानि कानून बनने तक देश में तीन तलाक अवैध ही रहेगा।  

संविधान संशोधन की जरूरत नहीं 

विधि एवं संविधान विशेषज्ञ डॉ़ सुभाष कश्यप ने कहा कि सर्वोच्च अदालत का निर्णय ही अब देश का कानून है। अगर किसी ने इसका उल्लंधन किया तो उसे किसी भी सूरत में वैध नहीं माना जाएगा।

कोर्ट की बेंच में शामिल बहुमत जजों द्वारा तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिए जाने के बाद अब इस मामले में सरकार को किसी तरह के संविधान संशोधन की जरूरत नहीं पड़ेगी। केवल कानून बनाना पड़ेगा।

इसका अर्थ साफ है कि पर्सनल लॉ से संविधान ऊपर है और समाज में किसी व्यक्ति को यह आजादी, अधिकार नहीं है कि वह तीन तलाक के नाम पर किसी दूसरे के व्यक्तिगत, नैतिक अधिकारों का उल्लंधन करे।

इसलिए कोर्ट को भी तमाम जिरह के दौरान यह लगा कि यह मामला व्यक्ति के मूल अधिकार का उल्लंधन है। कानून बनते वक्त तलाक की वास्तविक प्रक्रिया में कुछ बदलाव जरूर देखने को मिल सकते हैं।

भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में यह तथ्य काफी चौंकाने वाला नजर आता है कि जब पाकिस्तान, बांग्लादेश और सउदी अरब, इराक, इरान जैसे कुल करीब 20 इस्लामिक देशों में तीन तलाक पर रोक लगी हुई है। तो देश में इसका क्या औचित्य है? 

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