दुर्ग

पैरों पर खड़ी नहीं हो सकती, पर गांव को स्वच्छता के लिए खड़ा कर दिया, पीएम करेंगे सम्मानित

By Naresh Devangan | Mar 08, 2017 |
pm
दुर्ग. पैर नहीं चलते, पर हौसला और जज्बा ऐसा कि चीचा की सरपंच उत्तरा महिला दिवस पर आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों सम्मानित हो रही हैं। 
 
जी हां, उत्तरा ने ट्राइसिकल को पैर बनाकर स्वच्छ भारत की लड़ाई में ऐसी छलांग लगाई कि बिना सरकारी मदद के पूरा गांव शौचमुक्त हो गया। पीएम के हाथों स्वच्छ शक्ति सम्मान हासिल करने वाली उत्तरा प्रदेश की इकलौती सरपंच हैं।
 
पाटन ब्लॉक का गांव चीचा उत्तरा ठाकुर का जन्म और कर्मभूमि है। जन्म से ही उनके दोनों पैर पोलियो ग्रस्त हैं। मजदूर पिता की मदद से उन्होंने स्कूली शिक्षा पूरी की और फिर कॉलेज का रुख किया। 
 
बाधाओं को पार कर उत्तरा ने डिग्री भी हासिल कर ली, लेकिन नौकरी नहीं की बल्कि गांव की सेवा का रास्ता चुन लिया। उन्होंने सरपंच चुनाव लड़ा। चार अन्य प्रभावशाली उम्मीदवारों के बीच उत्तरा ने सक्रियता एवं स्वच्छ छवि के कारण विजय हासिल की और उसी दिन से गांव की दशा सुधारने में जुट गईं। 
 
जनपद पंचायत पाटन के ग्राम पंचायत चीचा जिसकी कुल परिवार संख्या 254 है। शारीरिक रूप से दिव्यांग होते हुए भी ग्राम पंचायत को स्वच्छ बनाने एवं खुले में शौचमुक्त करने के लिये ग्राम के शौचालय विहीन परिवारों के घर-घर जाकर शौचालय बनाने हेतु प्रेरित किया। 
 
स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) अंतर्गत अब तक इस ग्राम पंचायत में कोई भी प्रोत्साहन राशि जारी नहीं की गई है। फिर भी ग्रामीणों द्वारा ग्राम पंचायत सरपंच, पंच एवं प्रेरकों से प्रेरित होकर अपने घरों में शौचालय निर्माण कराया। ग्राम पंचायत के रिटायर हो चुके कोटवार बुधारू राम ने भी इस काम में मदद की। 
 
इसी के चलते 13 अगस्त, 2016 को ग्राम पंचायत चीचा को खुले में शौचमुक्त ग्राम घोषित किया गया। यह पूरे प्रदेश के लिए मिसाल है। इस उत्कृष्ट कार्य के लिए स्वच्छ शक्ति सम्मान के लिए चुना गया है। 
 
यह गौरव प्राप्त करने वाली वह प्रदेश की इकलौती महिला सरपंच हैं। उन्हें बुधवार 8 मार्च को प्रधानमंत्री के हाथों से गांधीधाम, गांधीनगर, गुजरात में सम्मानित किया जाएगा। जिसका सीधा प्रसारण दोपहर 3 बजे से दूरदर्शन पर होगा।
 
उत्तरा ने खुद झेला है दर्द
उत्तरा शरीर से दिव्यांग जरूर है, लेकिन वह लगातार सक्रिय रहती हैं। अपनी ट्राइसिकल से वह नियमित रूप से पंचायत जाती हैं और गांव के लोगों से मिलती है। 
 
गांव को खुले में शौचमुक्त करने उन्होंने घर-घर जाकर लोगों को जागृत किया। वह लोगों को बताती थी कि जब उसके घर शौचालय नहीं था, तो बरसात के दिनों में बाहर शौच जाने के लिए उसे कमर तक कीचड़ से लथपथ होना पड़ता था। इस तरह का विभिषिका और किसी को न झेलनी पड़े, इसलिए वे अपने घरों में शौचालय जरूर बनाए।
 
शत-प्रतिशत विकलांग है उत्तरा
उत्तरा ठाकुर कर्मठता व जीवटता का जीता-जागता उदाहरण है। वह बैसाखी के सहारे भी नहीं चल पाती और जमीन पर चलने के लिए उसे पैरों के अलावा दोनों हाथों का सहारा लेना पड़ता है। इसके लिए वह हाथों में भी चप्पल पहनती है। 
 
कला स्नातक उत्तरा की जीवटता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 6वीं से 12वीं तक की पढ़ाई उन्होंने समीपस्थ ग्राम अरसनारा स्कूल से की। उनके मजदूर पिता रोज साइकिल में बिठाकर स्कूल छोड़ने और लाने जाया करते थे। 
 
उस समय उसने ट्राइसिकल के लिए आवेदन भी किया था, लेकिन यह सरकारी सहायता उसे नहीं मिली। उसने कॉलेज की पढ़ाई पाटन महाविद्यालय से की। 
 
पढ़ाई के बाद उसे नौकरी के अवसर भी मिले, लेकिन उसने नौकरी के बजाए समाजसेवा के रास्ते को चुना और पंचायत चुनाव लड़कर गांव की सरपंच बनी। अब बुधवार के बाद पूरे देश में उसकी चर्चा होगी।
 
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